Wednesday, July 3, 2013

Realization of Grace of Guru


Money, luxurious houses, expensive cars and wealth are not Guru-Kripa. There are many troubles and calamities in this life which disappear without our knowledge, that is Guru's grace. Sometimes, despite the jostling in a crowded place while travelling, we somehow manage to avoid falling and maintain balance. The balance that saved us from falling is Guru-Kripa.


Whenever it is difficult to get even one meal, we still get enough to eat, that is Guru's grace. When you are burdened with many difficulties, still you feel the strength to face them, that strength is Guru-Kripa. When you are just about to give up and think that now everything is over. 


Then, at that very moment, you start seeing a ray of hope and you get ready to fight again, that hope is Guru-Kripa.When in times of trouble all your relatives leave you alone, a Guru-Bandhu (a friend or a brother or sister who believes in a Guru) comes and says to you - “You go ahead, we are with you.”, *that Guru -The words that give courage from a brother are Guru's grace.

 

Even when you are at the peak of success, full of money and happiness, you feel and humble that is Guru-Kripa.


Just having wealth, opulence and

success is not Guru-Kripa, but when you do not have these things, still you feel happy, satisfied and blessed, *that is Guru-Kripa.

 

 

 

 

 





              

Sunday, April 28, 2013

फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी


फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी



स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्म श्रंखला में श्री- ४२० (1955) राज कपूर, नादिरा और नर्गिस  द्वारा अभिनीत  फिल्म अपना एक अलग ही विशिष्ट स्थान रखती है.  अपने सम कालीन अभिनेताओं में राज कपूर की फिल्मों का एक अलग ही स्थान रहा है. भारत ही नहीं रूस भी राज कपूर की फिल्मों का अप्रतिम  दीवाना रहा है.  इसका मुख्य कारण राजकपूर का भोलाभालापन ,चार्लीचेपलिन वाला रूप , मुख मुद्रा और सार्थक कथा और संगीत की उपस्थिति है.  "श्री ४२०"  फिल्मजगत में मील का पत्थर साबित हुई है. इसमें   पूर्व-पश्चिम अमीर-गरीब  शिक्षित-अशिक्षित    वर्गों   की वास्तविक वस्तुस्थिति  का  अभूतपूर्व वर्णन किया गया है.

अनाथ,शिक्षित, ईमानदार,भोला राजू मन में कुछ बनने के सपने संजोये हुए इलाहबाद से मुंबई  रवाना  होता है. मुंबई में उसके पास ना रहने के लिए छत है ना खाने के लिए रोटी है. ना ही  उसका कोई अपना है. अपने जापानी जूते, इंग्लिश पेंट, रूसी टोपी को पहिनकर वह रास्ते में पैदल ही चल देता है. है.वह रास्ते का लम्बा सफ़र तय करने के लिए सेठ सोनाचंद से लिफ्ट मांगता है परन्तु सोनाचंद उसे ४२० कहकर कार से उतार देते है.जो मुश्किलों से टकरा कर जीवन के सफ़र में आगे बढ़ता जाता है  ईश्वर भी उसकी मदद करता है. 


मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी गाता हुआ राजू आगे बढ़ता जाता है.उसे सफ़र में कुछ   हाथी सवार, ऊँट सवार मिलते हैं जो उसे लिफ्ट देते है जैसे-तैसे राजू  मुबई पहुँच जाता है. अनजाने अजनबी महानगर में राजू के लिए  रोटी कपडा और मकान की बहुत बड़ी समस्या है परन्तु वह तनिक भी चिन्त्तित नहीं है.घुमते घुमते राजू  गरीबों कि बस्ती में पहुँच जाता है.मुंबई आते ही राजू  फुटपाथ पर सबसे पहले  एक भिखारी से मिलता है जो उसे ईमानदारी और परिश्रम  छोड़ बेइमानी से  धन कमाने की राह पर चलने कि शिक्षा देता है और अपना ईमान बेचने को कहता है.  .

