रविवार, 30 सितंबर 2012

प्यार धोखा शादी

 अंधेरे  हैं मन के दिया तो जला ले                     




 महिलाये अपनी व्यथा -कथा  बताने के लिए किसके पास जाएँ ? क्या करे? कहाँ जाएँ?  महिलाओं के लिए उनके पति का उनके प्रति रुष्ट, कठोर असंवेदनशील व्यवहार  सबसे बड़ा आन्तरिक पीड़ा का कारण  होता है । जब पुरुषों के लिए शादी गंभीर घटना नहीं हो सिर्फ सामाजिक दिखावा मात्र  हो तब अलगाव होना स्वाभाविक ही है. कैसे वैवाहिक समस्याओं से छुटकारा पायें आदि अनेक अनसुलझे प्रश्न  हैं जो नारी की मौत या आत्महत्या का कारण बनते है। महानगरों में बिना शादी के  साथ रहना और अलग हो जाना वैसा ही है जैसे रोज  शादी और रोज तलाक।महानगरों में रहने वाली अधिकतर महिलाओं  के लिए जीवन विषपान से कम नहीं होता।  समाज में नारी की  ऐसी दशा क्यूँ है इस तरह के कई सवाल  मन में उठते  है । अपनी मन की इस जिज्ञासा को जानने और समझने के लिए  मैंने   प्रभावित  महिलाओं  का दौरा किया और उनसे  बहुत से प्रश्न  किये।


उन्होंने बताया - "तलाक की घटनाएँ  सिद्ध करती हैं कि  लोग गुणों की सराहना तो करते हैं पर सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए. एसे  लोग  अपने आप को देखने के बजाय दूसरों की निंदा करने में ज्यादा रूचि लेते हैं।  खुद तो कुरूप है पर दूसरों को जरूर बोलेंगे कि  वो सुंदर नहीं है बेडोल है, नीचा दिखने वाली  अनेक बातें .दोष सभी में होता है कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता परन्तु  लोग अपने को पूर्ण समझते है अपने . अपने  दोषों को न देखते हुए दूसरों के दोषों को देखने में अपनी  बुद्धिमानी समझते हैं   अगर स्वयं का एक हाथ टूटा हो तो  ये नहीं देखते कि  उनका  एक हाथ टूटा है और  दुसरे का हाथ टूटा हो तो उसे  तुरंत  लूला  कहने से बाज नहीं आते।"

दूसरी बात आज लोगों के मन में भगवान का डर समाप्त हो चुका है भावनाएं मर चुकी हैं संवेदनाये दम तोड़ रही हैं . वे आतंकवाद, अग्रवाद  की ही डगर पर  ही चलना चाहते हैं और दूसरों को अपने चरित्र चित्रण से भयभीत रखना चाहते हैं  जैसे  उनका  जन्म ही  अपराधी  बनने  के लिए हुआ  हो ।

एक घटना -राजधानी दिल्ली  में  20 साल से एक साथ रह रहे एक जोड़े ने आपसी सहमति से अलग रहने का नियम  किया  जिसमे अलग रहने के लिए पति गुजारा भत्ता  के तौर पर पत्नी  को पांच करोड़ रूपये देता है । दोनों के इस आपसी फैसले पर दिल्ली  के  साकेत फेमिली कोर्ट ने  मुहर लगायी ।दिल्ली  के कोलोनाइज़र के पुत्र  ने अपनी पत्नी  को मेंटेंस के रूप में पांच करोड़ रूपये  दिए । सन 1991-92 में इस जोड़े की शादी हुई थी। फरवरी 2012 में दोनों ने आपसी सहमती से  तलाक के लिए फेमिली कोर्ट में आवेदन किया जब  कोर्ट में केस चल रहा था, उस दौरान पति ने  पांच करोड़ की रकम पत्नी  को समझौते के तौर पर देने की बात रखी और पत्नी  इसपर राजी हो गई। इस 5 करोड़ की राशि में से  पत्नी  ने एक घर खरीदा और बैंक से पढाई के लिए लिया गया कर्जा चुकाया।

