आज जब मैं नौजवानों को अपने लैपटॉप पर चंद सेकंडों में ChatGPT, Gemini या Claude पर एक कमांड (Prompt) देकर पूरी रिसर्च समरी, टाइपिंग और फॉर्मेटिंग करते देखती हूँ, तो मेरा मन बरबस 15-20 साल पीछे चला जाता है। आज का दौर कितना बदल गया है!
हमारे समय में पीएचडी (Ph.D.) करने का मतलब सिर्फ पढ़ाई करना नहीं था—वह एक तपस्या थी, जहाँ धैर्य, समय और समर्पण की परीक्षा हर कदम पर होती थी।
किताबों का लंबा इंतज़ार और बड़ी लाइब्रेरीज़ के चक्कर
जब मैं पीएचडी कर रही थी, उस दौर में न तो गूगल की तरह तुरंत उत्तर देने वाले AI टूल्स थे और न ही पीडीएफ़ का इतना सहज जमावड़ा। किसी ऑथर की एक खास किताब पाने के लिए महीनों-दो महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता था।
शोध-सामग्री (Research Material) जुटाने के लिए देश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज़ की लाइब्रेरीज़ के चक्कर लगाने पड़ते थे। सैकड़ों पन्ने पढ़ने पड़ते थे, उन्हें 'गुनना' पड़ता था, और फिर उस ज्ञान को आत्मसात (Internalize) करके अपने अनुभवों और अंतर-व्यक्तिगत कौशल (Interpersonal Skills) से जोड़कर शब्दों में ढालना पड़ता था।
जब रिसर्च पूरी हुई, तो टाइपिंग का दौर आया। मैंने खुद पूरी थीसिस टाइप की, जिसमें मुझे पूरा एक साल लग गया!
लेकिन असली दर्द तो तब मिला जब थीसिस प्रिंटिंग के लिए गई। एक महीने तक प्रिंटर वाले के चक्कर काटने के बाद जब 8 कॉपियाँ छपकर आईं, तो पता चला कि बिब्लियोग्राफी (Bibliography) और रेफरेंस (References) में टाइपिंग वाले ने भारी गलतियाँ कर दी थीं। परिणाम? मेरी पूरी 8 कॉपियाँ बर्बाद हो गईं! मुझे दोबारा पैसे खर्च करके, फिर से चक्कर काटकर 8 कॉपियाँ निकलवानी पड़ीं।
सफलता की कीमत: अपनों को न दे पाने का मलाल
पीएचडी की इस अंधी दौड़ और जल्दी से जल्दी काम खत्म करने के जुनून में ज़िंदगी के कई अनमोल पल हाथ से छूट गए।
मेरी माँ उस दौरान हार्ट पेशेंट (हृदय रोगी) थीं। उन्हें मेरी देखभाल और सेवा की ज़रूरत थी, लेकिन मैं पीएचडी के काम में इतनी उलझी और व्यस्त रही कि उनके पास बैठने और सेवा करने का सही समय ही नहीं निकाल पाई। आज भी जब वह दौर याद आता है, तो दिल में एक टीस उठती है।
मेरी सहेली 'दिव्या' की कहानी: एक अधूरी लड़ाई
मेरे से भी ज़्यादा दर्दनाक कहानी मेरी सहेली दिव्या की है। दिव्या ने पीएचडी में एडमिशन लिया, रजिस्ट्रेशन करवाया और उसी दौरान उसकी सगाई भी हो गई। लेकिन उसकी गाइड की शर्त बेहद कठोर थी—"शादी तभी करना, जब पीएचडी पूरी हो जाएगी!"
बेचारी दिव्या! उसे अपनी पीएचडी पूरी करने में 10 साल लग गए।
10 साल बाद जब पीएचडी पूरी हुई, तब तक उसकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बीत चुका था। उसकी जिन सहेलियों की शादी 22 से 25 साल की उम्र में हो गई थी, उनके बच्चे अब 15-16 साल के हो चुके थे। जब भी वह अपनी सहेलियों से मिलती, उसे एक गहरी हीन भावना (Inferiority Complex) महसूस होती। उसे खुद में एक 'आंटी' या 'दादी/नानी' जैसी फीलिंग आने लगती थी।
समाज और आसपास के लोगों के तानों ने उसके मन में यह बात बैठा दी थी कि:
"अब तुमसे कौन शादी करेगा? अब क्या कोई दांपत्य सुख या संतान सुख की उम्र बची है तुम्हारी? पति सुख और संतान सुख की सही उम्र तो निकल गई!"
पीएचडी की इस सनक और धुन में दिव्या न तो अपने माता-पिता, न भाई-बहन और न ही अपनी खुद की फैमिली पर ध्यान दे पाई। कभी नेटवर्क की समस्या, कभी लैपटॉप खराब होना, कभी गाइड का उपलब्ध न होना—हर चीज़ के लिए गाइड की मर्ज़ी पर निर्भर रहना पड़ता था।
इसी आपाधापी में दिव्या अपनी माँ की बिगड़ती तबीयत पर भी ध्यान नहीं दे पाई। उसे अपने पारिवारिक मसलों को देखने का वक्त ही नहीं मिला, और देखते ही देखते उसकी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत साल कागज़ों और गाइड की शर्तों की भेंट चढ़ गए।
आज का दौर: AI का जादू और बदलती सच्चाई
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ और आज के दौर से तुलना करती हूँ, तो हैरानी होती है।
आज AI, Gemini, ChatGPT और Meta जैसे टूल्स ने टाइपिंग, डेटा एनालिसिस, रेफ़रेंसिंग और फॉर्मेटिंग को इतना आसान बना दिया है कि जो काम पहले सालों-साल लेता था, वह अब महीनों में ही नहीं, बल्कि दिनों में पूरा हो जाता है।
तकनीक की इस प्रगति से निश्चित रूप से शोधार्थियों का समय और मेहनत बच रही है—जो कि एक बहुत अच्छी बात है। लेकिन इसके साथ ही मुझे उन बीते दिनों का संघर्ष, अपने छूटे हुए रिश्ते, मेरी माँ की सेवा न कर पाने का मलाल और दिव्या के वे खोए हुए 10 साल बहुत याद आते हैं।
एक विचार:
तकनीक कितनी भी आगे निकल जाए, पर उम्मीद यही है कि आज के शोधार्थी AI का सही इस्तेमाल करके अपना समय बचाएंगे, ताकि किसी और 'दिव्या' को अपनी ज़िंदगी, अपनी खुशियाँ और अपने परिवार को डिग्री की वेदी पर कुर्बान न करना पड़े।
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