फिर वह गंगामाई नाम की  फल बेचने वाली महिला से मिलता है गंगामाई सहृदय महिला है.बस्ती में रहने  वाले गंगामाई को  माँ समान मानते  हैं  चूँकि राजू के पास पैसे नहीं थे और वह सीधा, सच्चा था इसीलिये गंगामाई  उसे मुफ्त में दो केले दे देती हैं राजू एक केला  भूखे लड़के को दे देता है और दूसरा खुद खा लेता है.गंगा माई की मदद से राजू  को मुंबई में फुटपाथ पर रहने की सुविधा मिल जाती है.बस्ती वालों कि गुजारिश पर राजू दिल का हाल सुने दिलवाला सीधी सी बात ना मिर्च मसाला गाना गाकर सबको अपना बना लेता है. राजू ईमानदारी  की रक्षा के लिए प्राप्त हुआ मेडल गिरवी रख ने जाता है.जहाँ राजू की  मुलाकात गरीब विद्या से होती है, विद्या अपने पिताजी   के साथ मुंबई की एक छोटी सी चाल  में रहती है.विद्या ईमानदार, स्वाभिमानी, परिश्रमी और सुसभ्य, सुंदर शिक्षिका है. एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थियों का ही नहीं वरन देश के  भविष्य का भी निर्माता होता है. विद्या पीपल के पेड़ की छाँव में नन्हे मुन्हे धर्मात्माओं का निर्माण करने का स्नेहमयी ममतामयी, प्रयत्न करती है.

यह बस्ती सेठ सोनाचंद की बड़ी हवेली की छाँव तले है. जैसे बड़े पेड़ के नीचे छोटे पौधे नहीं पनप सकते वैसे ही सेठ सोनाचंद गरीबों को और गरीब बनाने के प्रयास में लगे रहते.यद्यपि  उनके भाषण में देशप्रेमी नेता होने की गर्मी है. विद्या को प्रभावित करने के लिए राजू एक लांड्री में काम  करता है. इस लांड्री में अमीरों के कीमती  कपडे धुलने और स्त्री करने के लिए आते है. लांड्री में काम करते हुए राजू की मुलाकात माया से होती है जो राजू की ताश के खेल में हाथ की सफाई से बहुत प्रभावित होती है. और अपने अभिजात्य वर्ग में उसे ताश खेलने हेतु आमंत्रित करती है. माया  राजू का परिचय किसी रियासत के राजकुमार   के रूप में करवाती है। राजू माया के लिए खेलता है और हर बार अपने हाथ की सफाई से बहुत बड़ी धन राशी जीत जाता है. इस  कम्युनिटी   में सेठ सोनाचंद भी शामिल हैं जो की राजू को पहचान लेते है। राजू  अपनी बुद्धि और कार्य कौशल के बलबूते पर   पुनः सेठ सोनाचंद से टकराने की हिम्मत करता है और भीड़ के बहुत बड़े हिस्से को अपने पक्ष में कर लेता है.
  
राजू की प्रतिभा से प्रभावित  होकर  सेठ  सोनाचंद राजू को अपने खास  काम के लिए 'मुख्य' नियुक्त कर देता है. अपने षड़यंत्र में  गरीबों को फंसा कर सेठ सोनाचंद  बहुत ही मामूली कीमत में किश्तों में मकान बनवाने  की घोषणा करता है। वह राजू के माथे सारा दोष  मढ़ कर  खुद विदेश भाग जाना चाहता है  राजू को उसके इरादे की भनक हो जाती है । सेठ सोनाचंद  गरीबों का धन लेकर विदेश जाने के लिए  अपने साथियों से बात करता है और राजू को इस कार्य हेतु विघ्न बनता देख उस पर जान का हमला कर देता है. गंगामाई  राजू को बचाने में अपने प्राणों की आहूति दे देती है राजू  बच जाता है ।  पुलिस  मौके पर पहुँच कर बड़े चोरों  श्री ४२० सम्माननीय सेठ सोनाचंद और उसकी मंडली को गिरिफ़्तार कर लेती है.  राजू को सही राह पर आते देख विद्या राजू को माफ़ कर देती है  अंततः,राजू विद्या  के साथ घर बसाने में सफल हो जाता  है  और अपनी बस्ती के बेघरबार  भाई बहिनों का भी मकान  बनवा देता  हैं .