 दूसरी घटना सरला की पडोसी से सम्बंधित है.  सरला की पड़ोसन  गुप्ता आंटी पढ़ी लिखी एम . ए . एम . एड .हैं  जो अपने गुणगान और दूसरों कि निंदा स्तुति से प्रसन्न रहती हैं. गुप्ता आंटी  के परिवार में सभी महिलाएं बहुत पढ़ी लिखी थी. उनकी एक बहिन डॉक्टर तो दूसरी प्राचार्या तो तीसरी एमबीए है .गुप्ता आंटी  के लड़के का तलाक था. जिसमे उनकी बहु  ने पत्नी की हैसियत से पति की सम्पति  पर, या तनख्वाह पर अपने अधिकारों की मांग की थी.  परन्तु  यह गुप्ता आंटी के पूरे परिवार के लिए बड़ी मुश्किल की घडी थी  । गुप्ता आंटी  और उनके पुत्र कभी चाहते ही नहीं थे कि विवाहिता का स्त्रीधन या उसकी साधारण सी वस्तुए भी जैसे  कपडे आदि भी लौटाई जाये। " चमड़ी जाये दमड़ी न जाये."

आस -पड़ोस की महिलाएं आस-पास ही थीं . सरला  भी  वहीँ  थी और सोच  रही थी अब तो  गुप्ता आंटी   को कानून की बात माननी होगी . अतः  उसने गुप्ता आंटी से  मामला पूछा .गुप्ता आंटी  ने दो टूक जबाव दे दिया इतनी पढ़ी लिखी लड़की है वो नौकरी करेगी  और नौकरी करे तो पैसा नहीं देना होगा. ऐसे ही नाम मात्र  के लिए   कोई भी सामान थमा देंगे .सरला  बड़े ही आश्चर्य से गुप्ता आंटी  को देख रही थी  कि  स्वयं   वे  अपने पति के बाद  उनकी  संपती की मालकिन है और बिना नौकरी के सारा जीवन  बिता रही है फिर  उन्होंने  यही  बात अपने लिए क्यों नहीं सोची ?  उनके पति ने उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी जिम्मेदारी और रक्षा का दायित्व पूरा किया. इतनी सुशिक्षित औरत भी  औरत के दर्द को नहीं जानती? इस तरह की मानसिकता रखती हैं ?

गुप्ता आंटी  ने उनके बड़े बेटे के विवाह की  नींव ही  झूठ और छल कपट पर बनायीं थी अतः  इमारत तो ढहना ही थी।  वे अपने बड़े बेटे का विवाह छोटे शहर की   लड़की से कर देती हैं . गुप्ता आंटी  की मानसिकता यह थी कि  यदि  बड़े शहर कि लड़की लायेंगे तो वह  जागरूक  , सुशिक्षित और आधुनिक  परिवेश का अनुसरण  करने  वाली होगी जो हमारे साथ  नहीं रह पायेगी और हमारा सारा भेद खोल देगी. इसके साथ ही  महानगर  के रहन सहन और खान- पान  और  मकान  की सुविधाएँ  चाहेगी और  अगर छोटे शहर की लड़की को बहु के रूप में लायेंगे तो वह हम जैसा रखेंगे रहेगी . हमारी बात सहन करेगी  और दो  रोटी खाके एक कोने में पड़ी रहेगी. अगर ऐसा नहीं करेगी तो उसको कोड़े मार -मार के सुधार लेंगे या नहीं सुधरी उसके पति से  मरवायेंगे  या फिर भी नहीं मानी तो  आग लगा कर  मार डालेंगे और कोई छोटा सा प्राक्रतिक आपदा  का बहाना  बना देंगे कि खाना बनाते नहीं बनता था गाँव की  थी ज्यादा पढ़-लिख गयी थी. उसकी माँ ने उसे कुछ सिखाया नहीं , इसलिए गैस जलाने में मर गयी . हम तो घर में थे ही नहीं. हम सब तो बाहर गाँव  गए थे हमें कुछ पता नहीं है इस हादसे के बारेमें। गुप्ता आंटी के घर में एक नहीं  ऐसे  कई  प्राकृतिक हादसे हो चुके थे. उन्हें  हत्या करने का अनुभव था क्यूंकि यह उनके लिए  पीढी दर पीढी  पालन की जाने वाली परंपरा का मात्र  एक हिस्सा था  . जैसे  पहले की औरतें मर गयी और कह दिया गया की वह तो गुस्से वाली थी  गुस्से में मर गयी  वेसे ही इसको मार कर कह देंगे गुस्से की  तेज़ थी मर गयी .


