मंगलवार, 23 नवंबर 2021

 भारतवर्ष में योग की महिमा सदा से ही चली आती है हमारे पूर्वजों के ज्ञाता ऋषि मुनि योगियों ने इस विषय पर कई ग्रंथ लिखें है जो हम लोगों के व्यवहार में आते हैं दुख का विषय जटिल होने से भिन्न भिन्न आचार्यों द्वारा विभिन्न प्रकार से लिखा गया है इसलिए उन ग्रंथों से किसी अनुभवी योगी की सहायता के बिना योग को समझना सीखना और करना सर्वसाधारण के लिए सहज साध्य नहीं है तथापि योग के विषय में लोगों की महान उच्च धारणा है कि यूं ही सर्वोपरि विज्ञान और परम कल्याण का प्रशस्ति पत्र है वास्तविक ही योग का विज्ञान सर्वोपरि होने पर भी उसका यथा तथ्य निहित गूढ़ रहस्य लोग नहीं जान पाते की योग कैसे करना चाहिए योग का फल क्या है और कैसे मिलता है इस समस्या को सुलझाने के लिए महायोग के प्रवर्तक परम करुणामई पूज्यपाद श्रीमद् गुरुदेव श्री नारायण देव तीर्थ जी की इच्छा थी कि महायोग के वास्तविक विज्ञान को ग्रंथ रूप से प्रकाशित किया जाए ताकि योग के जिज्ञासु लोग समझ सके कि योग कैसा और क्या है?

अतः उनकी आज्ञा अनुसार ही कृपा से इस ग्रंथ की रचना हुई है इस महायोग के विज्ञान के विषय को लिखने के पूर्व इसके साधन करने वाले साधकों को इस विषय में जो आवश्यक उपदेश दिया जाता था साधकों के आग्रह से उसे अन्य साधकों के लाभार्थी प्रचलित प्रणाली के अनुसार ग्रंथ रूप में प्रकाशित करने का विचार हुआ परंतु इस महायोग के विज्ञान के समग्र विषय क्रमवार किसी एक ही ग्रंथ में ना होने के कारण यह कार्य सहज सहज साध्य नहीं था क्योंकि जितने भी आर्ष ग्रंथ हैं उन सभी में महायोग का nihit तत्व गुप्त विषय सांकेतिक रूप में मिलता है उसको साधारण लोग तो समझ ही नहीं सकते संस्कृत की अच्छी योग्यता वाला अनुभव रहित विद्वान पुरुषों के लिए भी समझना और समझाना सहज नहीं है तथापि गुरुदेव की आज्ञा और साधकों की इच्छा के वश में होकर यथामती योग के विषयों को वेद उपनिषद दर्शन तथा तंत्र पुराण आदि ग्रंथों से संग्रह कर इस ग्रंथ में क्रमबद्ध किया गया है ताकि हर एक जिज्ञासु महायोग के रहस्यमई विज्ञान को सरलता से समझ सकेl
 साधारणतया इस ग्रंथ में जितने भी प्रमाण दिए गए हैं रिशब वेद उपनिषद दर्शन तंत्र इतिहास पुराण आदि आर्ष ग्रंथों के ही हैं उनमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है परंतु पूर्वा पर की विषय संगति मिलाने के लिए लोगों को जो का त्यों कहीं कहीं आगे पीछे जोड़ दिया गया है सब लोग उपरोक्त शास्त्र ग्रंथों से वितरित किए गए हैं जिनका नाम सहित उल्लेख इस लोगों के प्रारंभ में ही कर दिया गया है इस ग्रंथ में श्लोकों के शब्दार्थ की अपेक्षा विशेष करके भावार्थ को ही ग्रहण करने की चेष्टा की है संभव है कि संस्कृत जाने वाले पाठक इसे पसंद ना करें तथा फीसद उद्देश्य से प्रेरित होकर वास्तविकता को समझने और समझाने का प्रयत्न किया गया है अतएव विज्ञ पाठक गण इससे थोड़ा बहुत लाभ उठा सकेंगे

सोमवार, 17 मई 2021

कोर्ट : एक धोका , जेल : आत्मसुधार केंद्र

19 March 2021
आज  मै सेंट्रल जेल नरसिंहपुर गई  और जेल सुपरिंटेंडेंट मैडम शैफाली तिवारी से मिली।जेल के मुख्य द्वार पर लिखा हुआ है घृणा पाप से करो पापी से नहीं।

नरसिंहपुर  का यह सेंट्रल जेल पहले बोरस्टलजेल के नाम से जाना जाता था । यह किशोर बंदी गृह मध्य प्रदेश का एकमात्र जेल था।  

यह जेल साल में एक बार गणेश स्थापना अवसर पर गजानन दर्शन हेतु  पब्लिक के दर्शनार्थ खोला जाता था। जहां हम अपने माता पिता और परिजनों के साथ गणेश जी के दर्शन हेतु जाते थे और कैदियों द्वारा बनाई गई हस्तशिल्प कला और अन्य रचनात्मक कार्यों को देखते और उनकी हौसला अफजाई करते थे।

यह जेल नरसिंहपुर स्टेशन के पास स्थित है। वर्तमान में यहां कैदियों की संख्या 1300 है जो कि एक बहुत ही चिंतनीय विषय है। अपराध और अपराधियों की बढ़ती संख्या को देखकर निश्चित रूप से बहुत ही दुख होता है।

अपराध की संख्या देखते हुए ऐसा लगता है  कहीं एक दिन ऐसा ना आ जाए कि अपराधियों की संख्या इतनी बढ़ जाए कि जेल भी छोटी पड़ जाए।

कारागार  सुधार  गृह भारतीय कानून व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण  अंग है । नरसिंहपुर सेंट्रल जेल की जेल अधीक्षक के  अथक प्रयासों के बाद यह जेल *आश्रम* जैसा स्थान  लगता है। सफेद कुर्ता- पैजामा और सफेद टोपी पहने हुए कैदी अपने- अपने कार्यों में मग्न दिखाई दिए। सभी दिल लगाकर एकता से एकाग्रता से कार्य कर रहे थे। जब व्यक्ति कोई काम नहीं करता है तभी उसके मन में अनेकों विचार आते हैं यह भी कहा गया है *खाली दिमाग शैतान का घर* ।कुछ ना कुछ करते ही रहना चाहिए । एक कैदी को उसकी सामर्थ्य के अनुसार कार्य देना ,निश्चित ही यह कुशल प्रशासनिक अधिकारी की ही पहचान है। 

जेल के गेट में प्रवेश होते ही *ययाति* की पेंटिंग  है जोकि है बहुत ही प्रेरणादायक है। उसके बाद मैडम शैफाली तिवारी के द्वारा बनाई गई *महात्मा ‌बुद्ध* की पेंटिंग हृदय परिवर्तन  और *आत्मज्ञान तथा ध्यान पर* केंद्रित है।

वैसे तो  विस्तार से देखें तो हम सभी इस संसार में कैदी ही हैं  और  यदि आध्यात्मिक स्तर पर देखें तो हमारी आत्मा विभिन्न प्रकार के बंधनों से बंधी हुई इस शरीर रूपी पिंजड़े में कैद है।
जब हमें आत्मज्ञान प्राप्त होता है तब हम इस माया नगरी और मायापति को समझने में सक्षम हो जाते हैं।

यदि जनसाधारण को यह समझ में आ जाएगी *ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या* और हम सब उस  ईश्वर के अंश  है  आत्मा अर्थात जीव जो अविनाशी  है तो विषय विकारों की बहुत हद तक छुट्टी हो जाए।

कारागार  में रहकर ही बहुत से असाधारण कार्य हुए  महात्मा गांधी , नेहरू , विनोबा भावे ने लोक कल्याण हेतु  किताबें  लिखीं। लोकमान्य गंगाधर तिलक ने  गीता लिखी जो  कर्मयोग की दुनिया में सबसे अच्छी व्याख्या करती है।  


यह भजन वैसे तो दो आंखें बारह हांथ फिल्म से है,यह फिल्म प्रेरणा।  देती है कि  समाजसुधार में आध्यात्मिक बल का उत्कृष्ट योगदान होता है,  इसमें हमें आत्म सुधार देखने को मिलता है। 

लगान  फिल्म में भी सच्चाई का ही बल और पुरुषार्थ और माँ का बच्चे के साथ मनोबल के रुप में खड़ा होना, मूल तत्व के रुप में है। 

मेरा भी यही मानना है कि जब तक  व्यक्ति आत्मज्ञान  हेतु प्रयास नहीं होता तब तक व्यक्ति गलत राह में भटक सकता है। 

मैडम तिवारी के बारे में नरसिंहपुर वासियों की राय है कि उन्होंने कारागार को जन्नत बना दिया है अपराधी अब कारवास से बाहर जाना  नहीं चाहते हैं । वास्तव में , शेफाली तिवारी मैडम highly intellecutal multidimentional personality की स्वामिनी हैं।
कारावास के बारे में यह भी प्रसिद्ध है कि *मथुरा में श्री कृष्ण भगवान का जन्म भी कारावास में* ही हुआ था अतः कारावास कोई अभिशप्त जगह नहीं है।

मैडम शेफाली तिवारी के  प्रयासों का ही यह प्रतिफल है कि अपराधियों द्वारा विभिन्न प्रकार रचनात्मक कार्य *कुशलतापूर्ण* किये जा रहे हैं जैसे संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति के लिए सुंदर स्टेज का निर्माण ,  लकड़ी से कुर्सी टेबल बनाने का काम, बाग बगीचे की देखरेख , हॉर्टिकल्चर, चित्रकारी, शिल्प कला, शास्त्रीय संगीत  सुर-ताल राग का विधिवत प्रशिक्षण जैसे तबला हारमोनियम ढोलक में कैदियों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करवाना और उनके लिए अपनी ओर से संगीत शिक्षक की व्यवस्था करना, उनसे सहृदय व्यवहार करना यह सिद्ध करता है कि  अपराधियों के लिए उनके मन में सुधार की भावना है।

Music Therapy या संगीत चिकित्सा किसी भी अन्य चिकित्सा पद्धति के समान मानसिक रोगों की चिकित्सा कर रोगी के स्वस्थ होने की दर को बढ़ा देती है और व्यक्ति पुनः एक नए जीवन का शुरुआत करता है पिछली जिंदगी को भूलकर आगे की नई जिंदगी को सही दिशा ले जा सकता है। 

कैदियों  को काउंसलिंग देने का कार्य सिर्फ वही कर सकता है जो परमात्मा का अनन्य भक्त हो जिस पर परमात्मा की अनन्य कृपा हो जो अपनी संगति से गलत रास्ते पर चलने वाले व्यक्तियों को सही रास्ते पर ना सके।कोई भी टीचर या कोई भी काउंसलर सिर्फ प्रेरणा दे सकता है गृहण करना तो सामने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है।मेरी पीएचडी का विषय  ट्रांसफॉरमेशन ऑफ माइंड है और यह विषय साइकोलॉजि का है ।

तुलसीदासजी कहते हैं- “सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई” अर्थात दुष्ट प्राणी भी अच्छी संगति पाकर सुधर जाते हैं जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुंदर चमकीला हो जाता है.
 
