Friday, July 31, 2026

रिसर्च का दौर: तब 'संघर्ष और सब्र' था, अब 'AI और स्पीड' है

आज जब मैं नौजवानों को अपने लैपटॉप पर चंद सेकंडों में ChatGPT, Gemini या Claude पर एक कमांड (Prompt) देकर पूरी रिसर्च समरी, टाइपिंग और फॉर्मेटिंग करते देखती हूँ, तो मेरा मन बरबस 15-20 साल पीछे चला जाता है। आज का दौर कितना बदल गया है!

हमारे समय में पीएचडी (Ph.D.) करने का मतलब सिर्फ पढ़ाई करना नहीं था—वह एक तपस्या थी, जहाँ धैर्य, समय और समर्पण की परीक्षा हर कदम पर होती थी।

किताबों का लंबा इंतज़ार और बड़ी लाइब्रेरीज़ के चक्कर

जब मैं पीएचडी कर रही थी, उस दौर में न तो गूगल की तरह तुरंत उत्तर देने वाले AI टूल्स थे और न ही पीडीएफ़ का इतना सहज जमावड़ा। किसी ऑथर की एक खास किताब पाने के लिए महीनों-दो महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता था।

शोध-सामग्री (Research Material) जुटाने के लिए देश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज़ की लाइब्रेरीज़ के चक्कर लगाने पड़ते थे। सैकड़ों पन्ने पढ़ने पड़ते थे, उन्हें 'गुनना' पड़ता था, और फिर उस ज्ञान को आत्मसात (Internalize) करके अपने अनुभवों और अंतर-व्यक्तिगत कौशल (Interpersonal Skills) से जोड़कर शब्दों में ढालना पड़ता था।

जब रिसर्च पूरी हुई, तो टाइपिंग का दौर आया। मैंने खुद पूरी थीसिस टाइप की, जिसमें मुझे पूरा एक साल लग गया!

लेकिन असली दर्द तो तब मिला जब थीसिस प्रिंटिंग के लिए गई। एक महीने तक प्रिंटर वाले के चक्कर काटने के बाद जब 8 कॉपियाँ छपकर आईं, तो पता चला कि बिब्लियोग्राफी (Bibliography) और रेफरेंस (References) में टाइपिंग वाले ने भारी गलतियाँ कर दी थीं। परिणाम? मेरी पूरी 8 कॉपियाँ बर्बाद हो गईं! मुझे दोबारा पैसे खर्च करके, फिर से चक्कर काटकर 8 कॉपियाँ निकलवानी पड़ीं।

सफलता की कीमत: अपनों को न दे पाने का मलाल

पीएचडी की इस अंधी दौड़ और जल्दी से जल्दी काम खत्म करने के जुनून में ज़िंदगी के कई अनमोल पल हाथ से छूट गए।

मेरी माँ उस दौरान हार्ट पेशेंट (हृदय रोगी) थीं। उन्हें मेरी देखभाल और सेवा की ज़रूरत थी, लेकिन मैं पीएचडी के काम में इतनी उलझी और व्यस्त रही कि उनके पास बैठने और सेवा करने का सही समय ही नहीं निकाल पाई। आज भी जब वह दौर याद आता है, तो दिल में एक टीस उठती है।

मेरी सहेली 'दिव्या' की कहानी: एक अधूरी लड़ाई

मेरे से भी ज़्यादा दर्दनाक कहानी मेरी सहेली दिव्या की है। दिव्या ने पीएचडी में एडमिशन लिया, रजिस्ट्रेशन करवाया और उसी दौरान उसकी सगाई भी हो गई। लेकिन उसकी गाइड की शर्त बेहद कठोर थी—"शादी तभी करना, जब पीएचडी पूरी हो जाएगी!"

बेचारी दिव्या! उसे अपनी पीएचडी पूरी करने में 10 साल लग गए।

10 साल बाद जब पीएचडी पूरी हुई, तब तक उसकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बीत चुका था। उसकी जिन सहेलियों की शादी 22 से 25 साल की उम्र में हो गई थी, उनके बच्चे अब 15-16 साल के हो चुके थे। जब भी वह अपनी सहेलियों से मिलती, उसे एक गहरी हीन भावना (Inferiority Complex) महसूस होती। उसे खुद में एक 'आंटी' या 'दादी/नानी' जैसी फीलिंग आने लगती थी।

समाज और आसपास के लोगों के तानों ने उसके मन में यह बात बैठा दी थी कि:

"अब तुमसे कौन शादी करेगा? अब क्या कोई दांपत्य सुख या संतान सुख की उम्र बची है तुम्हारी? पति सुख और संतान सुख की सही उम्र तो निकल गई!"

