गुरुवार, 23 अगस्त 2012

तेरी एक बूंद के प्यासे हम

एक बूँद के प्यासे हम 


प्रेम तो जीवन का आधार है, धुरी है. केंद्र है. बिना प्रेम .स्नेह. अनुराग  की भावना के जीवन निष्प्राण है. नीरस है .  तनिष्क और सुजाता  की शादी को लगभग पाँच साल हो गए थे. तनिष्क और उसकी माँ  को सुजाता से  दहेज के लेन-देन को लेकर शिकायत थी  तनिष्क की माँ ने इसी बात पर सुजाता को हर छोटी से छोटी बात पर मानसिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया था और सुजाता के  माता- पिता भाई बहिन के लिए भी गलत और  असहनीय  शब्दों का उपयोग करने लगीं . इतना ही नहीं ,तनिष्क भी सुजाता के मायके जाकर  उसके भाई  और पिता से सुजाता की भरपूर निंदा कर  सुजाता को बेइज्जत कर आया उसकी इज्जत खाक में मिला आया   . वह उसके घर जाकर चीखता चिल्लाता , लड़ता  झगड़ता आस-पड़ोस वालों की भी परवाह  नहीं करता और सुजाता को गंदे -गंदे शब्दों द्वारा  बेआबरू कर आता ".उसने  सुजाता के पिताजी को  बार -बार धमकाया कि वो सुजाता को तलाक दे देगा तब सब देखेंगे।परन्तु सुजाता के भाई और पिताजी सब  चुपचाप सुनते रहे. 

 उनकी बेटी और बहिन को शब्दों द्वारा बेइज्जत करने का नतीजा हालाकि  बहुत बुरा हो सकता था परन्तु वे एक शब्द भी नहीं बोले. हीं क़ानूनी कारवाही कीइस उम्मीद पर कि तनिष्क को एक दिन अपनी भूल का अहसास जरूर होगा . तनिष्क और उसकी माँ ने सभी साजिशों द्वारा  सुजाता को  प्रताड़ित  करने का अवसर नहीं  छोड़ा.वो जानती थी कि सुजाता भावनात्मक और संवेदनशील है. इसके ऊपर  भावनात्मक प्रताड़ना का ज्यादा प्रभाव पड़ेगा. अतः तनिष्क ने सुजाता को बदनाम करने के लिए सुजाता के ऊपर आरोप लगाना शुरू कर दिए कि सुजाता  मुझे मारती है मेरे ऊपर  जुल्म करती है वो एक फूहड़ , गंवार पत्नी है. मै  तलाक लेकर प्रेम-विवाह करना चाहता हूँ. सुजाता ने तनिष्क को लाख बार समझाने कि कोशिश की  कि मेरे पिता बुजुर्ग हैं बीमार हैं और सेवानिवर्त्त है, मेरे भाई  छोटे हैं उनकी  कोई नौकरी नहीं है.मेरे माता-पिता ने मुझे मेरे भाइयों से भी ज्यादा  प्यार से रखा है, मुझे पढाया लिखाया और इस योग्य बनाया है कि मै अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ. उन्होंने   मुझे अच्छे से अच्छे गुण और संस्कार दिए हैं. इन्हें पुष्पित पल्लवित होने में मुझे अनुकूल वातावरण और प्रोत्साहन दोमेरी  शादी में उन्होंने जो भी दिया है  वो उनकी  इमानदारीपूर्वक, बड़ी मुश्किल से खून-पसीना करके कमाई हुई राशि है. मेरी शादी के कारण उन्होंने  अपने इलाज नहीं करवाया.अपनी-सुख-सुविधों और मनोरंजन  के अवसरों को गँवा दिया. धन तो नश्वर है परन्तु संस्कार और प्रेम शाश्वत होता है. प्रेम के अभाव में बाहरी सौंदर्य और आकर्षण अर्थहीन है. अस्थायी है. जो सिर्फ युवावस्था  तक सीमित  रहता हैजिसमें आत्मिक प्रेम नहीं वह हाड़- मांस  का पुतला मात्र   है  शारीरिक  सौन्दर्य  समय की गति के साथ-साथ  नष्ट हो जाता है. आत्मिक प्रेम शाश्वत रहता है. और निस्वार्थ, निष्कपट, निश्छल प्रेम की भावना जिसमे नहीं होती  वह मरूस्थल में सूखे हुए  ठूंठ के समान होता है  सच्चे प्रेम रहित मनुष्य का जीवन कभी भी सफल नहीं हो सकता फल-फूल  नहीं सकता. यह  प्रेम का सागर ही है जिसमें क्रोध , ईर्ष्या, आशंका, आदि मात्र क्षणिक  लहरें हैं जो केवल सतही उथल पुथल उत्पन्न कर सकती हैंइस आत्मिक प्रेम के सागर  सागर में   डुबकी लगाने पर अक्षुन्न आनंद  के  गहराई  की थाह नहीं मिलती.