कई बार यह भी देखा गया है  कोर्ट के गलत निर्णय की वजह से निर्दोष व्यक्ति सजा पाता है । ऐसे  तथाकथित न्यायाधीशों को तो ईश्वर  या  प्राकृतिक  न्याय व्यवस्था ही दंडित करती है। 

अभी हाल ही में पता चला है कि  उत्तर प्रदेश का एक व्यक्ति  वकील और सबूत के अभाव में  कोर्ट केस हर जाता है और बीस वर्षों तक सजा पाता है और  एक दिन जब दूसरी कोर्ट  का यह निर्णय आता है कि यह  निर्दोष है इसे सजा मुक्त किया जाता है जब वह अपने घर लौटता है तो उसके माता पिता  दुनिया में नहीं होते हैं उसका परिवार इस दुनिया में नहीं  होता है । अतः वह फिर से कारागार में अपने जीवन जीने की व्यवस्था ढूंढता है। ना तो  उन्हे हाई कोर्ट ना ही सुप्रीम कोर्ट ही   बेचारे अशिक्षित कैदियों को कैद से छूटने के बाद उनके परिवार उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते हैं उन का भरण पोषण नहीं कर पाते हैं अतः वे जानबूझकर कोई दूसरा अपराध करते हुए दिखाई देते हैं और कारागार में रहने की व्यवस्था ढूंढते हैं। 

वास्तव में जैसा मैंने अनुभव किया  कारावास में  साधारण निम्न वर्ग के अपराधी ज्यादा थे । आजकल विशेष श्रेणी के राजनैतिक और संपन्न अपराधी जैसे सलमान खान और संजय दत्त  के लिए कारागार सुरक्षित आराम गृह  और पुलिस व दूसरे गैंगो से बचने का सुरक्षित स्थान बन चुके हैं।

वास्तव में, जब  मानसिक अस्वस्थता ही व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जातीहै। Strong mind  वाला व्यक्ति अपनी क्षमता पर विश्वास रखता है अपने स्वविवेक से निर्णय लेते हुए अपना जीवन आनंद पूर्ण जीता है। इसी लोक कल्याण की भावना को हमें जन-जन तक पहुंचाना चाहिए और  जीवन जीने का वास्तविक लक्ष्य इंद्रिय सुख ना होकर  ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए। 

यह संदेश हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सके तो अपराध की बढ़ती संख्या को कम कर सकते हैं।


रविवार, 16 मई 2021

जाऊं कहां तजि चरण तुम्हारे : जगदम्बा मां

उन्होंने हमेशा मुझे अपना आशीर्वाद दिया उनके अंतिम शब्द थे अब तुम खुश रहना ।  तुम्हारी पीएचडी हो गई ।मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। मैं  बहुत दुखी हो गई  , ...' ' मां तुम कहां जा रही हो  ऐसा मत कहो तुम हो तो मै खुश हूं।"

मां की सौम्यता और दयालुता के लिए आत्मीय स्वजन उनकी सदा सराहना करते आए हैं। मां जगदम्बा के अवतार के रूप में  घर परिवार को संवारती हैं। उनके  योगदान से ही घर एक मंदिर बन जाता है और लोगों द्वारा  ईश्वर की पूजा की जाती है। 

परिवार में होने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए धैर्य और क्षमता के लिए उन्हें गुरुदेव और अन्य पूज्य लोगों द्वारा सराहना मिली। उन्होंने पत्नि के रूप में अपने पति की  देवी सीता के समान सेवा की। 

मां के अस्तित्व का पहला प्रमाण उनकी संतान हैं उनकी बनायी हुई यह गृहस्थी संसार अर्थात् परिवार है। मै अपनी मां की परछाई मैं अपने में और भाईयों में देखती हूं। मां भले ही भौतिक स्वरूप में हमारे साथ न हों पर हर समय उनका आर्शीवाद हमारे साथ रहता ही है ।यह अनुभूति परक सत्य है।माता पिता  ही हमारे प्रथम गुरु हैं। 

मां के स्वभाव व आचार विचार में ध्यान से उत्पन्न प्रेम और शांति, गुरु  आशीष की अनुभूति होती।  उनका चेहरा हमेशा फूल के समान खिला रहता । पारिवारिक सदस्यों  में भी एक आध्यात्मिक आश्वस्ति की अनुभूति होती। हो भी क्यों नहीं, योग साधना ध्यान तपस्या का संगम जो था नरसिंहपुर स्थित निवास स्थल । ध्यान की शांति में ईश्वर  गुरुदेव की  उपस्थित आशीर्वाद का आभास होता।
जिस साधना को पाने के लिए योगी अपने जीवनके अमूल्य समय को नष्ट करते हैं, उसे सहज ही सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं होने देते गुरुदेव ने हमें वही  साधना प्रदान की। योगी या महात्मा  ईश्वर की शास्वत् सत्ता में निवास करता है।

यह वह स्थल है, जहां हमारे गुरुदेव ने हमारे साथ चातुर्मास किया। इसी घर में हमारे माता पिता की दीक्षा हुई आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु ध्यान करने साधक गण आए  ।   यह स्थान  दोनों जन्मभूमि व  कर्मभूमि भी बनी। गुरुदेव के दर्शन करने  दूर-दराज से उनके भक्त आते।  सभी भक्त अनुशासित और ध्यान में मग्न रहते।

 मां अहंकार, राग-द्वेष, स्वार्थपरता, मिथ्याभिमान, अहंभाव, काम, लोभ तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त रहीं। इसलिए कई साधक उन्हें परमहंस योगी तक की उपाधि देते।

 मां की आवाज बहुत ही मधुर थी वे जब गाती ऐसा लगता है कि कोई सिद्ध गायिका गा रही हो। वे सभी रागों के गीत गा लेती थी और बहुत ही प्रवीणता के साथ। उनकी आवाज में चुंबकीय आकर्षण था। वे नृत्य कला मैं भी पारंगत थी। पारिवारिक सदस्य  बुआ जी पापा जी और दादी सब उन्हें लता मंगेशकर कीउपाधि देकर उनके गायन संगीत का सम्मान करते परंतु शास्त्रीय संगीत को उन्होंने अपना व्यवसाय या प्रोफेशन नहीं बनाया। रामचरितमानस जब भी गाती तब हम उन्हें बहुत ध्यान से सुनते और आनंद लेते।

मां पाक कला में भी प्रवीण थीं चूंकि वे जीव विज्ञान  संकाय की विद्यार्थी रही थी अतः  किस सब्जीमे कौन सा विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्स मिलते हैं यह उनको पता होता. जिन के लिए खाना बनाया जा रहा है उनको रोज कैसा खाना जरूरी है  डाइबिटीज थायरॉयड ब्लड प्रेशर वालों को कैसा  भोजन लेना चाहिए  ये सब भी उन्हें पता होता।  मां केवल  चुनिंदा  रोटी सब्जी दाल चावल अचार पापड़ सलाद को ही  रोज का भोजन न बना कर अलग अलग रेसिपीज को भी बनातीं कभी  कुछ अच्छा पत्रिकाओं में पढ कर कभी बाहर  खाकर उन सभी रैसिपीज को भी ट्राई करती। मां का प्यार मा  के हाथ का भोजन प्रशाद बहुत स्वादिष्ट प्रेम पूर्वक बनाई गई स्वास्थ्य वर्धक रसोई होती। कहते हैं ना जैसा खाए अन्न वैसा बने मन।

बचपन में हम तीनों  बच्चों के लिए हमेशा नई  नई अच्छी अच्छी चीजें बनाकर खिलातीं। अच्छा खाना पकाने की वजह से उनकी हर तरफ तारीफ होती । रिश्तेदार मां के हाथ का साधारण सा भोजन कर  के भी उनकी तारीफ करते और उनके खाना बनाने के हुनर की वजह से इज्जत भी करते। हम तीनों बच्चों को भी किचन में काम करना पसंद था कुकिंग में रुचि थी तो मां हमें इसके लिए प्रोत्साहित करतीं थीं  वे कहतीं  खाना बनाना एक ऐसा कौशल है जो जीवन में बहुत आवश्यक है। 

 घर की  व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भी वे  बहुत ही कुशलता के साथ निभातीं। यह बहुत ही आश्चर्य करने वाली बात है और सुखद भी  कि उनके सभी कपड़ेे आलमारी में बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से रखे रहते। किचन की अलमारी में कौन से खंड में किस नंबर पर धने का  हल्दी का स्टील का डिब्बा रखा है उन्हें आखिरी समय तक याद था। किचन के सभी डिब्बे साफ  करीने से रखना उनके व्यक्तित्व  का  एक और प्रमुख  गुण था ।

मां पढ़ी लिखी सुशिक्षित हाउस वाइफ थीं। उन्हें सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में टीचर शिप के लिए भी आमंत्रित किया गया था परंतु उनके लिए घर और परिवार ही सर्वोपरि था।  उनका पूरा ध्यान  उनके जीवन की धुरी सिर्फ उनका घर परिवार था।  जिससे वे समय पर आसानी से काम कर लेती थीं. वे अपने घर के कामों को बखूबी संभाले हुए थीं।. पिताजी को घर की शॉपिंग की लिस्ट बनाकर देना, खाना बनाना,  सभी बच्चों को पढ़ाना या घर की सफाई सभी चीज समय पर और परफेक्ट , तभी तो ससुराल में उन्हें कहते कि वे घर गृहस्थी चलाने में पीएचडी हैं।

 उन्होंने हमेशा बहुत ही समझदारी शांति और मौन- कम बोलना ज्यादा समझना से काम लिया हर   झगड़ालू इंसान से वाद-विवाद  कर अपना मूड ख़राब करने से हमें बचाती  और इससे बचने के  खुद भी हर संभव प्रयास करतीं क्योंकि किसी भी तरह का विवाद हमारे  लिए मददगार  सिद्ध नहीं होता।
वे कहतीं  जिस तरह  खाने को लज़ीज़ बनाने के लिए खट्टा मीठा, तीखा, कड़वा सभी स्वाद आवश्यक  है, उसी तरह जीवन में सभी रंग होते हैं थोड़ा-सा दुःख भी जीवन में ज़रूरी है और तभी सुख की असली क़ीमत पता लगती है. 

कभी कभी जब हम ग़ैर-यथार्थवादी बातें करते  और अपने जीवन को अपने ही हाथों गलत दिशा में ले जाते हैं मां हमेशा हमें सही राह पे ले जाने की कोशिश करतीं‌ परंतु शायद मां हमारे प्रारब्ध से संघर्ष नहीं कर पातीं।  जरा सा भी दुख बच्चों को ना हो मां हमेशा ईश्वर से यही दुआ करतीं। जब हमारे दोस्तों से हमारा झगड़ा होता यह झगड़ा कई बार  मूड ख़राब कर देता और हम अपना आपा खो देते  इससे और आग  भड़कती तब  मां कहती अगर तुम सहयोग नहीं करोगे , तो कोई तुमसे नहीं झगड़ सकता है. वे प्रेमी स्वभाव की बहुत ही सौम्य और कोमल ह्रदय के व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। उनका कहना था सबसे अच्छा रिश्ता बनाए रखने की कोशिश करो  प्रेम से बात करो। 

कभी कभी ग़लतफ़हमी के चलते हमारे और हमारे प्रिय जनों के बीच थोड़ी दरार पड़ जाए तो भी वे कहती कि लड़ाई झगड़े के बावजूद भी अपने व्यवहार में  संजीदगी बनाए रखना चाहिए . यदि कोई समस्या है तो उसे  तुरंत खत्म कर देना चाहिए  समस्या को हल्के में नहीं लेना चाहिए। अपने आपको हर परिस्थिति में ढालने की कोशिश करते  रहना चाहिए । वे कहतीं किसी समस्या को टालना नहीं, बल्कि जल्दी-से-जल्दी उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करना चाहिए. दूसरों को यह बताने के लिए ज़्यादा उतावले नहीं होना चाहिए कि आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं. यदि  जीवनसाथी की वजह से  दिल दुखता है तो अपना मन कुछ अच्छा पढ़ने में लगाओ या घर के काम में अपना दिमाग डाईवर्ट करो , किसी बगीचे में घूम आओ या  अपने  किसी  पालतू पशु के साथ समय बिताकर  अपना मूड  फ्रेश करने  की  कोशिश करो।

मां घर परिवार में सुखद वातावरण के साथ-साथ डेली रूटीन के काम कर अनुशासन  भी बनाए रखतीं। भाषा की मर्यादा बनाए रखना हमने उनसे ही सीखा। मां ने  कभी भी किसी से  ऊंची आवाज में बात नहीं की ना ही उत्तेजित होकर किसी को डांटा । वे सदैव ही हंसती मुस्कुराती रहतीं। हर आने वाले व्यक्ति का दिल से स्वागत करतीं और  भोजन करवातीं।  हमें तो हमारी मां मां जगदंबा का अवतार सी लगतीं  -जय जय जय जग जननी माता द्वार तिहाारे जो भी आता बिन मांगे सब कुछ पा जाता।
हमारी मां  संपन्न घराने से थीं हर चीज से संतुष्ट  उनके घर में किसी भी बात की कमी नहीं थीं । हर काम के लिए उनके मां - पापा  के यहां नौकर लगे हुए थे परन्तु ससुराल में उन्होंने किसी भी काम से परहेज़ नहीं किया । उनके हर काम  में पूर्णता थी ।उनके कपड़े बिल्कुल साफ स्वच्छ धुले हुए रहते वे कपड़े इस्त्री करके पहिनती थीं। आज भी अलमारी में हर कपड़ा बहुत ही सलीके से संभाल के प्रेस करके रखा मिलेगा