सरला और अन्य पड़ोसियों को  पता थी की गुप्ता आंटी अपने छोटे बेटे का विवाह करने हेतु ही अपने बड़े बेटे के विवाह का षड़यंत्र रच रही है .क्यूंकि यदि छोटे पुत्र के विवाह बड़े पुत्र के विवाह के पहले कर दिया तो सम्बन्धीजन ये न समझे की बड़ा पुत्र कुकर्मी है  इसलिए इसकी शादी नहीं हो रही। गुप्ता आंटी अच्छाई का मुखोटा पहिने रहती थी.  इसलिए  उस समय गुप्ता आंटी को कोई कुछ कह नहीं सका.


 परन्तु यह सत्य है  "जाको रखे सैयां मार सके न कोई". सौभाग्यवश, लड़की  को भी उसकी सास और ससुराल के षड़यंत्र का और  वास्तविकता का पता चल गया असली क्या है  नकली  क्या है इसकी पहचान हो गयी.  वो समझ  गयी नाटक करना ही इन सबका  शगल है इनके अन्दर  कोई भाव नहीं है.  उसने प्रयत्न   किये की उनके अंतस के भावों को  जगा सके  पर  वो ऐसा  नहीं कर पाई.   लड़की को यह समझ  में आ गया  कि वह उसके पति  के लिए मात्र कामनाश का साधन थी , महज इस्तेमाल  करने वाला शरीर थी जो इस्तेमाल करने के बाद   व्यर्थ  समझ कचरे के डिब्बे में सड़ने के लिए  फेंक दिया जाता है.  इस तरह  उसकी जीवन से  बची- खुची  उम्मीद भी टूट जाती है  उसका विश्वास  उसका निस्स्वार्थ प्रेम हार जाता है.  वो समझ जाती है कि  इस उधडे हुए  रिश्ते पर  दुबारा सिलाई नहीं की जा सकती है.  वैसे ही जैसे  दिल पर लगे जख्मों  की सिलाई  उधड़  जाने पर  पुन जीवन दान प्राप्त  करने चिकत्सकीय  शल्य -क्रिया   लाभदायक नहीं होती है.  अतः  अक्षमनीय आपराधिक प्रवृती का आभास कर वह सुरक्षित  शरण मायके में आश्रय पा  जाती है.

सर्वे से यह भी ज्ञात हुआ की " ऐसे प्रकरण को   बताने में  बहुओं को ससुराल वालों से अपनी जान जाने का डर था।  इसलिए उन्होंने  इन प्रकरणों को जितना दबाया जा सकता था दबाया। परन्तु जब वह और  बढ़ता  ही चला  गया है तब    पुलिस  की सहायता लेनी पड़ी । जब ससुराल द्वारा  पैसे मांगे जाते और   पैसे देने के बावजूद  भी  उन्हें प्रेम और सम्मान नहीं  मिला, न्याय नहीं मिला तो उन्हें कानून का सहारा लेना पड़ा | कानून  ने उनकी  समस्याओं और झगड़ों को हल किया और उन्हें न्याय मिला।"

गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा  है कि - छोटी आयु में पिता को, विवाह के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व सौंपा जाता  है।नारी के प्रति किसी भी प्रकार के असम्मान को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है चाहे नारी शत्रु पक्ष की ही क्यों ना हो तो भी उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा भारत में है।भगवान श्री राम बालि से कहते हैं,"अनुज बधू, भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्‍या सम ए चारी।। इन्‍हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।" (छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पापनहीं है।)

अब वह समय आ गया है जब आज  इक्कीसवीं सदी की नारी को खुद को सोचना है कि वह कैसे स्थापति होना चाहती है पूज्या बनकर या भोग्या बनकर ?जथा  रात के अँधेरे को दूर करने के लिए  दिए की रोशनी करनी ही पड़ती है यथा  मन के अँधेरे को दूर करने के लिए सद्विचारो का अलख जगाना ही पड़ता है , संस्कारों की रौशनी जलानी ही पड़ती है। अन्यथा  अंधेरों में भटककर न तो मंजिल की दिशा ही तय की जा सकती है और न ही मंजिल का ही निर्धारण किया जा सकता  है. 




