Monday, October 15, 2012

मन ही ईश्वर

मन ही ईश्वर 

 



                ...कल बलात्कार हुआ था.... आज भी हुआ ..... और आगे भी हो रहा है....  क्या यही संस्कार हम आगे आने  वाली पीढ़ियों को देंगे क्या यही आदर्श स्थापित कर रहे हैं हम16 दिसंबर 2012 को दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका इलाके में हुए गैंगरेप ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया यह घटना उस समय घटित हुई 23 साल की युवती निर्भया (काल्पनिक नाम) एक बस में अपने मित्र के साथ चढ़ी। इस बस में इन दो के अलावा 6 अन्य लोग भी थे। इन लोगों ने केवल उस युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया बल्कि उसे बुरी तरह से मारा जिसके बाद निर्भया के अंदरुनी अंगो पर गहरी चोट पहुंची। घटना के 11 दिनो बाद महिला को इलाज के लिए सिंगापुर शिफ्ट किया गया लेकिन बचाया नहीं जा सकता। इसकी मौत के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए।

   पूरे देश में जगह-जगह दोषियों को सजा देने के लिए प्रदर्शन होने लगे। इसके बाद पुलिस ने सभी छह आरोपियों को पकड़ लिया। उनपर सेक्सुअल असॉल्ट और मर्डर की धारा लगाई गई। इनमें से एक दोषी रामसिंह ने पुलिस कस्टडी के दौरान ही फांसी लगा ली। एक दोषी के 18 साल से कम उम्र होने के कारण उसे अधिकतम 3 साल ही सजा मिली और वो आजाद हो गया। 5 मई 2017 को बाकी चारो को कोर्ट ने फांसी की सजा दी। 9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की रिव्यू पीटीशन खारिज करके इनकी फांसी का रास्ता साफ कर दिया।

  दिल्ली की ही नहीं पूरे भारत की महिलाओं और यहाँ तक की मासूम कन्याओं की  चीख हम सब सुन रहे हैं,"बचाओ बचाओ अरे कोई तो बचाओ"  इस तरह शरीर को मात्र एक खिलौना समझ के  शारीरिक रूप से अपमानित करके हमें क्यों मारा  जा रहा है ?  आखिर हमारा दोष क्या हैहम खिलौना नहीं जीते जागते इन्सान हैं आप सभी के सामान दो आँखे , दो कान एक मुंह हमारा भी हैहमारी भी आत्मा है क्या हुआ अगर  पुरुष  मे शारीरिक बल मुझसे  ज्यादा है इसका मतलब यह  नहीं कि  पुरुष  अपनी जाति को उत्पन्न करने के साधन को ही समाप्त कर दे उसे ख़तम करने पर अमादा हो  जाये ? रे! नीच अधर्मी मानव तू ह्रदय नहीं पत्थर है मासूमियत का हत्यारा है.जो एक बाप के अरमान माँ की शान भाई के अभिमान को चकनाचूर कर अपने को मर्द कहता है.महिला जाति के साथ ये उपचार  मानवता पर शर्म है

    विचारों के अभाव में ऐसी घटना घटती है, विचार शून्य व्यक्ति या समूह ऐसा ही करता है. कई बार इन्सान कुटिलतापूर्वक जहरीली  मीठी  वाणी   और व्यवहार से  मित्र बना लेता है और  अपने जाल में फंसा छद्म  रूप से   ठग  लेते  हैं , जैसे सतयुग में  रावण  ने महाशक्ति  सीता  को  ब्राहमण  का वेष  धारण  कर उनका  अपहरण  किया  और फिर अपने महल में कैद कर लिया था स्वार्थी , कपटी ,नीच और दुष्ट प्रकृति के  व्यक्ति अपनी वाणी  की मिठास का मुखोटा पहिन कर समाज में अच्छी छवि बनाते हैंऔर  निर्दोष  सजा भुगतते  पाए जाते है। मुंबई में हुआ एक गैंग  रैप  इस बात की पुष्टि कर रहा है कि  महिलाओं के साथ रैप करने के लिए नया तरीका  इजाद किया गया है जिसमे  प्यार से  सम्बंधित महिला को sterilization pill पानी में मिलकर या किसी खाद्य में मिलकर खिलाया जाता है  इस drug के प्रभाव से  victims को अगली सुबह तक याद ही नहीं रहता  की उसके साथ हुआ क्या था?  