इतनी पढ़ी लिखी अच्छे घर से होने के बावजूद भी गेहूं साफ करके पिसवाना हल्दी धना पिसवाना, सभी प्रकार के अचार बनाना यह सब उनका सदाबहार काम रहता था। चावल के  पापड़ , उरद मूंग के पापड़ , बिजौरा आंवले का मुरब्बा , नींबू का अचार, आंवले का अचार उनके हाथ का बनाया हुआ आज भी हम खा रहे हैं।
 
हम पैसे तो बना सकते हैं परन्तु मां का जीवन हमारे  हाथों से फिसल गया। न ही चिकित्सक, न संपर्क और न ही दोस्त मददगार  सिद्ध हुए .  उनके साथ बिताया हुआ समय बहुत ही आनन्ददायी और  शांतिपूर्ण रहा। हर संपर्क में आने वाला व्यक्ति रिश्तेदार मा से प्रभावित रहता हमारी बड़ी बुआजी और दादी हमारी मां की बहुत प्रशंसा करतीं उनके लिए  हमारी मां घर गृहस्थी में पीएचडी थीं। यह बहुत बड़ी उपाधि है मां के लिए।

मां ने हर परिस्थिति में  ससुराल का अपने परिवार का साथ दिया  छोटी बुआ की शादी के लिए उन्होंने अपने सारे सोने के जेवर गहने बुआ को दे दिए। बड़ी बुआ हमेशा नरसिंहपुर आती रहती उनके बच्चों को भी मां पढ़ाती और अपने बच्चों का प्यार दुलार उन पर लुटातीं रहतीं। दोनों बुआ के बच्चों ने हमारे माता-पिता के सहयोग से ही अपनी पढ़ाई पूरी की। मां का कहना था अगर आप किसी परिस्थिति से घबराकर भागेंगे- तो वह आपका पीछा हर निकृष्ट तरीक़े से करेगी. किसी के साथ तनावपूर्ण संबंध को जहां तक सम्भव हो बात को बढ़ने न दें.। ऐसी निश्छल निर्मल निष्काम मां की महिमा को कोटि-कोटि प्रणाम🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

सूर्य चिकित्सा




वर्तमान में योग एक बहुत प्रचलित शब्द है, जिसका अर्थ है जोड़ना। यहां पर जोड़ने से तात्पर्य स्थूल को सूक्ष्म से जोड़ने से है। योग का सम्बन्ध मनुष्य की वैयक्तिक चेतना का ब्रह्मांडीय चेतना के मिलन से है। योग के आदि प्रणेता भगवान शिव हैं। शरीर के आंतरिक विकारों को दूर कर मन एवं चित्त को स्थिर करने तथा अन्त:करण को शुद्ध कर असीम आनंद की प्राप्ति के लिए विकसित यौगिक प्रक्रिया ही योग कहलाती है। योग के कुल आठ अंग हैं। इसी कारण इसे अष्टांग योग कहा जाता है। इसके अभ्यास से मानव साधारण से विलक्षण बन सकता है।

हमारे ऋषि मुनियों ने योग के द्वारा शरीर मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताएँ हैं, जिसे अष्टांग योग कहते हैं.ये निम्न हैं-

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रात्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि

सूर्य नमस्कार 12 योगासनों को मिलाकर बनाया गया है. हर एक आसान का अपना महत्व है. इसे करने वालों का कार्डियोवस्कुलर स्वास्थ्य अच्छा रहता है. साथ ही शरीर में खून का संचार भी दुरुस्त होता है. सूर्य नमस्कार के जरिए आप अपना तनाव कम कर सकते हैं और इससे शरीरी को डिटॉक्स करने में मदद मिलती है.

सूर्य नमस्कार शुरू करने के कुछ ही समय के भीतर आप अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति में काफी अंतर पाएंगे. एक नजर सूर्य नमस्कार के 10 फायदों पर...

1निरोगी काया  
सूर्य नमस्कार को डेली रूटीन में शामिल कर सही तरीके से किया जाए तो आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आएगी. 12 आसनों के दौरान गहरी सांस लेनी होती है जिससे शरीर को फायदा होता है.

2. बेहतर पाचन तंत्र
सूर्य नमस्कार के दौरान उदर के अंगों की स्ट्रेचिंग होती है जिससे पाचन तंत्र सुधरता है. जिन लोगों को कब्ज, अपच या पेट में जलन की शिकायत होती है, उन्हें हर सुबह खाली पेट सूर्य नमस्कार करना फायदेमंद होगा.

3. सूर्य नमस्कार करने से पेट कम होता है
आसनों से उदर की मांसपेशी मजबूत होती है. अगर इन्हें रेगुलर किया जाए, तो पेट की चर्बी कम होती है.

4. डिटॉक्स करने में मिलती है मदद
आसनों के दौरान सांस साँस खींचना और छोड़ने से फेंफड़े तक हवा पहुंचती है. इससे खून तक ऑक्सीजन पहुंचता है जिससे शरीर में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड और बाकी जहरीली गैस से छुटकारा मिलता है.

5. मानसिक चिंता से मुक्ति
सूर्य नमस्कार करने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और नर्वस सिस्टम शांत होता है जिससे आपकी चिंता दूर होती है. सूर्य नमस्कार से एंडोक्राइन ग्लैंड्स खासकर थॉयरायड ग्लैंड की क्रिया नॉर्मल होती है.

6. शरीर में लचीलापन आता है
सूर्य नमस्कार के आसन से पूरे शरीर का वर्कआउट होता है. इससे शरीर फ्लेक्सिबल होता है.

7. मासिक-धर्म रेगुलर होता है
अगर किसी महिला को अनियमित मासिक चक्र की शिकायत है, तो सूर्य नमस्कार के आसन करने से परेशानी दूर होगी. इन आसनों को रेगुलर करने से बच्चे के जन्म के दौरान भी दर्द कम होता है.

8. रीढ़ की हड्डी को मिलती है मजबूती
सूर्य नमस्कार के दौरान स्ट्रेचिंग से मांसपेशी और लीगामेंट के साथ रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है और कमर लचीला होता है.

9. सूर्य नमस्कार से आप रहेंगे जवान
सूर्य नमस्कार करने से चेहरे पर झुर्रियां देर से आती हैं और स्किन में ग्लो आता है.

10 वजन कम करने में मदद
सूर्य नमस्कार करने आप जितनी तेजी से वजन कम कर सकते हैं, उतनी जल्दी डायटिंग से भी फायदा नहीं होता. अगर इसे तेजी से किया जाए तो ये आपका बढ़िया कार्डियोवस्कुलर वर्कआउट हो सकता है.

योग मांस पेशियों को पुष्ट करता है और शरीर को तंदुरुस्त बनाता है, तो वहीं दूसरी ओर योग से शरीर से फैट को भी कम किया जा सकता है. 5. ब्लड शुगर लेवल करे कंट्रोल: योग से आप अपने ब्लड शुगर लेवल को भी कंट्रोल करता है और बढ़े हुए ब्लड शुगर लेवल को घटता है. डायबिटीज रोगियों के लिए योग बेहद फायदेमंद है.


सूर्य नमस्कार कौन न करे...
- गर्भवती महिला तीसरे महीने के गर्भ के बाद से इसे करना बंद कर दें
- हर्निया और उच्च रक्ताचाप के मरीजों को सूर्य नमस्कार नहीं करने की सलाह दी जाती है
- पीठ दर्द की समस्या से ग्रस्त लोग सूर्य नमस्कार शुरू करने से पहले उचित सलाह जरूर लें
- महिलाएं पीरियड के दौरान सूर्य नमस्कार और अन्य आसन न करें


बुधवार, 7 अप्रैल 2021

सूर्य नमस्कार , सर्वांगासन, हलासन, प्राणायाम , ध्यान




योगगुरु के रूप में जब मैं इंजीनियरिंग कॉलेज मुंबई के एनएसएस के वोलेंटियर्स को प्रशिक्षण दे रही थी तब बहुत सी  घटनाएं  हुई  जो बहुत ही मधुर और अविस्मरणीय है। जिन्हें एक बार में लिखना तो बहुत मुश्किल है धीरे-धीरे टुकड़ों में लिखती रहूंगी। इस दौरान हमने छोटे छोटे गांवों के चहुंमुखी विकास के लिए बहुत सारे कार्यक्रम किए। 

एक सीनियर अनुभवी प्रोफेसर और मेडिकल इंजीनियरिंग डेंटल छात्र-छात्राओं की रेक्टर होने के बावजूद भी मैंने कुछ इंटरेस्टेड टीचिंग स्टाफ और नॉन टीचिंग स्टाफ और स्टूडेंट्स को योग हेतु प्रोत्साहित किया और सर्वांगासन हलासन भुजंगासन गरुणासन पद्मासन प्राणायाम सिखाया।हॉस्टल की छात्राएं भी जब बहुत ही ज्यादा तनावग्रस्त होतीं तो मैं उन्हें योग और ध्यान करने की शिक्षा देती। चौबीस घंटे एक ही परिसर में रहने की वजह से छात्राओं को योग सिखाना प्रबंधन की नजर में ब्राउनी पॉइंट स्कोर करने जैसा था परंतु योग कक्षा कंडक्ट करने के लिए मुझे उचित स्थान नहीं मिल रहा था। कभी कॉन्फ्रेंस रूम, कभी लॉबी, कभी गार्डन में लंचटाइम में या उसके बाद मैंने कुछ मेडिकल छात्राओं की सप्ताह में एक बार योग कक्षा  कंडक्ट की और योग कक्षा की स्थापना के बारे में प्रबंधन से बात की।

एनएसएस या राष्ट्रीय सेवा योजना के तहत राष्ट्र शक्ति का विकास युवाओं द्वारा किया जाता है।यह युवाओं की पर्सनैलिटी डेवलपमेंट  और स्किल डेवलपमेंट में बहुत सहायक होता है। बेज  में कोणार्क व्हील में आठ बार हैं जो दिन के 24 घंटे का प्रतिनिधित्व करते हैं  यानी 24 घंटों की अनवरत सेवा। बैज में लाल रंग इस बात को प्रतीक है  कि एनएसएस स्वयंसेवक रक्त से भरे हैं वे जीवंत, सक्रिय, ऊर्जावान और उच्च भावना वाले है। नौसेना का नीला रंग ब्रह्मांड का प्रतीक  है जिसमें एनएसएस एक छोटा सा हिस्सा है, जो मानव जाति के कल्याण के लिए अपने हिस्से का योगदान करने के लिए तैयार है।
योग और ध्यान के अलावा हमने (मुंबई यूनिवर्सिटी) स्वच्छता अभियान रेली निकलवाना,  गांवों के चौराहे पर स्वच्छता जागरूकता फैलाने हेतु वॉलिंटियर्स द्वारा नुक्कड़ नाटक करवा कर ग्राम वासियों को कचरा एक जगह इकट्ठा कर के डब्बे में डालने हेतु प्रोत्साहित करना।इस बात के लिए जागरूक करना कि कचरा या गंदगी में रहने से ही बहुत सारे रोग और बीमारियां फैलती हैं। शौचालय बनवाना, खानपान से संबंधित जागरूकता फैलाना, ब्लड डोनेशन, गांधी जयंती स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्रता दिवस पर गेटवे ऑफ इंडिया में भजन संध्या का कार्यक्रम करवाना, महाराष्ट्र गवर्मेंट की और से ट्री प्लांटेशन करवाना , आदि प्रमुख थे।

नुक्कड़  एक  नाट्य विधा है, जो  रंगमंच   से भिन्‍न है । इसके लिए मंच की आवश्यकता नहीं होती। इसमेंंंं कलाकार नाच गाकर , अभिनय करके किसी सड़क, गली, चौराहे या किसी संस्‍थान के गेट अथवा किसी भी सार्वजनिक स्‍थल पर भीड़ एकत्रित करके किसी समसामयिक समस्या को रखतेे हैं। हमारे प्रिय और मेधावी सक्रिय कार्यकर्ता प्रियंका वाटकर के नेतृत्व में  नुक्कड़ द्वारा गांव की समस्या और उसके समाधान को रखने में सफल रहे उन्होंने परिस्थितियों और समस्याओं को नुक्कड़ द्वारा अभिव्यक्त किया । 
प्रभारी अधिकारी के रूप में एनएसएस में कार्य कर मुझे जो अनुभव हुआ वह इन पंक्तियों को साकार करता है।
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... 
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार....
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार...
जीना इसी का नाम है.... 