रविवार, 9 सितंबर 2012

प्रेम




 ,
'द्वन्द' और 'मंथन' से 'अतृप्त' अंतस

 ढूंढता  है बस तेरा ही आश्रय 
 जीवन व्यथित ,  सांसे क्षणिक 
क्या  लाये थे क्या ले जाएंगे.
भटकता है मन फिर भी   जगत में
अपने अन्तर  में समेट लो 
ज्योति से परम -ज्योति कहलाऊं 
अब   क्यूँ नहीं  
छुड़वाते  'झंझावात' जगत के,
और ये संघर्ष समय के ।
जहाँ प्रतिपल परिवर्तन 
पर  शाश्वत हो तुम .
जहाँ  सुंगंध तुम और पुष्प  हूँ मै
जहाँ  प्राण तुम और  शरीर हूँ मै ,
जहाँ   स्वर तुम और  वीणा   हूँ मै .
जहाँ   सूत्र  तुम और  मोती  हूँ मै 
जहाँ प्रकाश  तुम और दीपक हूँ मै 
जहाँ ज्ञान  तुम और ग्रन्थ हूँ मै 

तब ,'अ' हट   जाए  'अहम्' से 
और 'मै' मिल जाये  तुममें
तब  बन जायेगी  'आत्मा'  , 'परमात्मा' 
विलीन हो कर तुम्हारे  अस्तित्व में 
ज्यो  सरिता समां जाय   सागर में 
ज्यो  किरणे समा जाय  सूरज में.
जब मिल जाओ तुम, हे जगवंदन !
 अश्रु गंगा जब  पग धो जाये,
विलीन हो जाये सब  'विकार' तुममे   
तब  न होगा 'अहम' का  बोध
वहां होंगे 'तुम' मुझमे और 'मै'  तुममे  
और  तब कहलायेंगे  'मै 'और 'तुम'  'हम' .
तब वहां 'अ'  हट जायेगा और रह जायेंगे  सिर्फ 'हम' 
 ज्योति  होगी  फिर परम-ज्योति 
जब प्राण तन से निकलेंगे  
और  तुझमे समां जाएंगे 
फिर  न होगी संसार की आस
और  न होगी कोई चाह 

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

संस्कार

 


"सभी सत्य पर चले  ज्ञान के प्रकाश से अपने मन का हर एक कोना प्रकाशित रखे , हे प्रभु हमारे परिवार, समाज और देश को ही नहीं दुनिया को भी अंधकार से दूर ले जाने वाले  ऐसे ज्योतिर्मय पथ पर ले चले. "

          हमारे भारत देश में अध्यात्मिक ज्योति को  अखंड ज्वाला बनाने वाले साधू संत समय -समय पर अपने कृपा पात्रों पर कृपा स्वरुप चमत्कार बरसाते आये हैं। साधू अर्थात सद्गुण संपन्न  सज्जन और दुर्जन अर्थात दुर्गुण संपन्न  दुष्ट।हमारे मन में  अच्छाई और बुराई  का द्वन्द  हमेशा चलता रहता है जैसे साधू और   और शैतान पुरातन काल से  द्वन्द युद्ध करते आये  है। ये दोनों ही अलग-अलग प्रकृति के होते हैं। इन  दोनों में कोई मेल नहीं  हो सकता।  एक कहे जीवन तो दूसरा मृत्यु। एक कहे  काशी  तो दूसरा कसीनो।एक कहे दिन तो दूसरा कहे रात। 
यदि संगोग वश दुर्जन और सज्जन का मेल हो भी जाये तो  दुर्जनों का साथ सज्जनों पर वैसे ही कलंक का कारण  बनता है जैसे 'काजल की कोठरी' में घुसने पर  काजल  की कालिख लगे बिना बाहर आना मुश्किल ही नहीं असंभव होता है।