परन्तु इतनी  जरा सी बात तनिष्क के समझ नहीं आई. उसने छल पूर्वक  सुजाता  को उसके मायके भिजवा दिया. और सुजाता से बात तो दूर  उसके मायके वालों  से  संपर्क तोड़ लिया. एक दिन  टेलीफ़ोन पर सुजाता की  सास ने सुजाता   के घर वालों से कह दिया कि हमारी मांग  पूरा ना कर आपने हमारा अपमान किया  है वो तो अच्छा हुआ जो सुजाता  अपने मायके आ गयी नहीं तो वहीँ मरी पड़ी होती और आपलोगों को उसकी लाश भी नसीब नहीं होती.उनके ये शब्द अंदर तक लहूलुहान कर गए। क्या ये सब कहने का अधिकार पुरुष और उसके परिवार को ही है अगर  नारी अनुचित को अनुचित कहे तो  सर्प दंश सा लगता है क्यों? उसके जीवन की दीवाली अमावस बना दी जाती है क्यों?

पता नहीं  लोग  पढ़ी लिखी लड़कियों को  दहेज़  क्यों नहीं देते? आज तो जमाना बराबरी का है. लड़कियां  बिना पूर्ण  -विराम के प्रगति के नए सोपानों पर चढती ही  जा रही हैं आज की लड़कियां डॉक्टर, इंजीनिअर , प्रोफ़ेसर ,चित्रकार, गायिका, लेखिका  हर   क्षेत्र में अपनी कार्य कुशलता की विजय ध्वजा लहरा रही है .फिर शादी के लिए उनके माता-पिता  लड़के वालों से दहेज़ क्यूँ नहीं मांगते ?  संतान प्राप्ति  वंश वर्द्धि भी बिना नारी  संभव ही नहीं है तथापि यह  एक तरफा झुका हुआ पुरुष -प्रधान समाज पढ़ी लिखी, सुंदर, सुसंस्कृत, सुसभ्य  नारी  पर ही ज़माने भर के कलंक लगाने से बाज नहीं आता. उसकी भावनाओं से यह  कहाँ का  बदला लेता  है?
यह शाश्वत सत्य है जो   दूसरों की उपेक्षा करता है. तिरिस्कार करता है  घृणा करता है,  वह स्वयं भी बदले में  घृणा और तिरिस्कार पाता है इसके विपरीत जो  प्रेम और वात्सल्यमय व्यवहार करता है वह ही सर्वत्र आदर पाता है.  आतंरिक संस्कार से  ही कोई अमीर और कोई गरीब होता है ना कि धन से. इतनी छोटी सी बात अगर सभी के समझ में आ जाये तो जीवन रुपी बगीचे में फूल ही फूल खिलें कभी कांटे ना आये.




शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

मां

माँ, मन और भावनाएं 

मन है तो भावनाएं है. भावनाएं हैं तो अनुभूति है. अनुभूति है तो अनुभव है. अनुभव है तो रस है. खट्टे-मीठे रस. इन्ही नौ रसों से मिलकर संसार बना है.इन सभी रसों में सर्वोपरि है मातृत्व की अनुभूति . मन का स्थायी भाव है प्रेम प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा. जहा प्रेम होता है वहा उम्मीदे होती हैं, माता -पिता को बच्चो से और  बच्चो को माता -पिता से. माता -पिता बच्चों को बड़ा करते है एक उम्मीद के सहारे . ये जीवन के रिश्ते investment के सिद्धांत पर चलते हैं. जितना ज्यादा समय और समर्पण इन रिश्तों को निभाने में लगाया जाता है  उतने ही मीठे फल इस रिश्ते रुपी बगीचे में लगते हैं. शारीरिक सुख संसार की सुख सुविधाओ से प्राप्त होता  है पर  अपनों के बिना संसार भी असार लगता है. यह तो मानसिक सुख ही है जो  कठोती के साधारण  जल  को भी गंगा जल समझ स्नान कर लेता है . नहीं तो गंगा जल में स्नान के बाद भी मन खुश नहीं होता .