मुंबई से थोड़ी दूर पर गुलसुंदे  नामका एक गांव है जहां पर बहुत पुराना लगभग 800 साल से भी ज्यादा पुराना शिव मंदिर है 

जो कि सिद्ध मंदिर के रूप में जाना जाता है और वही शिव मंदिर के पास पातालगंगा नाम की नदी बहती रहती है। यह गांव और मंदिर बहुत ही सुंदर और शांत स्थल है।  गांव वालों के साथ मिलकर गांव की प्रगति के लिए कार्य करना शुरू किया। 
हमारे वॉलिंटियर्स और स्टाफ मेंबर्स सभी एकजुट होकर घुल मिलकर इतने अच्छे से कार्यरत थे कि लगता ही नहीं था कि केवल आठ दिन के लिए यहां पर है।


यह युवाओं की पर्सनैलिटी डेवलपमेंट  और स्किल डेवलपमेंट में बहुत सहायक होता है।
सात दिनों तक शिविर में स्टूडेंट्स ने सेवा कार्य करते हुए लोगों को श्रमदान के लिए जागरूक किया।
 ग्राम वासियों को शिक्षा व स्वच्छता के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा दी। 

मेरे  योग प्रशिक्षण में, मुझे वॉलिंटियर्स  को बुनियादी सूर्य नमस्कार सिखाने के लिए कहा गया था, योग करवाने के लिए पूरी तरह से निर्देश की स्पष्टता, कक्षा के साथ संबंध बनाने की  क्षमता और वोलेंटियर्स के दिल से बोलने की हिम्मत देने की प्रेरणा एक अच्छे प्रशिक्षक का कर्तव्य था। 
प्रतिदिन सुबह सूर्योदय के समय के योग ध्यान भजन के दैनिक अभ्यास से सभी कार्यकर्ताओं में अंतः-शांति, संवेदनशीलता, अंतर्ज्ञान और जागरूकता और बढ़ती और वे ज्यादा परफेक्शन से कार्य करते। 
कई वोलेंटियर्स  का काम में मन नहीं लगता नई उम्र के  वोलेंटियर्स थे , उन सभी का मन पेंडुलम की तरह डोलता कि इस कार्य को करने में मुझे लाभ है कि नहीं । स्वाभाविक रुप से -  भूत से भविष्य, अफसोस और गुस्से से चिंता, एवम भय और ख़ुशी से दुख के बीच में झूलते रहता I योग आसन  और  सुखद वातावरण उन्हें जीवन में सामंजस्य समता बनाए रखने में सक्षम बनाता। 

योग आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यक्ता है। यह केवल व्यायाम की प्राचीन पद्धति ही नहीं है बल्कि  कई शारीरिक मानसिक बीमारियों का समाधान भी है। योग गुरु के रूप में  वोलेंटियर्स से  सुबह मात्र कसरत करवाने से वोलेंटियर्स को दिनभर कार्य करने की ऊर्जा मिलती  थकान नहीं आती और  दिन भर कार्य करने के लिए शरीर का लचीलापन भी  बढ़ाता।
मेरी सुबह 5:00 बजे की योग कक्षा में सभी वॉलिंटियर्स बहुत ही अनुशासित और अपने कार्य के प्रति समर्पित रहते। 

वे योग का महत्व बहुत अच्छे से समझने लगे थे। योग आध्यात्म से ही संबंधित नहीं है यह एक पूर्ण विज्ञान हैI यह शरीर, मन, आत्मा और ब्रह्मांड को एकजुट करती हैI यह हर व्यक्ति को शांति और आनंद प्रदान करता हैI योग द्वारा वोलेंटियर्स  के व्यवहार, विचारों और रवैये में बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

एनएसएस गतिविधियों को विशेष रूप से खेल और युवा मामलों के मंत्रालय, सरकार द्वारा वित्त प्रदान किया जाता है।  सदस्यों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। इस योजना को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में विश्वविद्यालय से विभिन्न छात्रों को शामिल किया जाता है और उन्हें देश के आदर्श नागरिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।  एनएसएस स्वयंसेवकों को वर्दी और बैज पहनना अनिवार्य है। प्रकोष्ठभाग लेने वाले स्वयंसेवकों को कम से कम 240 घंटे नियमित गतिविधियों और दो साल की अवधि में एक विशेष शिविर पूरा करने पर प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है। छात्रों के अकादमिक कैरियर में सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों में प्रमाणपत्र का महत्वपूर्ण मूल्य है।

राष्ट्रीय सेवा योजना का आदर्श वाक्य या दृष्टिकोण यह है: 'मुझे नहीं बल्कि आप'। यह लोकतांत्रिक जीवन के सार को दर्शाता है और निःस्वार्थ सेवा की आवश्यकता को बनाए रखता है और दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण की सराहना करता है । यह स्पष्ट करता है कि एक व्यक्ति का कल्याण अंततः समाज के कल्याण पर निर्भर है। इसलिए,  एनएसएस के अपने दिन-प्रति-दिन कार्यक्रम में इस आदर्श वाक्य का प्रदर्शन  किया जाता है। 

एन एस एस प्रकोष्ठ  विभिन्न कार्यक्रम जैसे रोजगारोन्मुखी कार्यक्रम, स्वच्छ भारत अभियान (सफाई अभियान और क्षेत्र दौरान), ग्रीन वाक, रक्तदान शिविर, "राष्ट्रीय युवा उत्सव, स्वच्छता जागरूकता निर्माण  पर विशेष शिविर, टीसीएस रोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम, "छात्रों के समग्र व्यक्तित्व विकास" पर योग ध्यान कार्यशाला, विभिन्न भाषण, वाद- विवाद, निबंध प्रतियोगिताओं आदि पर कार्यशाला  आयोजित करता है।

योग मोटापा कम करने  में भी सहायक है ।  मोटापा कम करने  के नाम  पे कई जिमखाना और ट्रेनर  वर्कआउट के नाम पे शारीरिक अत्याचार करवाते है जिससे लाभ कि जगह हानि होती है। ट्रेनर कभी -कभी  ऐसे व्यायाम करवा देते हैं जो  शरीर के लिए हानिकारक सिद्ध होते है । शरीर को छरहरा रखना तभी संभव है जब हम कुछ जरुरी सावधानियां रखते हैं तब ही स्वास्थ्य एवं अन्य सुख प्राप्त कर पाते हैं।  

आजकल योग प्रशिक्षण कई संस्थाओं द्वारा किए जा रहे हैं। मुझे एक योग प्रशिक्षण शिविर याद है जो 2009, जनवरी जोगेश्वरी मुम्बई  में आर्ट ऑफ लिविंग  द्वारा योग गुरु श्री श्री रविशंकर जी के निर्देशन में करवाया गया।

आर्ट ऑफ लिविंग के बेसिक कोर्स को अब हैपीनेस प्रोग्राम कहा जाता है   जिसमेंं सुदर्शन क्रिया पर मुख्य ध्यान दिया गया।  मैंने यह अनुभव किया कि इस कोर्स में शारीरिक व्यायाम और ध्यान का पशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षिका प्रमिला दीदी थीं। मैं इस विषय की पहले से ही जानकर रही हूं।
 इस  कोर्स से मेरी उम्मीदें पूरी नहीं हो पाई। मुझे ज्यादा की भूख थी परंतु बहुत कम मिला।


मै  योग ध्यान वाले फैमिली  कलचर से हूं। हमारे छोटे फूफाजी  विगत 50-60 वर्षों से बिलासपुर के जाने माने योगाचार्य के रूप में प्रसिद्ध हैं।बचपन से ही सूर्य नमस्कार ,प्राणायाम , कपालभाति करते आ रही हूं और हमारा परिवार शक्तिपात दीक्षा प्राप्त है सहज समाधि क्या होती है इसका ही अभ्यास या साधना हम ध्यान में करते आए हैं। जब भी बुआजी फूफाजी नरसिंहपुर आते हम फूफाजी को सुबह चार बजे से आसन योग ध्यान करते हुए पाते। उनका यह शेड्यूल आज भी कायम है इसलिए वे बहुत तेजस्वी हैं और शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ्य हैं। शांत स्वच्छ स्थल पर हम उन्हें आसन करते हुए देखते । वे आसन के लिए   स्वच्छ और साफ हवादार जगह का चयन कर आसन (चटाई) बिछा कर पद्मासन यानी पाल्थी मार कर बैठ जाते और फिर गहरी सांस लेते हुए आसन करना शुरू करते। 

बचपन से मैंने अपने घर में घर में सूर्य नमस्कार से संबंधित बहुत सारी किताबें भी रखी देखीं थी और यही समझा था कि योगासनों में से सर्व श्रेष्ठ  सूर्य नमस्कार है । इसे करने से  शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक सभी प्रकार का लाभ प्राप्त होता है।इसे सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है। केवल इसका ही नियमित रूप से अभ्यास व्यक्ति को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से व्यक्ति का शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। 'सूर्य नमस्कार' स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के लिए भी उपयोगी बताया गया है। 

सूर्य-नमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति की वृद्धि के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति भी तीव्र होती है। शरीर की चर्बी कम होती है और रीढ़ की हड्डी में लचीलापन आता है। 


इसके अलावा दमा, पुरानी खांसी या फेफड़ों संबंधी अन्य बीमारी में इस आसन को करने से आराम मिलता है। इससे बाजुओं में भी ताकत आती है।

सूर्य नमस्कार खाली पेट सुबह किया जाता है। सूर्य नमस्कार के प्रत्येक दौर में दो सेट होते हैं, और प्रत्येक सेट 12 योग आसान से बना होता है। 

सूर्य नमस्कार या सूर्य अभिवादन 12 शक्तिशाली योग आसन का एक अनुक्रम है। एक कसरत होने के अलावा, सूर्य नमस्कार को शरीर और दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए भी जाना जाता है
1प्रणामासन 2. हस्तोत्तानासन 
3. हस्तपादासन  4. अष्वसंचलनासन 5 दण्डासन 6.अष्टांग नमस्कार  7. भुजंगासन 
,8.अधोमुखस्वानासन 9. अश्व  संचलनसाना 
10.हस्तपादासन 11. हस्तोत्तानासन 12. ताड़ासन

सूर्य नमस्कार के तेरह मंत्र : 
  1. ॐ मित्राय नमः
  2. ॐ रवये नमः
  3. ॐ सूर्याय नमः
  4. ॐ भानवे नमः
  5. ॐ खगाय नमः
  6. ॐ पूष्णे नमः
  7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
  8. ॐ मरीचये नमः
  9. ॐ आदित्याय नमः
  10. ॐ सवित्रे नमः
  11. ॐ अर्काय नमः
  12. ॐ भास्कराय नमः
  13. ॐ श्री सबित्रू सुर्यनारायणाय नमः
सूर्य नमस्कार का अभ्यास बारह स्थितियों में किया जाता है, जो निम्नलिखित है

1.प्रणाम मुद्रा : दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। नेत्र बंद करें। ध्यान 'आज्ञा चक्र' पर केंद्रित करके 'सूर्य' का आह्वान 'ॐ मित्राय नमः' मंत्र के द्वारा करें।

2.हस्त उत्तानासन: श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।

3. पाद हस्तासन या पश्चिमोत्तनासन : तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।
अश्व संचालन आसन : इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें।