पीएचडी की इस सनक और धुन में दिव्या न तो अपने माता-पिता, न भाई-बहन और न ही अपनी खुद की फैमिली पर ध्यान दे पाई। कभी नेटवर्क की समस्या, कभी लैपटॉप खराब होना, कभी गाइड का उपलब्ध न होना—हर चीज़ के लिए गाइड की मर्ज़ी पर निर्भर रहना पड़ता था।

इसी आपाधापी में दिव्या अपनी माँ की बिगड़ती तबीयत पर भी ध्यान नहीं दे पाई। उसे अपने पारिवारिक मसलों को देखने का वक्त ही नहीं मिला, और देखते ही देखते उसकी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत साल कागज़ों और गाइड की शर्तों की भेंट चढ़ गए।

आज का दौर: AI का जादू और बदलती सच्चाई

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ और आज के दौर से तुलना करती हूँ, तो हैरानी होती है।

आज AI, Gemini, ChatGPT और Meta जैसे टूल्स ने टाइपिंग, डेटा एनालिसिस, रेफ़रेंसिंग और फॉर्मेटिंग को इतना आसान बना दिया है कि जो काम पहले सालों-साल लेता था, वह अब महीनों में ही नहीं, बल्कि दिनों में पूरा हो जाता है।

तकनीक की इस प्रगति से निश्चित रूप से शोधार्थियों का समय और मेहनत बच रही है—जो कि एक बहुत अच्छी बात है। लेकिन इसके साथ ही मुझे उन बीते दिनों का संघर्ष, अपने छूटे हुए रिश्ते, मेरी माँ की सेवा न कर पाने का मलाल और दिव्या के वे खोए हुए 10 साल बहुत याद आते हैं।

एक विचार:

तकनीक कितनी भी आगे निकल जाए, पर उम्मीद यही है कि आज के शोधार्थी AI का सही इस्तेमाल करके अपना समय बचाएंगे, ताकि किसी और 'दिव्या' को अपनी ज़िंदगी, अपनी खुशियाँ और अपने परिवार को डिग्री की वेदी पर कुर्बान न करना पड़े।

Saturday, June 20, 2026

संगीत और अध्यात्म का नाता

        "यदि संगीत प्रेम का भोजन है, तो इसे बजने दो... बजने दो" 

शेक्सपियर का यह कथन संगीत की शक्ति को बताता है।प्रेम बिना संगीत अधूरा, और संगीत बिना प्रेम सूना।  जैसे शरीर को रोटी चाहिए, वैसे आत्मा को धुन चाहिए।संगीत वो ज़ुबान है जो बिना शब्दों के सब कह देती है। दुख हो तो सुकून, खुशी हो तो और रंग भर देती है।

संगीत और अध्यात्म का नाता :

भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि संगीत से चेतना जागती है। यह आत्मिक जागृति का माध्यम है जो मनुष्य को दिव्य अनुभूति से जोड़ता है और ईश्वर के समीप ले जाता है।

'' को ब्रह्म नाद माना गया है। श्रुति, स्मृति, पुराण और वेद सभी ग्रंथ भारत में संगीत के गहरे महत्व के साक्षी हैं। पुराने समय में हर बड़े संगीतकार को शिव का रूप माना जाता था। इतिहास बताता है कि यक्ष और गंधर्व आम लोगों के विवाह और जीवन की कहानियों को सुर और ताल में पिरोते थे। संगीत ही जीवन का संतुलन है। यही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप है।

शास्त्रीय संगीत और लोकगीत में अंतर :

शास्त्रीय संगीत नियम, राग, ताल और स्वरों की सीमा में बंधा होता है। दूसरी ओर लोकगीत दिल से निकलते हैं। इनमें कोई कठोर बंधन नहीं होता। ये किसी खास क्षेत्र की बोली में गाए जाते हैं और सीधे लोगों के जीवन से जुड़े होते हैं।

लोकगीत मौखिक परंपरा से चलते हैं। इनमें गाँव की रीत, विश्वास, परंपरा, अंधविश्वास, उम्मीद, डर, खुशी, दुख, खेती की सफलता और रोज़ की मेहनत सब कुछ शामिल होता है। ये देवी-देवता, शादी, मौसम, त्योहार और दैनिक काम से जुड़े होते हैं।

लोकगीत का सामाजिक महत्व :