मानसिक सुख की तुलना संसार के किसी पदार्थ से नहीं की जा सकती. यह सुख ठोस, द्रव और गैस के रूप में नहीं बंधा है. यह abstract . (बिना किसी रूप का ) होता है. यह भावनात्मक होता है. भावना के बल पर ही हम रिश्ते बनाते हैं, जब तक भावनाएं रहती है. रिश्ते हैं नाते हैं यादे है. अन्यथा जिस दिन भावना ख़त्म हो जाती है सारे सुख , सारे रस ख़त्म हो जाते है. हम जिन्दा तो रहते हैं पर निष्प्राण . जैसे बच्चा  खिलोने  में चाभी भरकर छोड़ दे और वो खिलौना तब तक चलता रहता है.जब तक चाभी भरी है. इसी परिपेक्ष्य में एक छोटी सी घटना है-

अन्वेषा का विवाह ऐसे घर में होता है जहा उसे शादी के बाद माँ बनने पर प्रतिबंधित किया जाता है. वह इसी  उम्मीद के सहारे जीती है कि जल्दी ही वह इस सुख को जरूर प्राप्त करेगी पर उसे पता नहीं था कि वो इस भावना से वंचित है. मातृत्व विहीन नारी का जीवन  सार्थक नहीं कहलाता . जब उसे ये पता चलता है उसकी उम्मीदें टूटती हैंजिससे  वह गहरे दुःख में पहुँच जाती है. इस दुःख की परिकल्पना भी कोई  नहीं कर सकता उसे छोड़कर  जो निस्संतान हो. अकेला हो. अन्वेषा के आतंरिक दुःख क़ी कोई सीमा नहीं थी. उसके पति और उससे सम्बंधित जन उसे विषादग्रस्त  देख मानसिक चिकित्सक के पास ले जाते हैं और दवाई खिलने लगते है बिना यह अनुभव किये कि  दवाइयां अन्वेषा  के मस्तिष्क पर विपरीत रासायनिक प्रभाव उत्पन्न कर रही  है.मनोचिकित्सक तो खुद ही आधे पागल होते हैं  अपनी ग्राहकी बनाने के लिए अच्छे भले स्वस्थ्य व्यक्ति को भी बीमार घोषित कर दे ऐसे कई उदाहरण  है चिकित्सकों के जब वे यम दूत से कम सिद्ध नहीं हुए हैं .  अन्वेषा  शिक्षित  थी . उसे पता था कि उसकी  बीमारी का ईलाज मानसिक रोगी के पास नहीं . उसके पति के पास है .  उसका ईलाज संतानप्राप्ति  था. उसके पति का साथ और वैचारिक, भावनात्मक स्पर्श था. किसी भी नारी के लिए मातृत्व की वेदना बहुत ही अनियंत्रित होती है.यह वेदना स्त्री होने के वजूद  के ख़त्म होने जैसी होती है .इस  वेदना को अनीता देसाई  ने अपनी पुस्तक "Cry The Peacock" में  प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है।

अभी हाल ही में यह भावना इंसान ही नहीं जानवरों में भी देखी  गयी है वो भी सबसे खूंखार समझे जाने वाले प्राणी शेर में. कैलिफोर्निया के एक चिड़ियाघर में एक शेरनी ने तीन बच्चों को जन्म दिया . दुर्भाग्य से, गर्भावस्था के दौरान कुछ कठिनाइयों क़ी वजह से वे cubs समय पूर्व ही पैदा हो गए. और आकार में बहुत छोटे होने क़ी वजह से जन्म लेते ही मर गए. delivery से recovery के बाद mother tiger का स्वस्थ्य बहुत ख़राब हो गया . चिकित्सकों ने बताया शारीरिक रूप से वह पूर्ण स्वस्थ्य है . परन्तु अपने बच्चो के न रहने से वह गहरे अवसाद , गहरे दुःख में चली गयी है. चिकित्सकों क़ी सलाह पर उसे दुसरे नवजात बच्चों के समीप रखने का निर्णय लिया  गया . जिससे कि उसकी मानसिक दशा ठीक हो सके. देश के सभी चिड़ियाघर में खोज-बीन के पश्चात् भी कहीं शेर के नवजात शिशु नहीं मिले. और शेरनी को  गहरे अवसाद और दुःख से मुक्ति  भी नहीं मिली . जब चिकित्सकों को  mother tiger को बचाने का कोई और रास्ता नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने सूअर के नवजात शिशुओं को tiger skin में पैक करके बच्चों को mother tiger. के पास रख दिया. जिससे  शेरनी को मानसिक अवसाद से बचाया जा सका और उसकी प्राण रक्षा की जा सकी अन्यथा गंभीर मानसिक दुःख की अवस्था में शेरनी की मृत्यु तक हो सकती थी .