5. पर्वतासन : श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।

6.अष्टांग नमस्कार : श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें। नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। ध्यान को 'अनाहत चक्र' पर टिका दें। श्वास की गति सामान्य करें।

7.भुजंगासन : इस आसन को करने के लिए जमीन पर पेट के बल लेट जाएं। चेहरा ठोड़ी पर टिकाएं कोहनियां कमर से चिपकाकर रखें और हथेलियों को ऊपर की ओर करके रखें। दोनों हाथों को कोहनी से मोड़ते हुए आगे लाएं और बाजुओं के नीचे रखें। 
 इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें। मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को टिका दें।
इस स्थिति में 30 सेकेंड तक रुकना है। शुरुआत में ऐसा न कर पाएं, तो उतनी देर करें जितनी देर आराम से कम पा रहे हैं। बाद में सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे सिर को नीचे लाकर ठोड़ी को जमीन पर रखें और हाथों को पीछे ले जाकर ढीला छोड़ दें।

इसके दूसरे हिस्से में दोनों हथेलियों को सामने की ओर लाकर ठोड़ी के नीचे रखें। अब पहले की तरह सांस धीरे-धीरे लेते हुए सिर से शरीर को ऊपर की ओर उठाएं। कंधे से कमर तक का हिस्सा हथेलियों के बल पर ऊपर उठाएं। इस अवस्था में 30 सेकेंड तक रहना है और फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए वापस उसी अवस्था में लौट आएं। इस आसन को करते समय शरीर को कमर से उतना ही पीछे ले जाएं जितना आसानी से हो सके। लचीलापन एकदम से नहीं आएगा, अनावश्यक दबाव डालने से पीठ, छाती, कंधे या हाथों की मांस-पेशियों में दर्द हो सकता है। पीठ या कमर में ज्यादा दर्द हो तो भी यह आसन नहीं करना चाहिए।

8.पर्वतासन: श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।

9.अश्व संचालन आसन : इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें। 

10.हस्तासन :तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।

11 हस्त उत्तानासन: श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।

12प्रणाम मुद्रा : यह स्थिति पहली मु्द्रा की तरह है अर्थात नमस्कार की मुद्रा। बारह मुद्राओं के बाद पुन: विश्राम की स्थिति में खड़े हो जाएं। अब इसी आसन को पुन: करें। 

सूर्य नमस्कार शुरुआत में 4-5 बार करना चाहिए और धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर 12-15 तक ले जाएं।
 यह स्थिति - पहली स्थिति की भाँति रहता है। सूर्य नमस्कार प्रार्थना करते समय  सूर्य मंत्र का  उच्चारण  भी करना चाहिए ।


मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

सूर्य साधना - मां

मेरा जन्म पश्चिम बंगाल में हमारे बड़े मामाजी के यहां हुआ वे पेशे से इंजीनियर थे। उनके कार्यकाल में रहने के दौरान कोल माइंस में कोई भी दुर्घटना नहीं घटी अतः 1986 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  वे जेनरल मैनेजर के पद पर पदस्थ थे। तब हमलोग शहडोल के पास कोतमा में रहते थे और  वे कोतमा के पास कोलमाइंस मनेंद्रगढ़ जिले के  झगराखंड  में।

मामाजी के यहां छठ पूजन होता था।बिहार बंगाल में सूर्य को साक्षात देवता माना जाता है और सूर्य उपासना का बहुत ज्यादा महत्व है। सूर्योपासना त्वरित फलवती होती हैं। भगवान राम  सूर्यवंश के वंशज हैं।  भगवान श्रीराम के पूर्वजों को सूर्योपासना से ही दीर्घ आयु प्राप्त हुई थी। श्रीकृष्ण के पुत्र सांब की सूर्योपासना से ही कुष्ठ रोग से निवृत्ति हुई। 

भगवान हनुमान सूर्य देवता को अपना गुरु मानते थे। सूर्य देव के पास 9 दिव्य विद्याएं थीं। इन सभी विद्याओं का ज्ञान बजरंग बली प्राप्त करना चाहते थे। सूर्य देव ने इन 9 में से 5 विद्याओं का ज्ञान तो हनुमानजी को दे दिया, लेकिन शेष 4 विद्याओं के लिए सूर्य के समक्ष एक संकट खड़ा हो गया। शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान सिर्फ उन्हीं शिष्यों को दिया जा सकता था जो विवाहित हों। हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे, इस कारण सूर्य देव उन्हें शेष चार विद्याओं का ज्ञान देने में असमर्थ हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए सूर्य देव ने हनुमानजी से विवाह करने की बात कही। पहले तो हनुमानजी विवाह के लिए राजी नहीं हुए, लेकिन उन्हें शेष 4 विद्याओं का ज्ञान पाना ही था। इस कारण हनुमानजी ने विवाह के लिए हां कर दी। 

हनुमान जी की रजामंदी मिलने के बाद सूर्य देव के तेज से एक कन्‍या का जन्‍म हुआ। इसका नाम सुर्वचला था। सूर्य देव ने हनुमान जी को सुवर्चला से शादी करने को कहा। सूर्य देव ने यह भी बताया कि सुवर्चला से विवाह के बाद भी तुम सदैव बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे, क्योंकि विवाह के बाद सुवर्चला पुन: तपस्या में लीन हो जाएगी। हिंदु मान्‍यताओं की मानें, तो सुवर्चला किसी गर्भ से नहीं जन्‍मी थी, ऐसे में उससे शादी करने के बाद भी हनुमान जी के ब्रह्मचर्य में कोई बाधा नहीं पड़ी। और बजरंग बली हमेशा ब्रह्मचारी ही कहलाए।

मध्यप्रदेश में छठ पूजा का ज्ञान बहुत ही कम लोगों को है। जबलपुर में भी हमारे एक और मामा जी रहते थे जिनके हाथ छठ उत्सव धूमधाम से मनाया जाता था।

 मां कृत्रिम बनावटी जीवन जीने के बजाय,  दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करने के बजाय वास्तव में एकांत में आनंदित रहती थी। साधारण जीवन जीने की वजह से वे अपने संस्कारों के करीब थीं और इसलिए वे अपने परिवार के सदस्यों के करीब थीं और परिवार द्वारा दिए गए प्रेम से ही वे बहुत खुश और संतुष्ट रहतीं।मां कम से कम चीजों में ही संतुष्ट रहतीं और अपने साथ अधिक से अधिक समय बिताने की वजह से  वे अपने आपको पहचान चुकी थीं  कि वे वास्तव में कौन हैं।आनंद आंतरिक गुण है वह हर परिस्थिति में अपने कि आनंदित रखतीं बाह्य जगत से उनका रिश्ता मात्र भौतिक आवशयकताओं  दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति मात्र का था।  सादा जीवन जीने और बड़ी सोच रखने कि वजह से ही आंतरिक शांति और आनंद से परिपूर्ण रहतीं।

मां के जीवन की सबसे विशेष बात यह थी कि उन्हें सादगी सरलता निष्छलता ज़रूरतों और इच्छाओं को सीमित कर जीने की कला आती थी उनका कहना था  इच्छाओं का  कोई अंत नहीं है। उन्होंने कभी भी अपने पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों को प्रभावित करने के लिए कोई कार्य नहीं किया वे दूसरों की  आवश्यकता पड़ने पर मदद करने प्रयासरत थे। बहुत कम लोग सादा सरल जीवन जीते हैं, लोग अपनी बड़ी संपत्तियों से दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं अपनी भव्यता का रौब जमाना चाहते है।

हमारी दादी मां भी सूर्योदय से पहले ही उठ जाती । उनकी दिनचर्या में सूर्योदय से पहले उठना घर के कामकाज करना नित्य कर्म में शामिल था। लोग उनके बारे में कहते कि अम्माजी चिड़ियों के साथ सो जाती हैं और कौवों के साथ उठ जाती हैं पुराने जमाने में घड़ी नहीं होती थी। समय देखने के लिए लोग सूर्य प्रकाश धूप का अनुभव कर लेते थे  कि अभी कितना बजा होगा अर्थात पुराने लोग सूर्य की लय के साथ समकालिक हो जाते थे । ब्रह्म मुहूर्त में उठना बल बुद्धि विद्या का द्योतक समझा जाता था ब्रह्म का समय या शुद्ध चेतना या शुभ और प्रातः काल के इस समय उठना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

दादी मां अपनी वृद्धावस्था में भी विशाल ऊर्जा से  भरी रहती थी उनके अंदर आशा, प्रेरणा और शांति हर समय प्रकट होती थी। 


अम्माजी सभी विद्यार्थियों को ब्रह्म मुहूर्त में उठा देती उनका मानना था कि ब्रह्म मुहूर्त में स्वाध्याय करनेे से विद्यार्थी अपनेेेे लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैैं । उनको सुबह का वातावरण शुद्ध, शांत और सुखदायक लगता था।

गुरुदेव भी सूर्य को  सर्वशक्तिमान समझ सूर्योदय की प्रतीक्षा करते । उनके अनुसार  सृष्टि  सृष्टि का आधार  और ऊर्जा का श्रोत है।  इस समय ध्यान - भजन करने से मानसिक कृत्य में सुधार होता है। यह सत्वगुण बढ़ाने में सहायक है और रजोगुण और तमोगुण से मिलने वाली मानसिक चिडचिडाहट या अति सक्रियता और सुस्ती से निदान देता है। बिहार में छठ पूजा का विशेष  महत्व है।मां अपनी मां के घर छठ पूजा करती थी।   बिहार में लोग गंगा नदी में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है उनका मानना है कि ऐसा करने से  नेतृत्व क्षमता  बल, बुद्धि ,विद्या, तेज, पराक्रम, यश एवं उत्साह में वृद्धि होती है । छठ  को सूर्यषष्ठी व्रत कहा जाता है जो बहुत कठिन होता है।  

 

सूर्य की पूजा के साथ छठ मैया की भी पूजा होती है।  हमारे यहां छठ पूजा का रिवाज नहीं था  अतः हमारे मामा जी के निमंत्रण पर हम लोग छठ की पूजा में शामिल होने उनके घर  जाते थे। छठ पूजा चार दिनों तक चलती। कार्तिक माह में दिवाली के बाद छठे दिन  यानी छठमी को यह त्योहार मनाया जाता। छठ का व्रत हमारी मामी करतीं थीं। नदी में स्नान और उगते और ढलते सूर्य की पूजा करतीं और सूर्य भगवान  को अर्पित करने छठ प्रसाद में  स्वादिष्ट मिठाई जैसे कि ठेकुआ, खीर, चावल के लड्डू बनाती। ठेकुआ बिहार का  प्रसिद्ध व्यंजन है । 

यह मीठा खुरमा या मीठी सलोनी का बड़ा रूप है। इसे गेंहू के आटे, चीनी -गुड़, नारियल और सूखे मेवों से बनाया जाता है । छठ पूजा के दूसरे दिन सूर्य देव को अर्पित  किया जाता है। इसके साथ कद्दू की खट्टी मीठी नमकीन सब्जी बनातीं स्वादिष्ट सब्ज़ी को तली हुई गरी के साथ मिलाया जाता है और व्रत को तोड़ने के लिए एकदम सही पकवान माना जाता।  हरे चने और आलू की सब्जी को छोले की सब्जी की तरह बनाया जाता। हरे चने को रात भर पानी में भिगोया जाता और अगले दिन घी में जीरा और हरी मिर्च के साथ बनाया जाता। इसे पुरी, कद्दू की सब्जी और एक मिठाई के साथ परोसा जाता गुड की खीर भी बनाई जाती जिसमें चीनी के स्थान पर गुड मिलाया जाता । चावल, पानी और दूध के साथ  खीर बनाइ जाती. यह मिठाई छठ पूजा का भोजन पूरा करती और इसे सेवन करने से पहले सूर्य देवता को भोग लगाया जाता। 