लोकगीत किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं कहते। ये पूरे समुदाय की आवाज़ होते हैं। ये उस क्षेत्र के सामूहिक जीवन का दर्पण हैं। गाँव में लोग मंच के बिना भी अपनी भावनाएँ इन गीतों के ज़रिये बाँट लेते हैं।

शादी, जन्म, त्योहार जैसे मौकों पर लोकगीत रिश्तों को जोड़ने का काम करते हैं। कॉलेज के 'युवा महोत्सव' को ही ले लीजिए। वहाँ लोक कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्र, लय और तुकबंदी के साथ लोकगीतों को प्रस्तुत करते हैं। छात्र क्षेत्रीय पोशाक पहन कर उनकी धुन पर लोक नृत्य करते हैं।

मध्य प्रदेश की जनजातियाँ और संगीत :

मध्य प्रदेश में जनजातियों की बड़ी विविधता है। ज़्यादातर जनजातियाँ हिंदू धर्म को मानती हैं। गोंड यहाँ की प्रमुख जनजाति है। भील, बैगा, कोरकू, भारिया, हल्बा, कोल, मारिया जैसी कई उप-जनजातियाँ अलग-अलग ज़िलों में बसती हैं। जैसे भील धार, झाबुआ और निमाड़ में, बैगा मंडला- बालाघाट में, कोरकू बैतूल-छिंदवाड़ा में मिलते हैं।

इन सबके अपने लोकगीत हैं। खेती के समय बोआई, कटाई और रोपाई करते हुए गाना गाँव का आम दृश्य है। ये गीत थकान मिटाते हैं और काम में लय लाते हैं।

                                                             

बदलता समय और लोक संस्कृति :

हर इंसान अपने जीवन में शांति और संतुलन चाहता है। जब ये नहीं मिलता तो व्यक्ति बेचैन हो जाता है, जलन महसूस करता है और छोटी बात पर भड़क जाता है। गाँव के लोग सरल, ईमानदार और मेहनती होते हैं। उनके लिए खुशी बैंक में जमा पैसों से नहीं, मन की शांति से आती है।वैश्वीकरण के कारण आदिवासी समाज भी बदल रहा है। सरकार ने उनके विकास के लिए आरक्षण और नियम बनाए हैं। इससे कभी-कभी उनका सरल स्वभाव बदला हुआ लगता है।

यह सच है कि तकनीक से जीवन की शांति नहीं बढ़ती। संगीत में ही वह ताकत है जो बेचैन मन को शांत कर दे। और शांत व्यक्ति झगड़ा नहीं करता। गाँव का जीवन खेती पर टिका है। शहरों के मुकाबले गाँव में लोग ज़्यादा सुकून से प्राकृतिक जीवन जीते हैं।

नरसिंहपुर: इतिहास और आस्था का संगम :

भारत के नक्शे में मध्य प्रदेश की जगह वही है जो शरीर में दिल की। और नरसिंहपुर भौगोलिक रूप से भारत के बीचों-बीच है। राजगोंड वंश ने यहाँ अपनी उपजाऊ ज़मीन और प्राकृतिक संपदा के कारण लंबा शासन किया। राजा संग्राम शाह ने यहाँ बावन गढ़ बनवाए।

अठारहवीं सदी में जाट सरदार द्वारा नरसिंह मंदिर बनाने से पहले इस जगह को "गडरिया खेड़ा" कहते थे। गडरिया एक जनजाति है और 'खेड़ा' मतलब उनकी बस्ती। नरसिंहपुर भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार के लिए मशहूर है - आधा शरीर मनुष्य का, आधा मुख शेर का। यही नगर के आराध्य देव हैं। प्रह्लाद-हिरण्यकश्यप की कथा यहीं से जुड़ी है। प्रह्लाद की भक्ति से खुश होकर विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप का वध किया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि आग उसे नहीं जलाएगी। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने की कोशिश की। पर वरदान अकेली के लिए था। प्रह्लाद बच गया, होलिका जल गई। इसी से होली पर होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई।

नरसिंह मंदिर एक खंभे पर टिका है। उसके पीछे बड़ा तालाब है। मंदिर के तहखाने से राजा इंद्रपाल जाट के महल तक सुरंग जाती है। कहते हैं ढाई सौ साल पहले रानियाँ हाथी पर बैठ कर इस सुरंग से मंदिर दर्शन को आती थीं।