यह  घटना  सिद्ध करती है कि प्रत्येक  चैतन्य में भावनाए होती ही है. जिस दिन चैतन्य से भावनाए मर जाती है उस दिन शरीर चैतन्य न होकर जड़ हो जाता है. मृतप्रायः  हो जाता है . भावनाए  और जीवन एक  दुसरे के वैसे ही  पूरक  हैं जैसे प्राण और शरीर.भावनाएं आहत होने पर मन और शरीर क्रियाहीन  ,गतिहीन हो जाते हैं तथा  भावनात्मक उपचार  के अभाव में  प्राणों का  बच पाना  भी कठिन  हो जाता है। 

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

जैसा भाव वैसा पाव


 भाव

"पत्थर भी सजीव हो उठता है गर भाव भक्ति  के मन में हो" 

         यह शाश्वत तथ्य है कि सुख की  अनुभूति भोजन वस्त्र   और  आवास से     होती  है. तथा  शांति का  अनुभव प्रेम, सेवा, करुना, दया, धर्म, मानवता से होता है सुख और शांति में मुख्य अन्तर यह होता है   कि  शांति ,संतुष्टि आत्मिक होती है और सुख सांसारिक  होता है।

 गीता में श्री कृष्ण  ने  कहा है -- "भावना  से ही यह सारा जगत संचालित होता है"। 

भाव शब्द बहुत विस्तृत है इसे परिभाषित करना  कठिन है। कुछ पंक्तियाँ भाव को समझने के लिए- 


भाव इन्द्रधनुष है,भाव  प्रकाश के सभी रंग है।
भाव सुदामा की मित्रता है,भाव  रावण  की शत्रुता है।
भाव मीरा की  भक्ति है,भाव प्रह्लाद की शक्ति है। 
भाव राधा का प्रेम है, भाव दुर्गा रुपी शक्ति है। 
भाव  सीता का त्याग है, भाव शबरी के जूठे  बेर हैं,                                                                                       
भाव तृप्ति है,भाव मुक्ति है।
भाव विचार है,भाव अनुभूति है।
भाव आत्मा है,भाव संगीत है 
भाव प्रार्थना है,भाव पूजा है। 
भाव वेद  है, भाव पुराण है।
भाव- सागर  है ,भाव- आकाश  है। 

भाव सुख है भाव दुःख है।           
भाव विरक्ति है,भाव क्या नहीं है
भाव केवट का श्री राम को नैया पार कराना  है।  
भावमय सारा जगत है।
भाव ही वह सागर है जिसमे डूब  भवसागर पार हो  जाता है 
                
सामान्यतः  हम जिससे लगाव रखते हैं वो भी हमसे लगाव रखता  है जहाँ भावनात्मकता  होती है  होता है वहां अद्भुत प्रगाढ़  रिश्ते बनते हैं और निभते हैं ये भावनात्मक सम्बन्ध सेवा, त्याग और समर्पण की भावनाओ को लिए हुए एक दुसरे की छोटी से छोटी आवश्यकताओं को समझते हैं. परन्तु एक तरफा भाव कभी  सार्थक नहीं होता वेसे ही जैसे ताली बजाने के लिए दोनों हाथों कि आवश्यकता होती है.
         
        प्रत्यक्ष रूप  से, बहुधा लोग धन-अर्जन को ही जिंदगी का ध्येय मानते हैं। घर में माता-पिता और बाहर अध्यापक बच्चों से कहते आये है -"पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब और खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब". और बड़े होकर खूब बड़े पद पर जाने की शिक्षा देते हैं।   सुख का मार्ग भौतिकता या धन से होकर जाता है .परन्तु  शांति  का मार्ग धन से होकर नहीं जाता.हमें पढने -लिखने की शिक्षा  धन प्राप्ति के लिए अनैतिक साधनों  जैसे- हिंसा, अपराध. चोरी, लूट आदि के उपयोग से दूर रहने के लिए दी जाती है .आत्म-निर्भर और  स्वाबलंबी बनने   के लिए दी जाती है. अपने जीवन को  अपने सहारे जीने के लिए  दी जाती है. ताकि हम  किसी  के बेवजह के दबाव में न रहे  और अपने स्वाभिमान की रक्षा कर सकें. इसके अतिरिक्त , "तन, मन, धन सब कुछ   ईश्वर  के द्वारा दिया हुआ  समझ इश्वर को ही समर्पित कर सके।