भोजन के दौरान यदि कोई भी आवाज होती तो भोजन को वहीं अधूरा छोड़ दिया जाता। मुझे याद है मामा जी के यहां एक ब्रूजो नाम का कुत्ता पला  हुआ था। जैसे ही छठ की पूजा करके मामी भोजन करने बैठी वैसे ही कुत्ते ने भोंकना शुरू कर दिया तो उन्हें वहीं पर खाना खाना बंद करना पड़ा।

मां छठ के बारे में बहुत सारी बातें बतातीं थीं। षष्‍ठी देवी को छठ मैया कहते हैं।  षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं। आज भी देश के कई हिस्‍सों में बच्चों के जन्म के छठे दिन षष्ठी पूजा का चलन है। पुराणों में इन देवी के एक अन्‍य नाम कात्यायनी का भी जिक्र है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी को होती है। 

छठ पर्व में सूर्य की पूजा षष्ठी को की जाती है। सूर्यषष्ठी व्रत में ब्रह्म और शक्ति प्रकृति और उनका अंश षष्ठी देवी, दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है, इसलिए व्रत करने वाले को दोनों की पूजा का फल मिलता है। इस पूजा की यही बात इसे खास बनाती है।

श्वेताश्वतरोपनिषद् में बताया गया है कि परमात्मा ने सृष्टि रचने के लिए खुद को दो भागों में बांटा। दाहिने भाग से पुरुष और बाएं भाग से प्रकृति का रूप आया। 

ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है। पुराण के अनुसार यह देवी सभी बालकों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी आयु देती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में ऐसा जिक्र मिलता है-

''षष्‍ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्‍ठी प्रकीर्तिता,बालकाधिष्‍ठातृदेवी विष्‍णुमाया च बालदा।आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी,सततं शिशुपार्श्‍वस्‍था योगेन सिद्ध‍ियोगिनी''।





शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

सूर्योपासना

सूर्योदय और विष्णु अवतार श्री नरसिंह मंदिर दर्शन हमारे घर के कॉरिडोर से 
जय गुरुदेव🙏🏻🙏🏻

प्राकृतिक सौंदर्य धार्मिक आध्यात्मिक संपदा से भरपूर नरसिंहपुर उत्तर में विन्ध्याचल और दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियों से घिरा हुआ है । इसके चारों तरफ पवित्र नर्मदा नदी जिले की खूबसूरती में वृद्धि करती है। महान वीरांगना रानी दुर्गावती के काल में यह स्‍थान काफी चर्चित रहा था। यहां अनेक ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल हैं। मृगन्नाथ धाम राजमार्ग ,नरसिंह मंदिर, ब्राह्मण घाट, झौतेश्वर आश्रम, श्रीनगर का जगन्नाथ मंदिर और डमरू घाटी यहां के लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है नर्मदा क्षेत्र में होने की वजह से पुण्य धरा नरसिंहपुर -बहुत सारे छुपे हुए और पहुंचे हुए संतो की तपोभूमि रही है। परमहंस स्वामी केशवानंद महाराज धूनीवाले दादा आजीवन नरसिंहपुर में ही साधना करते रहे। रजनीश आचार्य ओशो, महर्षि महेश योगी स्वामी स्वरूपानंद जी, हरिहर बाबा ,ब्रह्मचारी महाराज जैसे सिद्ध संत नरसिंहपुर रहे हैं। नरसिंह मंदिर परिसर में स्थित पीपल के बड़े पेड़ के नीचे एक चबूतरा बना हुआ था जो कि धूनी वाले दादा का साधना आसन था कहा जाता है कि सिद्ध महापुरुषों द्वारा की गई साधना की तरंगे दूर-दूर तक पहुंचती हैं और वही उनकी रक्षा कवच होती है जो उन्हें हिंसक जीव जंतुओं से प्रोटेक्ट सुरक्षित करती है अर्थात हिंसक जीव जंतु भी ऐसे महामानव के संपर्क में आकर हिंसा भूलकर प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं। धूनी वाले दादा -परमहंस केशवानंद मध्य प्रदेश के स्वामि रामकृष्ण परमहंस थे।इनका भव्य स्थान जीवित समाधि आज भी नरसिंहपुर में स्थित है।  


इसी स्थान पर दो और महान संतों की समाधि है कहते है जैसे भागीरथ ने स्वर्ग से गंगा धरती पर लाई थी वैसे ही यहां पर तपस्या करने वाले ब्रह्मचारी बाबा जी ने मां नर्मदा को अंतिम समय में बुलाया क्योंकि वह रोज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां नर्मदा के स्थान जो कि वहां से 12 किलोमीटर दूर था पैदल जाते थे परंतु शारीरिक रूप से अशक्त हो जाने की वजह से वे अपने अंतिम समय में मां नर्मदा जी के दर्शन को नहीं जा पा रहे थे और उन्होंने प्रार्थना की कि मां मैं कैसे आऊं दर्शन के लिए मां उनकी पुकार पर प्रकट हुई और  आज भी कुंड के रूप में उस स्थान पर मां नर्मदा जी का अस्तित्व है। और वे ब्रह्मचारी महाराज जी के स्थान पर प्रकट हुई इसीलिए इस स्थान को झिरना कहा जाता है । मां नर्मदा जल की एक झिर यहां सतत बनी हुई है। पितृपक्ष में लोग यहां अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने भी आते हैं। पास में ही आठ सौ  साल पुराना  बहुत ही सुंदर जगदीश मंदिर है।

जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद महाराज का  शांत सुंदर आश्रम भी नरसिंहपुर से तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।  स्वामी स्वरूपानंद जी हिन्दू आध्यात्मिक  गुरु और स्वतंत्रता  संग्राम  सेनानी हैं। 

दैवीय कृपा फलीभूत होने पर  हमारा ट्रांसफर जबलपुर से नरसिंहपुर हुआ । हमारी दादी जिन्हें सभी 'अम्माजी' बोलते थे नरसिंहपुर  में रहती थीं । नरसिंहपुर में हमारा बहुत बड़ा पुश्तैनी मकान था जो आश्रम या देवालय जैसा लगता था। आस पड़ोस के लोग भी पारिवारिक सदस्य जैसे ही रहते थे। अम्माजी को बागवानी का बहुत शौक था । नरसिंहपुर मकान का बाड़ा बहुत बड़ा था,  बाड़े में अमरूद, अनार, सीताफल, नीम,  मुनगा, लाल कन्हेर, नीबू और रंगून से लाए गए  सुंदर क्रोटन  बड़े बड़े गमलों में लगे हुए थे। 

एक हरे रंग का तोता भी हमारे यहां पाला गया था जो वारांडा में पिंजरे में टंगा हुआ बोलता रहता था - मिट्ठू चित्रकोटी... दूध रोटी ....सीताराम,  जय राम जी की....। घर में एक गौशाला भी थी ।एक बड़ा कुआं जहां से आस पास के सभी लोग पानी भरते थे और एक चक्की थी जहां पूरे मोहल्ले की औरतें आटा पीसने आती। एक बार की बात है हमारे मोहल्ले में एक घर में आग लग गई जिसमें उनका बहुत नुकसान हुआ और उस समय हमारे घर में ही जल का स्रोत कुंआ था हमारे घर के सभी सदस्यों ने दादाजी और पापाजी ने कुएं में बाल्टी डालकर पानी खींचा और उनके घर में लगी हुई आग बुझाई। आज भी हमारे पड़ोस का यह परिवार इस पुण्य कार्य के लिए हमारे परिवार बहुत आभारी हैं और इस बात को बार-बार दोहरा कर हमारे ki का आभार व्यक्त करता है। पड़ोस के लोग कहते कि अम्मा जी और बाबू जी का परिवार तो देवताओं का परिवार है।
जरा सी आहट होती तो तोते अपने स्वर में बोलने लगते साथ साथ अन्य  पक्षियों की बोली भी वातावरण में सुनना बहुत अच्छा लगता । घर का कोई भी सदस्य दरवाजा खोलकर अंदर आता तो वह अपनी बोली में उसका स्वागत करता। अमरूद  के तीन पेड़ लगे थे सबसे बड़े वाले पेड़ पर हरे रंग के तोते का पिंजरा टंगा रहता  और उसी पिंजड़े में उसका एक कटोरी में दूध - भात और एक कटोरी में पानी रखा रहता।

बड़ी बुआ का परिवार नरसिंहपुर के घर में ही एक तरफ के पोरशन में किराए से रहता था क्योंकि फूफा जी इरीगेशन डिपार्टमेंट में काम करते थे। हमारी मां के भाई भी यानी हमारे मामा जी भी हमारे घर के पास ही रहते जो कि व्यवसाय से सब इंजीनियर थे।  गाडरवारा में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने हमारे माता-पिता का रिश्ता तय करवाया था और उसी दौरान  उन्होंने शक्कर नदी पर पुल भी बनवाया था जो आज भी कायम है और ट्रेन से या बस से जाते समय दिखाई देता है। कुछ समय तक हमारे पड़ोसी के रूप में रहने के बाद हमारी मां के भाई याने मामा जी गवर्नमेंट पीजी कॉलेज के सामने बने हुए बंगले में शिफ्ट हो गए आजकल यह बंगले न्यायाधीश और पीजी कॉलेज के प्राचार्य को एलॉटेड हैं।

हमारी बड़ी बुआ के पांच बच्चे और छोटी बुआ के तीन बच्चे हमारे  नरसिंहपुर के इसी घर में पैदा हुए ।  मकान के दो पोर्शन थे एक पोरशन में दो बहुत बड़े-बड़े हॉल दहलान और एक रसोईघर और एक भंडार गृह था। और दहलान के सामने बहुत बड़ा आंगन था। आंगन के पास कुआं था और कुएं के उस तरफ पक्का डबल स्टोरी मकान था। जिसका मुख्य दरवाजा बिल्कुल नरसिंह मंदिर के सामने मेन रोड पे खुलता । ऊपर के फ्लोर पर एक कमरा और दोनों तरफ खुला हुआ छत याने बालकनी थी। छत की ओर आने वाली सीढ़ियां अंदर और बाहर दोनों तरफ बनी हुई थी। बीच के हॉल से भी सीढ़ियां छत की ओर जाती थी और आंगन में बनी हुई सीढ़ियां भी खुले हुए छत तक जाती थी। हमारी दादी हमें हमेशा छत पर जाने से रोकती थी क्योंकि उसका कंस्ट्रक्शन पुराना था और उन्हें लगता था कि कहीं हम लोग पैराफिट वॉल पर झुक कर नीचे ना गिर जाए‌ ।  corridor से रेलवे ट्रैक भी दिखाई देता था ट्रेन की सीटी और छुक छुक की आवाज सुनकर हम बच्चे छत से ट्रेन का जाना आना देखते थे। और कई बार मालगाड़ी के डब्बे गिनते थे।

नरसिंह मंदिर परिसर में घर होने से  सुबह शाम जब भी शंख और घंटी बजती आरती होती तो हमारे पूरे घर में घंटी और शंख की आवाज गूंजती थी। अम्माजी पढ़ी लिखी थी। सन 1946 में अंग्रेजी में बात कर लेती थी। जब वे शुद्ध हिंदी मैं बात करती तो मोहल्ले की औरतें बोलती कि आप तो अंग्रेजी में बोलती हो। मोहल्ले की औरतों को खड़ी हिंदी भी समझ में नहीं आती थी तो अंग्रेजी की तो बात बहुत दूर है। अम्माजी मोहल्ले की सभी औरतों को वरांडा में बैठा कर रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाती और उनका अनुवाद करती।  रामायण सुनने के बाद सभी औरतें अम्मा जी के चरण स्पर्श कर कर उनका आशीर्वाद लेती थी।आस पड़ोस के लोग अम्माजी को रंगून वाली अम्माजी के नाम से सम्मान देते।  नरसिंह मंदिर प्रांगण में अम्माजी के उम्र बहुत से वयो वृद्ध जन एकत्रित होते और  जब वे उन्हें  नरसिंह मदिर प्रांगण में आमंत्रित करते  तब वे कहती कि वहां सब बैठकर अपनी अपनी बहुओं की बुराई करने पंचायत करते हैं इसलिए हम अपने घर से ही नरसिंह भगवान के दर्शन कर लेते हैं। 