यहाँ रानी सती के मंदिर भी हैं जो पति-पत्नी के प्रेम और बलिदान की लोक कथा कहते हैं। बुंदेलखंड में लाला हरदौल के गीत, इसुरी, घाघ, भद्री, बंबुलिया, आल्हा-ऊदल के गीत बहुत लोकप्रिय हैं। माना जाता है कि मैहर की शारदा माता के मंदिर में आल्हा-ऊदल आज भी सुबह चार बजे पूजा करने आते हैं।

नर्मदा और लोक जीवन :

नरसिंहपुर की पहचान माँ नर्मदा से है। यहाँ के लोग नर्मदा को माँ मानते हैं। कहते हैं "नर्मदा का हर कंकर शंकर है" शादियों में नर्मदा को पहले न्योता दिया जाता है। यहाँ 'बंबुलिया' लोकगीत नर्मदा को समर्पित हैं।

नरसिंहपुर के चारों तरफ सागर, दमोह, छिंदवाड़ा, जबलपुर और होशंगाबाद ज़िले हैं। ये जबलपुर से नब्बे किलोमीटर दूर है। जबलपुर को संस्कारधानी और महाकौशल कहते हैं। यहाँ रानी दुर्गावती का किला आज भी है। उनके शौर्य के गीत लोग आज भी गाते हैं।

गोंड जनजाति के विवाह गीत

गोंड मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति है। इनके उप-वर्ग प्रधान, अगरिया, ओझा, नागरची, सोल्हा हैं। प्रधान लोग गोंड देवताओं की कथा सुनाते हैं। कहते हैं देवी पार्वती ने उनका पालन किया था। शिव ने उन्हें गुफा में रखा था। वीर लिंगल और देवी जांगू बाई ने उन्हें मुक्ति दिलाई। ये कथा शादियों में गीत के रूप में गाई जाती है।

गोंड शादियाँ आम तौर पर माता-पिता तय करते हैं। पर 'भगोरिया' प्रथा में लड़का-लड़की भाग कर शादी भी कर लेते हैं। मामा के बेटे से शादी करना भी यहाँ रिवाज़ है। विधवा अपने देवर से दूसरी शादी कर सकती है। दहेज नहीं लिया जाता, उल्टा दूल्हे का पिता दुल्हन को कीमत देता है।

शादी में महिलाएँ साड़ी, कांच की चूड़ियाँ और काले मोतियों के हार पहनती हैं। पुरुष और महिला दोनों भारी चाँदी के गहने पहनते हैं। चावल, मांस, महुआ की शराब और ताड़ी के साथ गाना-बजाना होता है। दादरा, रासलीला, करमा, जस, कहरवा, बन्ना-बन्नी जैसे गीत गाए जाते हैं।

लोकगीत की शक्ति और वर्तमान :

लोकगीत किसी स्कूल में नहीं सिखाए जाते। ये आदिवासियों के लिए सहज हैं। प्रकृति से सीखे हुए हैं। एकलव्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसने धनुर्विद्या गुरु द्रोण से नहीं, अपने मन और प्रकृति से सीखी।

ढोलक, नल, दफ, सारंगी, एकतारा, बांसुरी, करताल, घुंघरू, नगाड़ा, शंख जैसे वाद्य यंत्र लोकगीतों की जान हैं। कलाकार खुद भी मिट्टी, बांस, नारियल से वाद्य बना लेते हैं।

आज लोकगीतों का असर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी साहित्य और फिल्मों में भी दिखता है। शेक्सपियर, कीट्स, टैगोर, श्री अरविंद, सरोजिनी नायडू, गिरीश कर्नाड सभी ने लोक तत्वों से प्रेरणा ली। एम.एच. अब्राहम कहते हैं कि शेक्सपियर के 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' में तीन संदूक का चुनाव भी लोककथा से आया है।

फिल्मों में "ससुराल गेंदा फूल", "हम आपके हैं कौन", "लगान", "पीपली लाइव" के "महंगाई डायन" जैसे गीत लोक संगीत की ताकत दिखाते हैं।

निष्कर्ष :

ग्रामीण विवाह और त्योहारों में लोकगीत सबसे ज़रूरी हिस्सा हैं। ये सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज को जोड़ते हैं, व्यंग्य करते हैं, और संस्कृति को ज़िंदा रखते हैं। कहा जाता है - गीत पहले बना या सरगम? शायद गीत ही जीवन का सार है। ये हमें रोज़ की ज़िंदगी से उठाकर शाश्वत की तरफ ले जाता है।नरसिंहपुर की ये लोक परंपरा नर्मदा की तरह ही अविरल बहती है। यहाँ का इतिहास, अध्यात्म और लोक साहित्य सब इसमें समाहित है।