Saturday, March 9, 2013

अंधियारे मानस मंदिर में प्रभु भक्ति का दीप जला देना


प्रभु भक्ति   





नरसिंहपुर की भोर: जहाँ रामधुन जगाती है सोए हुए मन

सुबह की पहली किरण अभी फूटी भी नहीं होती कि नरसिंहपुर के आँगन में एक अनोखी हलचल शुरू हो जाती है। श्वेत धोती-कुर्ता पहनकर, माथे पर चंदन सजाए और कानों में 'राधेश्याम-सीताराम' की मधुर धुन गुनगुनाते हुए लोग अपने-अपने घरों की देहरी लांघने लगते हैं। हाथों में मंजीरा, तुरही और पारंपरिक वाद्यों की थाप लिए जब ये कदम-कदम मिलाकर चलते हैं, तो देखते ही देखते आस्था की एक अनूठी टोली आकार ले लेती है। गंतव्य हैऐतिहासिक नरसिंह मंदिर।

प्रातःकाल का वह नीरव सन्नाटा, चारों तरफ लिपटी प्रकृति की मखमली हरियाली, पूरब के क्षيتिज पर तैरती सूर्योदय की सिंदूरी लालिमा, और प्रदूषण से अछूती वह शुद्ध, सुहावनी हवा... इस अलौकिक वातावरण में जब शंखध्वनि के साथ समवेत सुर गूँजता है:

"जय जय नरसिंह दया करके मेरी नाव को पार लगा देना, अंधियारे मानस मंदिर में प्रभु भक्ति का दीप जला देना..."

तो आस-पास के घरों की सोई हुई खिड़कियाँ और दरवाजे अपने आप खुलने लगते हैं। घरों की गृहिणियाँ और बुजुर्ग हाथों में सुलगती अगरबत्तियाँ और कपूर की थाली लिए नंगे पैर बाहर जाते हैं। सुर में सुर मिलते हैं, कदम से कदम जुड़ते हैं और यह प्रभातफेरी एक बहती हुई नदी की तरह आगे बढ़ जाती है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान नरसिंह को धूप-दीप और नैवेद्य समर्पित करने के बाद जब भक्तों में , दिव्य प्रसाद बँटना शुरू होता है, तो बच्चों की नींद पल भर में काफूर हो जाती है; आखिर सुबह का यह प्रसाद ही तो उनके कौतूहल और आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है!

घर-आँगन की आस्था और पापा का बैंकिंग अनुशासन

इस प्रभातफेरी की सुरीली गूँज जब हमारे घर के पास पहुँचती है, तो पूरा घर अध्यात्म के एक अनूठे रस में सराबोर हो जाता है। घर में सबसे पहले दादी  अम्माजी जागती , जिनकी झुकी हुई पीठ और कांपते हाथों में पूजा की थाली और अगरबत्ती देखकर ऐसा लगता है मानो साक्षात श्रद्धा ही आँगन में उतर आई हो। मम्मी भोर की पहली चाय की महक के साथ तुलसी के चौरे पर दीया जला देती हैं।

वहीं पापा, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के मध्य प्रदेश ज़ोन में वर्षों तक प्रतिष्ठित ब्रांच मैनेजर रहे हैं और जीवनभर बैंकिंग के सख्त अनुशासन, पंचुएलिटी (समयबद्धता) और टाइम-मैनेजमेंट के आदी रहे हैं, वे भी इस प्रभातफेरी की नियमितता के आगे नतमस्तक दिखते हैं। बैंक की शाखा को हमेशा नियत समय पर खोलने और सलीके से संचालित करने वाले पापा अब सुबह की इस 'आध्यात्मिक शाखा' के स्वागत में गंभीर मुद्रा में हाथ जोड़े आँगन में खड़े हो जाते हैं।