दादी मां हमें रंगून विश्व युद्ध World War ll  की  कहानियां सुनाती। बाबूजी यानी दादाजी और छोटे बाबूजी याने हमारे छोटे दादाजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद  हिन्द फौज में सक्रिय ओजस्वी सदस्य थे।वे चौदह भाषाओं को जानते थे और आज़ाद हिंद फौज अखबार के चीफ एडिटर थे।उन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को मौत के  घाट उतार दिया । उन्हें 1945  में युद्ध के समय किसी जापानी ने पीछे से गोली मार दी ऐसे वीर क्रांतिकारी योद्धा को शत शत नमन । इनका नाम इतिहास में गुमनाम है और ना ही कोई उनकी याद मे प्रतिमा। क्युकि आजादी तो चरखे से आई है और महान तो अकबर है। आइए इन महान राष्ट्रभक्त के नाम पर  'जय हिन्द'  का नारा लगाएं।

सुुभाष चंंद्र बोस स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था । उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा" का नारा भी अत्यधिक प्रचलन में आया। भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध वर्ष 1939-45 के बीच होने वाला एक सशस्त्र विश्वव्यापी संघर्ष था। इस युद्ध में दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गुट धुरी शक्तियाँ  जर्मनी, इटली और जापान
 तथा मित्र राष्ट्र फ्राँस, ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और कुछ हद तक चीन शामिल थे।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए जापान से जा मिले जो उस युद्ध में अंग्रेजों का दुश्मन था. नेताजी ने जर्मनी जाकर हिटलर से हाथ मिलाया और उसके बाद सिंगापुर जाकर आजाद हिंद फौज की कमान संभाली. और जापानी सेना की मदद से पूर्व की ओर से भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया। 19 मार्च1944 को पुर्वोत्तर में आजाद हिंद फौज  ने भारत में प्रवेश किया और देश की आजाद जमीन पर अंग्रेजों से जमीन छीन कर पहली बार तिरंगा फहराया गया था।  इस बीच, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में, जापान ने भारतीय युद्धबन्दियों की एक सेना स्थापित की, जिसे आजाद हिंद फौज का नाम दिया गया ।

 बाबूजी  ऊंचे कद के 6 फुट 3 इंच के महान व्यक्ति थे उनका व्यक्तित्व युग पुरुष जैसा रहा - न भूतो न भविष्यति।

अम्माजी ने कैसे ६ महीने की  हिन्द महासागर की जहाज यात्रा अपनी मांजी  यानी सास , बाबूजी यानी पति और बड़ी बुआ यानी उनकी बड़ी बेटी जो ढाई साल की थी  और  गर्भस्थ शिशु यानी मेरे पिताजी के साथ  की और कोलकाता के राजमहल पहुंची? हमें सुनाती रहतीं । वहां के  महाराजा ने उनका कैसे सहृदय स्वागत सत्कार किया। फिर वहां से  कैसे वे सभी लखनऊ पहुंचे   ये सब बातें हम बहुत उत्साह से सुनते। उनके साथ उनका वफादार नौकर टिड़ी  भी था। हिन्द महासागर पार करके अपने देश में जाने के लिए उनके पास दो ही उपाय थे  एक तो विमान से जाना और दूसरा पानी के जहाज द्वारा यात्रा पूरी करना। समुद्री यात्रा के संस्मरण पर  बहुत सारी किताबें  लिखी गई हैै और फिल्में बनाई गई हैं 

आज जब हम जहाज यात्राा की बात करते हैं तो  टाइटैनिक फिल्म का जहाज का चित्र आंखों के सामने आ जाता है Titanic दुनिया का सबसे बड़ा वाष्प आधारित यात्री जहाज था। वह साउथम्पटन इंग्लैंड से अपनी प्रथम यात्रा पर, 10 अप्रैल 1912 को रवाना हुआ। चार दिन की यात्रा के बाद, 14 अप्रैल 1912 को वह एक हिमशिला से टकरा कर डूब गया जिसमें 1,517 लोगों की मृत्यु हुई जो इतिहास की सबसे बड़ी शांतिकाल समुद्री आपदाओं में से एक है। 

समुद्री लुटेरे, सिंदबाद जहाजी और समुद्र के सम्राट नाम से कई किताबें लिखी गई हैं। समुद्र की दुनिया एक अलग ही दुनिया है जिसका धरती की दुनिया से कोई मेल नहीं। फिल्म लाइफ ऑफ पाई' में समुद्री जीवन का चित्रण  किया गया है ।

दादी मां बताती  विश्व युद्ध के समय हिरोशिमा पर बम पटके जाते थे जिसकी धमक रंगून तक आती थी। हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बमबारी 6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकाा वायु सेना हवाई जहाज द्वारा जापान के हिरोशिमा पर परमाणुु बम गिराया गया।  और उसके तीन बाद ही अमरीका ने  फिर से  नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराया।

रंगून से भारत आने के बाद बाबूजी ने जबलपुर में 
सूपाताल में हवेली खरीदी थी । चूंकि जबलपुर में आयुध निर्माण फैक्ट्री ,गन केरेज फैक्ट्री  वीकल फैक्ट्री और खमरिया फैक्ट्री है  और विश्व युद्ध का समय था अतः बाबूजी ने नरसिंहपुर में नरसिंह मंदिर परिसर में नवाब साहब की हवेली  1946 में ढाई हजार रूपए में खरीदी । दादी को आशीर्वाद था कि उनका निवास स्थान किसी देवालय के समीप हो होगा ।  नरसिंह मंदिर परिसर में  हवेली स्थित है। समय के ढाई हजार आज के ढाई करोड़ के बराबर होते थे। यह मकान राव साहब का था जिनका सुंदर महल आज भी हमारे घर के पास पूरी आन बान शान से खड़ा हुआ हैं। कहा जाता है इस महल की रानियां सुरंग से नरसिंह मंदिर हाथी पर बैठकर जाती थी। महल के सामने की ओर सिंगरी नदी का घाट बना हुआ है और महल के पश्चिमी तरफ नरसिंह मंदिर। धूनी वाले दादा ने नरसिंह मंदिर परिसर में पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बहुत समय तक बसेरा किया ।
 
नरसिंह मंदिर  एक भव्य स्मारक है जो सात मंजिल की है यह मंदिर एक ही खंबे पर खड़ा हुआ है। नरसिंह मंदिर के पीछे तालाब और सुंदर घाट बना हुआ है। नरसिंह मंदिर बहुत से विदेशियों के लिए पुरातात्विक रिसर्च का प्रमुख आकर्षण केंद्र है। नरसिंह मंदिर परिसर में ही शिव जी और हनुमानजी के छोटे मंदिर स्थापित है। 

अम्माजी नरसिंहपुर से जबलपुर  यदा -कदा  हमारे पास आ जाती थीं।  अम्माजी कभी- कभी भोपाल  में बड़ी बुआजी के यहां भी रहतीं थी। उनकी उम्र  लगभग अस्सी वर्ष पार कर चुकी थी। ईश्वर की असीम अनुकंपा से वे ट्रेन यात्रा कर लेती थीं।अम्माजी एक बहुत ही शानदार व्यक्तित्व की स्वामी थी। उनकी आवाज सोहराब मोदी सी दबंग थी। आस पड़ोस के लोग उनकी आवाज के डर से यहां वहां छुप जाते थे। हम तीनो भाई बहन को उनकी आज्ञा के बिना कोई छू भी नहीं सकता था। हम सब उन्हीं की कस्टडी में रहते थे। मैं तीनो भाई बहनों में सबसे बड़ी हूं। मेरे से बड़ी एक और मेरी बहन थी जिन्हें लीवर प्रॉब्लम हुआ और वे सवा साल की उम्र में ही चल बसीं। उन्हें सब मोना मोनू के नाम से पुकारते थे। वह देखने में बहुत ही सुंदर समझदार और छोटी सी उम्र में ही बहुत ही ज्यादा ईश्वर परायण भक्त रही। हमारी दादी और परिवार के सभी जन मोनू दीदी से बहुत ज्यादा प्यार करते थे।उनकी मृत्यु के बाद हमारी दादी ने देवी मां से घर में पुनः मोनू के रूप में लक्ष्मी जी आए ऐसी प्रार्थना की और मेरा जन्म हुआ।

नरसिंह मंदिर के पास एक राजगिरा के लड्डू बेचने वाली बूढ़ी औरत दुकान लगा कर बैठती थी। नरसिंह मंदिर के पास ही सब्जियों की दुकान भी लगती थी। अम्मा जी रोज शाम को जब सब्जी लेने जाती तब हम तीनों बच्चों के लिए कुछ  चटपटा मीठा ले  आतीं-  जो हम बहुत ही चाव से खाते थे। सबसे छोटा भाई तो हमारी मां की गोद में पांच साल की उम्र तक रहा और पांच साल की उम्र के बाद ही उसने मां का दूध पीना छोड़ा।  हमारी मां कभी भी घर से बाहर नहीं जाती थीं। वे हमेशा अपने घर के काम काज में ही व्यस्त रहतीं थीं।  पड़ोस के  छोटे बच्चों को दुल्हन चाची का चेहरा देखने एक झलक पाने की बहुत उत्सुकता रहती। दुल्हन चाची से सभी बच्चे बहुत प्यार करते।  मां एक दिन में एक स्वेटर बुं लेती थीं। सिलाई कढ़ाई बुनाई और रसोई का विशेष ज्ञान था उन्हें । मां बहुत ही सज्जन और सेवाभाव प्रधान  थीं। हम तीनों बच्चे उनके बहुत लाडले थे। मै चूंकि लड़की थी और तीनों भाई बहिनों में सबसे बड़ी थी तो मुझे  सबका सबसे ज्यादा लाड प्यार मिला। मां ने मुझसे कभी कोई काम नहीं करवाया । हम तीनों। बच्चे देर तक सोते रहते थे और वे रसोई घर में खाना बनातीं रहतीं थीं। जब मैं ढाई तीन साल की थी तब मां मेरे लिए बहुत सुंदर फ्रॉक बनाई थी, एक गरम कपड़े की लाइट कलर फ्रॉक जिस पर उन्होंने रेड कलर से मुर्गा- मुर्गी और चूज़े बनाए थे । वह  सजीव सी कलाकारी देखते ही बनती थी। उन्होंने मेरे लिए  अपने हाथ से बहुत कपड़े सिले। आस - पड़ोस के लोग देखते तो बहुत प्रशंसा करते। कोलकाता की फेशन एंड डिजाइन कंपनी से उनके लिए जॉब  ऑफर भी आया परंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। मां बायोलॉजी स्टूडेंट थीं उनकी इच्छा भी चिकित्सक बनने की थी । उन्होंने रायपुर में गर्ल्स कॉलेज में बीएससी में एडमिशन लिया । अपने कॉलेज के दिनों में ही वे बहुत फैशनेबल सलवार कुर्ते पहिनतीं थीं और कार से कॉलेज जातीं थीं। 

दादी मां की कद काठी  अत्यंत आकर्षक- लंबी दुबली -सुंदर नयन नक्श वाली मिल्की व्हाइट- गौर वर्ण  की सशक्त कुशल ग्रहणी और सम्मानित महिला थीं। 

जबलपुर में भी हमने बहुत सारे फूल और सुंदर आकर्षक पेड़ पौधे लगाए हुए थे। जानकीनगर उद्यान के सामने हमारा सुंदर बंगला था जिसका किराया स्टेट बैंक देती थी। जानकीनगर का सुंदर पार्क बहुत सुंदर फूलों से भरा हुआ एक ऐसा स्थान जहां लोग फोटो खिंचवाने आते, यह बच्चों का प्रिय मनोरंजन स्थल, झूला, पीपल के नीचे चबूतरा एक लाइन से लगे हुए सुंदर सूरजमुखी होलीहॉकस हिबिस्कस के फूल के बीच रास्ते में से जब कोई नवविवाहित कपल घूमता हुआ दिखाई देता तो  सिलसिला फिल्म का  गाना - देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए याद आ जाता। वसंत ऋतुु में पार्क किसी फिल्म की शूटिंग जैसे स्थान से कम नहीं लगता ।
 यह पार्क हमेशा फूलों से खिला रहता और सुगंध और जीवन से भरपूर रहता । कई विदेशी नस्ल के फूलों जैसे- डेल्फीनियम, फॉक्सग्लो, और हॉलीहाक्स के विविध रंगों से सजा, हंसमुख डेज़ी  से सूसज्जित हिस्सा यह पार्क  कॉलोनी का मुख्य आकर्षण केंद्र और एक शानदार स्थान था।  बेला, जुही, रातरानी , चंपा, चमेली गुलाब के फूलों से युक्त सुगंधित हवा बहती तब यह  रोमांटिक स्थान ,फूलों के शहर में हो घर अपना जैसा लगता था। बच्चेेे झूला झूलते, खेलते ।