 श्री कृष्ण  ने गीता में कहा है -"ईश्वर   को अपनी हर चीज को समर्पित  करो". ईश्वर   को वही समर्पित किया जाता है  जो पवित्र और शुद्ध भाव से कमाया गया हो।

          यह सर्व विदित है  कि धन के लिए पुरातन काल से युद्ध और महायुद्ध होते आये हैं।हत्या , लूटपाट से प्राप्त धन आत्मिक शांति नहीं दे सकता। जिस धन  में  असहाय, निर्बल  को धोखा  देने, उसके पैसे को हडपने की बदबू , गरीबों का हक़ छीन कर अपनी जेबें भरने  का दंभ  हो , निर्बलों के रक्तपात का रंग हो   वह सुख दे सकता है पर मन  की  शांति नहीं. जिस धन में  पसीने की महक, इमानदारी की ख्श्बू, इश्वर का आशीष  नहीं होता  वह धन  रोग, शोक, क्लेश, असमय मृत्यु, जन- धन की हानि, अपमानित होने का भय लाता है। ऐसे धन में  प्रतिष्ठा गवाने की चिंता अपयश या बदनामी फैलने का डर हर पल लगा ही रहता जो चैन की साँस नहीं लेने देता.ऐसा धन इश्वर को समर्पित करने योग्य नहीं होता।

  स्पष्टतः, प्रेम  जीत है।   युद्ध हार है। युद्ध करके ही  यह समझ में आना मूर्खता  है . परन्तु निर्बल से प्रेम विरले ही करते हैं जब तक श्री राम समुद्र  से  अनुनय -विनय करते रहे  तब तक  समुद्र ने लंका पार  हेतु उनकी मदद नहीं की  परन्तु जब उन्होंने सम्पूर्ण समुद्र को अपने एक बाण से सुखाने हेतु तीर तरकश में डाला समुद्र मनुष्य का भेष धारण कर श्री राम के सम्मुख हाथ जोड़ कर बिनीत भाव से खड़ा हो गया " विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीती बोले राम सकोप तब भय बिनु होय  न प्रीती"  शक्ति के भय  से ही प्रीति   उत्पन्न  होती है .

यह भी सत्य है।  प्रेम से खूंखार जानवर तक वश में हो जाते हैं शेर , हाथी, भालू  आदि रिंग मास्टर के आदेशों पर  नाचते हैं.पशु भी 'भाव ' समझते हैं, सम्बन्ध  समझते हैं ।जहाँ  भावनाओं को  समझा जाता है. रिश्तों की क़द्र होती है. वहां   सच्चाइ होती है  वहां 'प्रेम  पथ' होता है . वहां भौतिक आकर्षण, भौतिक आडम्बर  नहीं होता है।  प्रेम  और शांति के  मार्ग में ही  जीवन  जीने की कला  है   अगर इतनी सी बात ज्ञानी - ध्यानी पांडव कौरवों के समझा में आ जाती तो इतिहास में "महाभारत ' न रचा जाता. विश्व युद्ध नहीं होते. राज -पाट  के  लिए इतिहास में घटित युद्ध  के द्वारा  विनाश नहीं नही  हुआ  होता । ये सब भाव के आभाव का ही परिणाम है।




भाव  क्षण  हृदय  में बसते हैं
जो भुलाये नहीं भूल पाते  हैं 

कभी सुख में कभी दुःख में तो कभी अकेलेपन में

  .भावपूर्ण घटनाएँ   याद आती   है

पशु,पक्षी, पौधे ,प्रकृति सभी समझते हैं 'भाव

भाव का कोई रूप नहीं कोई रंग नहीं

भाव मूक है वाणी नहीं

भाव स्वर है साज नहीं



बचपन , जवानी, बुढ़ापा   में परिवर्तित  होते हैं - भाव

जैसे बचपन में होते हैं शुद्धस्वाभाविक,निश्छल  भाव
वैसे  युवा मन  में  होते हैं  साहस ,शील, दया ,त्याग,प्रेम, के भाव ,
जो होते हैं मन, बुद्धि और आत्मा  के दर्पण।

