सोमवार, 8 अक्तूबर 2018

कुत्सित  मानसिकता कोढ़ है समाज पर

बलात्कारएक कोढ़  है समाज पर।ऐसे बलात्कारी जिनका परिवार(पत्नी और बच्चे )होते हैं  उनकी पत्नियों के विषय में सोचें तो  उनके लिए  तो विवाह एक पवित्र सम्बन्ध कहा ही नहीं जा सकता . यह संसार का सबसे अपवित्र रिश्ता  बन जाता है. एक कोढ़ जो जीवन लेकर ही जाता है. ऐसे  बलात्कारियों की पत्नी अपने तन -मन पर शादी के रूप में बहुत बुरा बलात्कार झेलती है। उनकी पीड़ा को यदि  गहराई से  समझा जाये तो शरीर क्या रूह भी काँप जायेगा 

  इन पीड़ित महिलाओं को इस आग को उन निर्दोष लड़कियों  को सौंप देना चाहिए  जो आज इस कम वासना का शिकार बन रही हैं।मेरी माताओं और बहिनों से एक ही प्रार्थना है कि  वे  पुरुषों  को इतना ज्ञान दें  कि  वे नारी का सम्मान करना सीखे।

अगर कोई किसी की लड़की के साथ  गलत करता है तो उसकी माँ  ही ऐसे बेटे को गोली मार दे जैसे फिल्म "मदर इन्डिया" में बरसों पहले दिखाया गया था। 

रविवार, 28 अप्रैल 2013

राजू और मुंबई






अनाथ,शिक्षित, ईमानदार,भोला राजू मन में कुछ बनने के सपने संजोये हुए इलाहबाद से मुंबई  रवाना  होता है. मुंबई में उसके पास ना रहने के लिए छत है ना खाने के लिए रोटी है. ना ही  उसका कोई अपना है. अपने जापानी जूते, इंग्लिश पेंट, रूसी टोपी को पहिनकर वह रास्ते में पैदल ही चल देता है. है.वह रास्ते का लम्बा सफ़र तय करने के लिए सेठ सोनाचंद से लिफ्ट मांगता है परन्तु सोनाचंद उसे ४२० कहकर कार से उतार देते है.जो मुश्किलों से टकरा कर जीवन के सफ़र में आगे बढ़ता जाता है  ईश्वर भी उसकी मदद करता है. 

शनिवार, 9 मार्च 2013

 यह है नरसिंहपुर  की शारदा मढिया 




माँ भगवती शारदा जो नरसिंहपुर की प्राचीन सींगरी नदी के तट पर पीपल और बरगद के सम्मलित वृक्ष के नीचे निर्मित शारदा मढिया में जीवंत स्थापित हैंनरसिंहपुर शारदा मढिया को पुल की मढिया के नाम से भी जाना जाता है के प्रति यहाँ के जन मानस में अटूट श्रद्धा , भक्ति और विश्वास है। इस सुप्रसिद्ध माता के स्थल को अब शक्ति स्थल के रूप में जाना जाने लगा है। पहले यह छोटी सी मढिया हुआ करती थी जिसे पुल की मढिया के नाम से भी जाना जाता है परन्तु अब यह देवी के मंदिर के रूप में जानी जाती है। इसका और विस्तार तथा निर्माण कार्य अभी भी जारी है। यह मंदिर प्रांगन शिव जी का मंदिर , शनि देव की स्थापना , सिद्ध बाबा हेतु स्थान , देवी की दशकों से प्रज्जवलित अखंड ज्योति हेतु प्रथक कक्षधर्मशाला और वटवृक्ष से मिलकर बना है।
         

 प्रभातफेरी  









सुबह सुबह धोती कुरता  पहनते हुए वे  राधेश्याम सीताराम धुन सुनते हुए  अपने अपनेघरों से निकलने के लिए तैयार होते हैं। हाथों  में मंजीरा, तुरही और लोकल वाद्य यन्त्र  बजाते हुएअपने अपने घरों से निकल कर वे एक टोली बनाते हुए नरसिंह मंदिर तक पहुँचते हैं प्रातःकाल का शांत वातावरण और चारों तरफ प्राकृतिक  हरियाली,  सूर्योदय की लालिमा, शांतिमय  सुहावना शुद्ध और प्रदूषण रहित वातावरण  और घंटे , मंजीरे , ढोलक के साथ  - "जय जय नरसिंह दया करके मेरी नाव  को पर लगा देना - अंधियारे  मानस मंदिर में प्रभु भक्ति का दीप जला देना" का समवेत स्वर सुनकर मंदिर के आस -पास रहने वाले घरों की गृहिणिया, बुजुर्ग अपने अपने हाथों में अगरबत्ती लेकर मंदिर के समक्ष  टोली  में शामिल हो जाती है और  प्रभातफेरी के सदस्यों के सुर में सुर मिलाने लगती है। नरसिंह भगवान् को धूप दीप नैवेद्य समर्पित कर रामधुन टोली उपस्थित भक्त  जनों को प्रशाद बांटते हुए आगे बढती है. सुबह का प्रशाद  बच्चों  के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता  है।
परिधि




 'परिधि' या'पिंजरा' वह होता है जिसमे पालतू पशु- पक्षियों को बंद किया जाता है .'अध्यात्मिक' अर्थ में पिंजरा 'शरीर' को भी कहा जाता है जिसमे 'आत्मा' कैद होती है पिजरे में  बंद सभी जीव जंतुओं को 'मुक्ति की आकांक्षाहोती हैकुसंगति हमेशा कुसंस्कार- हिंसा, नशा,स्वार्थ,रुढ़िवादी विचार को जन्म देती है संस्कार पीढ़ीयों से हस्तांतरित होते हैं. कुसंगति ही सभी दुर्गुणों की जड़ होती है.कुसंस्कारों का परिमार्जन प्रायश्चित्त और पश्चाताप से भी संभव नहीं. कुसंगति के सामान नरक नहीं! आधुनिक जीवन शैली को जीता हुआ मानव  कर्ज, चरित्रहीनता कुरीतियाँ, कुसंस्कार , झूठ , छल कपट आदि कई बंधनों में बंधा होता जिससे  मुक्त होने  की आकांक्षा तो वह रखता है परन्तु भरसक प्रयत्नों के बाद भी मुक्त नहीं हो पातासर्वेश्वरदयाल सक्सेना की  कविता इस सन्दर्भ में -