भाई भी इस दिव्य संगीत की थाप सुनकर अपनी नींद भूल जाता है और खिड़की से झांकते हुए टोली के बाल-गोपालों को प्रसाद लेते देखने के कौतूहल में जुट जाता है। पड़ोस के 'मिश्रा जी' और 'वर्मा चाची' भी अपनी-अपनी देहरी पर खड़े होकर इस बहती हुई गंगा में हाथ जोड़कर मानसिक डुबकी लगा लेते हैं; मानो पूरा मोहल्ला एक ही परिवार के धागे में बंध गया हो।

गुरुदेव की शिक्षा: नाद-योग और आंतरिक ध्यान

यह प्रभातफेरी महज़ एक पारंपरिक कीर्तन नहीं, बल्कि पूजनीय गुरुदेव द्वारा बताए गए 'नाद-योग' और 'मंत्र-ध्यान' का जीवंत स्वरूप है। गुरुदेव हमेशा कहते हैं कि जब सुबह के शांत ब्रह्ममुहूर्त में चित्त एकाग्र होता है, तब सामूहिक रूप से किया गया ईश्वर का नाम-स्मरण मन के सारे विकारों को धो देता है और हमें सहज ध्यान की स्थिति में ले जाता है।

रामधुन का यह समवेत स्वर अंतर्मन की सोई हुई चेतना को जाग्रत करता है, जिससे हमारे भीतर के नकारात्मक विचार शांत होते हैं और चित्त अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ध्यान में लीन होने लगता है। यह ध्वनि तरंगें पूरे वातावरण को एक ऐसे सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) में बदल देती हैं, जहाँ ध्यान लगाने के लिए किसी एकांत कंदरा की नहीं, बल्कि इसी सात्विक वातावरण की आवश्यकता होती है।

टोली अब अपनी धुन बदलते हुए गा उठती है:

"सीताराम सीताराम सीताराम कहिए, जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..."

पूरी तन्मयता से प्रभु नाम का रस पीते हुए यह कारवाँ राधा वल्लभ मंदिर की चौखट पर दस्तक देता है। घंटे-घड़ियालों की गूँज और महाआरती के प्रकाश से सोए हुए शहर को जगाते हुए, ये भक्त बिना किसी लोक-लाज के, अलमस्त होकर झूमने और नाचने लगते हैं। मुरलीधर मंदिर से होते हुए यह सिलसिला आगे बढ़ता ही जाता है। पीढ़ियाँ बदल गईं, पर उत्साह का यह रंग आज भी उतना ही चटक है जितना उनके पूर्वजों के समय में हुआ करता था।

मंदिर के पीछे बहती नदी और प्रकृति का सुकूँ

प्रभातफेरी की यह टोली जब घूमते हुए मुख्य नरसिंह मंदिर के प्रांगण में पहुँचती है, तो वहाँ का दृश्य विहंगम हो जाता है। प्राचीन मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके ठीक पीछे से बहती नदी की लहरों की कल-कल ध्वनि सीधे अंतरात्मा को छूती है। पानी की सतह पर सूर्योदय की पहली सिंदूरी किरणें जब तैरती हैं, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं भगवान नरसिंह के चरणों को धोकर ध्यान में लीन हो गई हो। नदी के घाटों से आती सौंधी महक, शंख की गूँज और घंटियों की आवाज मिलकर एक ऐसा नाद पैदा करती हैं कि वहाँ पहुँचकर हर भक्त का मन स्वतः ही शांत हो जाता है।

शहर के एक कोने में खड़े शर्मा जी इस मनोरम और जादुई छटा को निहारते हुए विस्मृत थे। कभी महानगर की चकाचौंध में भागती जिंदगी जीने वाले शर्मा जी के लिए यह दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं था। जहाँ भारी बरसात हो या हाड़ कँपा देने वाली कड़ाके की ठंड, कम से कम पचास से सत्तर लोगों की यह जीवंत टोली हर सुबह ईश्वर के द्वार पर हाजिरी देने पहुँच ही जाती है।