बचपन का सावन , कागज की  कश्ती,
दादी नानी की कहानी  , माँ  की लोरी
धूप में  निकलनाटिड्डे , तितली ,चिड़िया  पकड़ना ,
गुड्डे -गुड़ियों  की शादी , लड़ना -झगड़ना
मंदिर  में  दीप   ,  घंटी  बजाना,
टूटी हुई  चूड़ियों से खेलना, रेत के घरोंदे  बनाना,

युवा -जीवन   में   प्रथम दृष्टि  का   प्रेम।
पुष्प वाटिका में श्री राम और सीता का  एक दुसरे को  देखना
राम के वियोग में दशरथ का प्राण त्यागना ,
प्रह्लाद की पुकार पर नरसिंह अवतार  होना
राम - भाव लिए पत्थर का पानी में तैरना
राम -भाव लिए शिव का नीलकंठ होना
कृष्ण भाव  में   मीरा का  विष  अमृत होना
कृष्ण की बांसुरी  पर राधा  का  लय  होना और
गायों  में  स्वतः दुग्ध -धार  प्रवाहित होना या ,
मुरझाये पौधों  का खिलना,
मल्हारकी धुन पर काली  घटाओं का आच्छादित होना
यहाँ  शब्द नहीं भाव थे।
इन भावों को जीना  जीवन है।

भाव के अभाव में  जीवन वैसा  है जैसे बिना आत्मा के शरीर।
भावों का  नहीं   है कोई मोल।
इन्हें   कोई  खरीद सकता और बेच सकता सकता कोई
इन्हें दिया और लिया जा सकता है
अनुभव किया जा सकता है  केवल
वो भी  मात्र  एक तरह से- भाव- पथ   पर चलकर।

    ये सभी बातें कितनी साधारण  हैं  परन्तु ये दिल में स्थायी निवास बना लेती हैं जिनका महत्व धन, दौलत से भी ज्यादा है.जिनमे भावनाए जुडी होती हैं . निश्छल प्रेम निस्वार्थ भाव छिपा रहता है क्या  इस भाव की कीमत  धन सम्पदा या यशगान से आंकी  जा सकती है? नहीं .जिस प्रेम में  धन लोलुपता हो उसकी जीत कभी नहीं हुई. इन  चीजों का मोल केवल भावना है पैसा नहीं.यदि ये बचपन के क्षण छीन लिए  जाएँ, भावनाएं मार दी जाएँ तो उनकी क्षति पूर्ती करोरों की दौलत से भी नहीं  की  जा सकती.  ये भाव अतुलनीय है. बच्चों  के इस बचपन के मासूम भाव  का मरना  वैसा ही है जेसे मासूम  बच्चे की हत्या करना. . ये अमूल्य हैं.


     उपरोक्त  भावों के वर्णन से यह  निष्कर्ष निकलता है  कि  सामाजिक दिखावा और सच्चे जीवन  में आकाश -पाताल का अंतर होता है। जो  सांसारिक माया ज्ञानियों के चित्त  को भी हर लेती है उससे  मुक्ति तो   श्री कृष्ण की कृपा के आलावा  और कहीं  भी नहीं हो सकती ।   पेसे से   बिस्तर तो खरीदा जा  सकता  हैं नींद नहीं . रोटी खरीदी जा सकती है   भूख नहीं. किताबें खरीदीं जा सकती हैं   ज्ञान नहीं।

      ज्ञान (जानना ) या  संवेदना , समानुभूति, अनुभव से आता है और अनुभव  प्रेरणा से आता है बिना अनुभव हुए ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती . मात्र किताबें  पढ़कर कोई भी ज्ञानी नहीं बन सकता वेसे ही जेसे रसगुल्ला  मीठा होता है  ये जानकर  मिठास क्या होती  है यह कोई नहीं बता सकता इसलिए ज्ञान प्राप्ति के लिए अनुभव  का होना उतना ही आवश्यक है जितना की जीवन के लिए भोजन.

यदि मात्र  धन से आन्तरिक सुख जिसे मन की शांति कहते हैं  मिलता होता  तो सुख की तलाश में सिद्धार्थ  अपना राज-पाट  पत्नी और बच्चा छोड़ कर  मात्र उनतीस  वर्ष की उम्र में  वन में न चले गए होते और "गौतम बुद्ध" नहीं कहलाते ?अगर ऐसा होता तो टाटा, बिरला, अम्बानी  ये सब  बहुत बड़े संत  कहलाते