   प्रत्येक घर में मां, भाभी, बहन और बेटी जैसे पवित्र रिश्ते हैं  ये रिश्ते घर की चारदीवारी  ही नहीं  घर के बाहर भी माने  जाते हैं  और निभाए भी जाते रहे हैं।  छदम वेशी बेर के समान होते हैं संवेदनहीनये बाहर से तो मनोरम और अंतकरण  से कठोर होते है   फिल्म  मानसून वेडिंग  में  बहुत अच्छे तरीके से इसे दिखाया समझाया  गया है. संयुक्त परिवार का सिनिअर सदस्य अपने  ही परिवार की छोटी और नासमझ लड़की के साथ काले कारनामे करता है. अबोध बालिका का चरित्र गलत नहीं है  वह अपने बड़े पिता-तुल्य पुरुष की हरकतों का शिकार बनती है   और परिवार में बता भी नहीं पाती .यद्यपि हवस का शिकार बनना उस बालिका को  घर्णित और अमानवीय प्रताड़ना सी लगती है. हवस की तुष्टि  के लिए  अबोध  नासमझ बालिकाओं की देह को चूर चूर कर मसल देना नष्ट कर देना क्या पशुता  की और अग्रसर  होती मानव जाती पर कलंक नहीं है ?

 


      अच्छे व्यक्ति प्रतिशोध करने या विद्रोह की ज्वाला में जलते हुए जब अपने मुंह से अंगार बरसाते है तो उन्हें भी अपनी वाणी  की वजह से बुरा  माना  जाता   हैं और समाज में उनकी छवि बुरी बन जाती है  उसके पास कोई  जाना पसंद नहीं करता.  अच्छे व्यक्ति या सज्जन  नारियल के समान होते हैं  ऊपर से कठोर और अंतस  से नरम .  वैसे  ही जैसे  कौवे की कर्कश आवाज सुनकर सभी दूर भागते हैं और  कोयल अपनी वाणी  की मिठास से  मत्रमुग्ध कर देती है। यदि कौवे और कोयल की वास्तविकता जानने की जिज्ञासा हो तो यह पढ़कर  आश्चर्य होगाकि यही मीठी बोली बोलने वाली कोयल  अपने अंडे खुद नहीं सेती है और नहीं अपने बच्चों  का पालन -पोषण ही खुद करती है।  कोयल के अंडे कौवे अपने बच्चे  समझकर  सेते हैं और उन्हे दाना चुगना चुगाते हैं  यही  कर्कश समझा जाने वाला  कौवा सफाई का दरोगा कहलाता है और  हमारे आस -पास की गंदगी दूर कर सफाई का सन्देश फैलाता है। किसी भी कानून या प्रदर्शन से ये हादसे तब-तक नहीं रूक सकते, जब-तक  स्त्री को केवल और केवल वासना और उपभोग का पर्याय मानने की सोच नहीं बदलेगी।

  संस्कारों के बीज हमको और आपको अपने घरों से बोने होंगे और समाज में इस पौधों को वृक्ष बनाकर छांव के लिए तैयार  करना होगा।यह मन ही तो है तो हम सभी के अच्छे और बुरे सभी कर्मों का दर्पण होता है, जो हमारे अच्छे बुर बुरे कर्मों का साक्षी होता है इस आइने में जब भी हम झांकते हैं अच्छा  और बुरा हमें स्वयं ही मालूम हो जाता है। दुसरे व्यक्ति की बात बुरी लग सकती है खुद अपने मन से पूछी गयी और समझी गयी baton को तो अस्वीकार नहीं किया जा सकता।  इस अमानवीय अभिवयक्ति के सन्दर्भ में तो एक ही जीवन दर्शन महत्वपूर्ण लगता है और वो है -

  वास्तविक स्वरूप 

मन ही देवता मन ही इश्वर,मन से बड़ा कोई

मन उजियारा जब- जब   फैले जग उजियारा होए

 इस उजले दर्पण में प्राणी धुल   जमने पाए।

सुख की कलियाँ दुःख के काटें मन सबका आधार ,

मन से कोई बात छिपे मन के नैन हजार .

जग से चाहे भाग ले कोई मन से भाग पाए।

तन की दौलत ढलती छाया मन का धन अनमोल,

तन के कारन मन के धन को मत माटी  में मोल ,

मन की कदर भुलाने वाला हीरा जन्म गवाए।

 






2 comments:

  1. Apni bhavnaaon ko bahut saafgoyi se vykt kiya hai par yah bhi dhyan do ki stri ek maa aur behan bhi hoti hai, apne bete ya bhai ki soch badlan uski bhi zimmedari hai.

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  2. gajab ka vivechan kiya hai mool samsya naari ko keval bhog ki vastu manana hi hai atah sabse pahale isme sudhar apane ghar se hi hona chahiye tab ye sab rukenge keval kanoon se kuchh nahi hoga aapke vichar bahut hi stik or marmik hai

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