शर्मा जी को याद आया कि हमारे मनीषियों ने इस स्वास्थ्यवर्धक दिनचर्या को कितनी चतुराई से धर्म और संस्कृति के साथ जोड़ दिया था, जिसे आज का आधुनिक समाज 'मॉर्निंग वॉक' के ठंडे और नीरस नाम से पुकारता है।

जो शर्मा जी नौकरी के दिनों में सुबह नौ बजे से पहले कभी बिस्तर नहीं छोड़ पाते थे, आज सेवानिवृत्ति के बाद वे खुद सुबह पाँच बजे उठकर तैयार खड़े होते हैं। उनके जीवन का यह यू-टर्न उनकी पत्नी और परिवार के लिए एक सुखद आश्चर्य था। जब वे महानगर में थे, तब उनकी सुबह किसी अलार्म या चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि बच्चों के लाउड 'पॉप म्यूजिक' के कानफाड़ू शोर से होती थी। वह भी क्या जिंदगी थीकोट-टाई पहनो, कार की चाबी उठाओ, ट्रैफिक के समंदर में गोता लगाओ और रात को लाश की तरह थक-हारकर बिस्तर पर गिर जाओ! देर रात तक टीवी और मोबाइल स्क्रीन की सभ्यता में पले-बढ़े बच्चे तो जल्दी सोना जानते थे और जल्दी उठना।

साधु-संतों की थाती और स्वास्थ्य का वरदान

नरसिंहपुर को केवल एक शहर कहना इसकी गरिमा को कम करना होगा; समय-समय पर यहाँ आए महान साधु-संतों ने इसे एक जाग्रत तीर्थस्थल में बदल दिया है। उन्होंने जनमानस की मनोशुद्धि के लिए जो अद्वितीय बीज बोए थे, यह प्रभातफेरी उसी का एक अमर फल है। सुबह-सुबह रामधुन की यह अलख पूरे शहर की आबोहवा में सात्विक मिठास घोल देती है, जो लोगों के भटकते मन को भक्ति के शांत प्रवाह में मोड़ देती है। हर चौराहे पर मुस्कुराते मंदिर, भगवान नरसिंह की छत्रछाया, पीछे बहती नदी और कुछ ही दूरी पर पतितपावनी माँ नर्मदा का सान्निध्ययह त्रिवेणी इस शहर को एक दुर्लभ सौभाग्य की तरह मिली है।

आज इस प्रभातफेरी में केवल भक्त ही नहीं, बल्कि सुबह की ताजी हवा की चाह रखने वाले नए युवा और सैर करने वाले लोग भी जुड़ते जा रहे हैं। दशकों पुरानी यह अनवरत परंपरा आज पूरे देश को शांति, सद्भाव और आपसी भाईचारे का मौन संदेश दे रही है।

चिकित्सा विज्ञान भी कहता है कि सुबह की यह शुद्ध और प्रदूषण मुक्त हवा जब फेफड़ों में जाती है, तो रक्त को संजीवनी देती है। शरीर में बनने वाला ऑक्सीहीमोग्लोबिन हमारी हर कोशिका को नई ऊर्जा से भर देता है। प्रकृति ने हमें 'सुबह' के रूप में जो अनमोल उपहार दिया है, क्यों अपनी इस व्यस्त और मशीनी जिंदगी में से कुछ पल निकालकर उसका आनंद लिया जाए? मन में पवित्र और ऊँचे विचार तभी अंकुरित होते हैं, जब चारों तरफ का माहौल शुद्ध हो। आधुनिक शोध भी मानते हैं कि सुबह का यह संगीतमय भ्रमण मानसिक तनाव और अवसाद (डिप्रेशन) को जड़ से मिटाने की अचूक दवा है।

नरसिंहपुर की यह भोर महज़ एक शुरुआत नहीं, बल्कि जीवन को नए उत्साह और उमंग के साथ, धर्म और योग के मार्ग पर चलने का एक हरियाला आमंत्रण है!