हमने जानकीनगर जबलपुर में गेट के पास एक सुंदर फूलों का पौधा लगाया था उसकी बेल गेट पर चढ़ती है और गेट बहुत ही सुंदर आकर्षक बन जाता है। हम उस फूल को बोगनविलिया कहते थे।हमारी दादी ने बताया कि यह पेड़ उन्होंने अपने घर रंगून में भी लगाया था और बाबूजी यानी दादा जी इसे बेगम बेलिया कहते थे अर्थात इस पेड़ में बिना गम के फूल आते है  यह पेड़ इतना फूलता है जैसे कि इसे कोई गम ही नहीं है।

मैं बायोलॉजी स्टूडेंट थी। 1990- 1993 में मैं प्री- मेडिकल टेस्ट की तैयारी कर रही थी सुबह पांच बजे स्कूटी से उप्पल क्लासेस कोचिंग पढ़ने जाती थी। उस समय स्कूटी से स्कूल या कोचिंग जाना बहुत बड़ी बात थी।  सुबह  पांच - पौने छह बजे तक उप्पल कोचिंग  क्लासेस का बड़ा हॉल इतना ज्यादा भर जाता था कि दरवाजे के पास खड़े होने तक की जगह नहीं होती थी। हमें सुबह जल्दी उठना पड़ता था। मेरा बेड  और टेबल अम्माजी के ही कमरे में लगा हुआ था। स्कूल की छुट्टियां ज्यादा रहती थीं। आरक्षण आत्मदाह , राम जन्मभूमि- बावरी मस्जिद दंगा फसाद अपनी ऊंचाई पर था।कई बार तो स्कूल से वापस आना ही बहुत मुश्किल हो जाता। चारों तरफ से रास्ते बंद रहते। स्कूल बस का घंटों इंतजार करते  परंतु बस भी समय पर नहीं पहुंचती। फिर हम एक ही कॉलोनी में रहने वाले दोस्त अपने पैरेंट्स को बुलाते और कार से घर पहुंचते वो भी दूर दूर के रास्तों से । एक बार तो मदन महल कि पहाड़ियों के पास से घूमकर हम रानीताल पहुंचे । कहने का अर्थ स्कूल बंद थे। घर में ही जितनी पढ़ाई हो सके हो जाती। मै अम्माजी से बोलती-  अम्मा जी आप मुझे  सुबह जल्दी उठा देना  पढ़ना है तो वह 4:30 बजे की जगह 2:00 बजे ही उठा देती थी।  मुझे हंसी आती और खुशी भी होती कि कम से कम उन्होंने मुझे उठाया तो ।

कई बार कर्फ्यू के दौरान  कोचिंग बाजार सभी बंद रहते थे और जबलपुर का वातावरण कुछ नकारात्मक सा रहता , मुझे लगता है कि यदि मेरा प्री मेडिकल टेस्ट में सिलेक्शन नहीं हुआ और मैं मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं ले पाई तो यह जीवन व्यर्थ है। जबलपुर के शिक्षण संस्थान चाहे दीपिका क्लासेज हो या शासकीय स्कूल  सभी फर्जीवाड़ा केंद्र स्थल,  सिर्फ फ्री की सैलरी पाने का माध्यम।  प्रोफेशनल दृष्टिकोण के टीचर्स थे जो पैसे तो रखवा लेते थे परंतु पढ़ाते कुछ नहीं थे। यही हाल सरकारी स्कूलो का भी था नाम बड़े और दर्शन छोटे। कभी टीचर आते तो कभी स्टूडेंट नहीं आते कभी स्टूडेंट्स आते तो टीचर्स नहीं आते तो मुझे लगता अब मैं क्या करूं ऐसे मौके पर जब कुछ समझ नहीं आता  क्या करें और क्या न करें  इस भटकाव से उबरने के लिए अम्मा जी हमेशा प्रोत्साहित करती। अम्माजी से मुझे जीवन संग्राम लड़ने की शक्ति मिली। दो बार के प्रयासों के बाद में प्री मेडिकल टेस्ट मैं पास हो गई। परंतु दुर्भाग्यवश मैं मेडिकल कॉलेज में नही पढ़ पाई।

उस समय जबलपुर में हमारे घर में टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज़ पेपर आता था। हम तो कई कई दिन तक न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ पाते थे और अम्माजी रोज न्यूज़पेपर बहुत ही इंटरेस्ट से पढ़ती थी। दादा जी के साथ रंगून में रहने की वजह से उनकी  अंग्रेजी परिष्कृत हो चुकी थी। जानकीनगर के आस पड़ोस के लोग भी अम्मााजी से
बात करने घर आते।   

जानकीनगर के बड़े हॉल में पूजा स्थान बना था कभी कभी पूजा के समय मेरे  भाई मुझे डिस्टर्ब  करते थे  जैसे टीवी का साउंड लाउड कर देना या जोर जोर से बात करना ।जिससे पूजा पाठ में डिस्टर्ब होता  ध्यान विचलित हो जाता ये सब अम्माजी देखती सुनती रहतीं फिर प्रेम से कहती बेटा तुम सूर्य भगवान के सामने जाकर  माला कर लो।

1985-86- 1994 तक दादी मां  ट्रेन यात्रा करतीं रहीं। 1995 में उनका पार्थिव शरीर नहीं रहा। हमलोग जबलपुर जानकी नगर में रहते थे और वहीं पर मकान खरीद कर रहने वाले थे कि 1997 में ऐसा भूकंप आया कि जानकीनगर के कुछ मकान और विजय नगर के बहुत सारे नव निर्मित मकान ध्वस्त हो गए। 

नरसिंहपुर में हमारे पूज्य गुरुदेव महाराज हमारे पिताजी के गुरु भाई पूज्य ललित बिहारी श्रीवास्तव जी के पास चातुर्मास करने आते रहते थे । हमारे माता पिता कुंडलनी शक्ति साधक , अतः हमने निर्णय किया कि नरसिंहपुर में ही मकान बनाया जाए। पुराना मकान महल नुमा बना हुआ था । बहुत मोटी मोटी दीवारें थी इतनी मोटी कि  एक ट्रैक्टर चला जाए। हमें मकान बनवाने में दो  साल लग गए क्योंकि हमने मकान तुड़वा कर बनवाया था। मकान की प्रथम नींव गुरुदेव महाराज के शुभ हाथों से ही स्थापित हुई। मकान बहुत बड़ा बना था। हालाकि छोटा ही बनवाना चाहते थे । परंतु हरि इच्छा बलवान।

पिताजी को अपने गुरु के साथ रहने की उत्कट लालसा थी। हमारी माताजी और पिताजी दोनों के ही  माता - पिता नहीं थे। पिताजी के बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के बाद देश स्वतंत्र होने के बाद ही नहीं रहे अतः हमारी दादी ने ही पिताजी की बहुत अच्छी परवरिश की और उनके आशीष से  पिताजी बैंक में उच्च  अधिकारी के पद पर पदस्थ हुए । दादी मां का ना रहना हम सभी के लिए बहुत दुखद था।

अब माता - पिता दोनों ही  गुरुदेव के प्रेम में विभोर। गुरुदेव ही उनके सब कुछ।
त्वमेव माता  पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव ।त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥

मकान  बन कर तैयार हो गया था ।यह 1999 -2000 की  एक छोटी सी घटना  है।तब स्वामी जी महाराज हमारे साथ नरसिंहपुर  में रहते थे। गुरुदेव का कमरा अलग  ध्यान भजन हेतु मंदिर सा पवित्र सेपरेट  था ।
परम पूजनीय स्वामी जी गुरुदेव महाराज जी को सूर्यनारायण के दर्शन करना बहुत सुन्दर लगता था | 

उगते हुए सूर्य को देखकर और छत से ही नरसिंह भगवान के दर्शन करके वे  बहुत ही आनंदित होते थे।हमें भी सूर्योदय दर्शन बहुत अच्छा लगता है क्योंकि सूर्योदय होते ही सभी पक्षी चहचहाते है। सूर्योदय  एक नई आशा और उत्साह लेकर आता हैं | सूर्योदय सौंदर्यपान करने योगी जन सूर्योदय से पहले उठते है उस समय सारा आकाश सिन्दूरी रंग से भरा हुआ होता है और  सूरज शीतल किरणें  पेड़ पौधों, पक्षियों और जन जन में प्राण का संचार कर देती हैं।

गुरुदेव महाराज सूर्योदय का सुबह बहुत उत्सुकता से इंतजार करते थे | उनको लगता था कि सूर्य नारायण के दर्शन कब होंगे सुबह 3:00 से 4:30 -5:00 बजे तक ध्यान करते थे और उसके बाद फिर सुबह की सैर करने निकलते थे। तत्पश्चात वे सूर्य नारायण के दर्शन करने के लिए लालायित रहते थे।

पहले तो यह बात नहीं मालूम थी कि गुरुदेव महाराज इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा क्यों करते हैं  सूर्य उदय की और इतना आनंदित क्यों होते हैं सूर्य उदय होने पर? परंतु जब महायोग विज्ञान पढ़ी तब समझ में आया कि  महायोगियों को सूर्यदेव में साक्षात चतुर्भुज विष्णु रूप के दर्शन होते हैं।ऐसे सदगुरुदेव भगवान को कोटि-कोटि प्रणाम है।


रविवार, 28 मार्च 2021

भक्त प्रहलाद की जय🙏🏻

जब घर रंगे जाए 
तो दिपावली '
ओर जब घरवाले रंगे जाए 
तो होली ।

जब घर में दिपक जलाए जाए 
तो दिपावली ' 
और 
जब बाहर चौक में अग्नि जलाए 
तो होली ।

एक में अग्नि ( प्रकाश ) है ।
एक में जल है ।
दिपावली भगवान का त्यौहार हैं 
तो होली भक्त का त्यौहार है ।

जब बाहर रोशनी हो ' 
तो दिपावली 
ओर 
जब अन्तर्मन में रोशनी हो 
तो ----होली ।

 *आपको  रंगोत्सव होली की शुभकामनायें*🙏

* जय श्री राम *

सोमवार, 8 अक्तूबर 2018

एक गलत काम

कुत्सित  मानसिकता कोढ़ है समाज पर

बलात्कार एक कोढ़  है समाज पर।ऐसे बलात्कारी जिनका परिवार(पत्नी और बच्चे )होते हैं  उनकी पत्नियों के विषय में सोचें तो  उनके लिए  तो विवाह एक पवित्र सम्बन्ध कहा ही नहीं जा सकता . यह संसार का सबसे अपवित्र रिश्ता  बन जाता है. एक कोढ़ जो जीवन लेकर ही जाता है. ऐसे  बलात्कारियों की पत्नी अपने तन -मन पर शादी के रूप में बहुत बुरा बलात्कार झेलती है। उनकी पीड़ा को यदि  गहराई से  समझा जाये तो शरीर क्या रूह भी काँप जायेगा 

  इन पीड़ित महिलाओं को इस आग को उन निर्दोष लड़कियों  को सौंप देना चाहिए  जो आज इस कम वासना का शिकार बन रही हैं।मेरी माताओं और बहिनों से एक ही प्रार्थना है कि  वे  पुरुषों  को इतना ज्ञान दें  कि  वे नारी का सम्मान करना सीखे।

अगर कोई किसी की लड़की के साथ  गलत करता है तो उसकी माँ  ही ऐसे बेटे को गोली मार दे जैसे फिल्म "मदर इन्डिया" में बरसों पहले दिखाया गया था।