अच्छे या बुरे संस्कारों से ही  ही सज्जन या दुर्जन व्यक्ति का चरित्र निर्माण  होता  है, संस्कार परिवार से, पीढ़ीयों से हस्तांतरित होते हैं  जिनको परवरिश के समय  परिमार्जित करने का कार्य परिवार का होता है।  दुर्जनों की कुसंगति ही दुर्गुणों की जड़ होती है.  जो कुसंस्कार लाती है। ये  कुसंस्कार परवरिश में  कमी परम्परगत कुरीतियों के चलन  या पालन -पोषण में  लापरवाही  से   उपजते हैं . ये  हिंसा, नशा ,स्वार्थ,रुढ़िवादी विचार को जन्म देते  है और सज्जनों को मूर्ख बनाने का काम करते हैं वैसे ही  जैसे- हिरन्यकश्यप,   और होलिका ने भक्त प्रह्लाद को मूर्ख बनाना चाहा . जैसे रावण  ने सीता को ब्रह्मण का भेष बनाकर मूर्ख बनाना चाहा। जैसे  कंस ने पूतना  को भेजकर कृष्ण को मारना चाहा .परन्तु साधू और शैतान की लड़ाई में शैतान कभी नहीं जीता। ये सभी  खुद ही समूल नष्ट हो गए। 

           जब  कुसंस्कारों  क़े ज्यादा देर तक जड़ जमाये रहने पर उनका परिमार्जन प्रायश्चित्त और पश्चाताप द्वारा   संभव नहीं होता तब उनके समूल विनाश के लिए   दैवीय अवतार या  परम शक्तिमान  का अवतार होता है।

 "जब जब होई धरम की हानि  बाढहि  असुर  अधम अभिमानी।
तब तब धरि  प्रभु विविध शरीरा, हरहु कृपानिधि सज्जन पीरा।।" 

कुसंगति  रुपी  दैत्यों की  संगति के  समान जीवन में कोई नरक   नहीं होता. इसलिए भूल से भी कुसंगति  के शिकंजे  में न आने की शिक्षा और  चेतावनी  अनुभवियों , हमारे बुजुर्गों द्वारा  दी जाती रही है। बुरे और अच्छे मे भेद समझाया जाता है। विशेषतः बालिकाओं  को उनके माता-पिता,अध्यापक सदैव अच्छे बुरे में अन्तर  जानने , जीवन को समझने , परखने और सहने उन्हें  सहनशीलता, सामंजस्यता , मधुरता , साहस , शील, का पाठ हृदयंगम कराते रहे  हैं , चूँकि  कन्या एक देहरी पर रखे एक  ऐसे दीपक के समान होती है जो घर के अंदर और बाहर  दोनों तरफ प्रकाश करती है वह  पति और पिता दोनों कुल को तारने वाली  होती है  . पुत्री रूप में पिता को,माता रूप में पुत्र को, पत्नी रूप में पति को,और बहिन के रूप में भाई को सन्मार्ग  की  ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है  . इसके साथ ही उसे  अपने  नारीय आलोक से सांस्कृतिक, सामाजिक   क्षरण  की कालिमा  को दूर करने , विपरीत परिस्थियों  का सामना करने सत्य , पराक्रम, साहस, और निर्भयता  के शस्त्र  का  उपयोग  करती है  ।वर्तमान  समय ये शस्त्र  किसी नारी  को सीता , सावित्री दुर्गा माँ के समान  शक्तिपुंज  बनाने में समर्थ हैं.               

               यह सर्वमान्य तथ्य है  कि  विरुद्ध प्रकृति में  युद्ध और समान प्रकृति में  आकर्षण होता है । परन्तु  सत्य  हमेशा शक्तिशाली होता है. जिसके पास  सच्चाई की शक्ति  होती है उसे किसी बात का भय नहीं होता।  इसके विपरीत जो झूठ बोलने   वाला , झूठा नकली काम करने वाला  होता  है  वो ही छल बल पूर्वक दूसरों को ठगने  और लूटने के लिए चाटुकारी करता है .मृदु भाषी बनकर सामने से तो बहुत कोमल व्यव्हार करता है  और पीठ पीछे चुरी भोंकने वाला  होता  है। जैसे की बिच्छू का अग्रभाग यानी मुंह  तो बहुत कोमल  विषहीन होताहै  और पूंछ में   जहर  होताहै, ऐसे दुर्जन सज्जनों को दुष्कर्म करने को  प्रेरित कर सज्जनों की  समाज में छवि ख़राब करने उनसे छल पूर्वक  मित्रता  का स्वांग रचने  वाले होते हैं।

          आज  जब अच्छे घर की लडकी  जब अकेले घर से निकल   स्कूल  या कालेज   जाती है तो   कितने ही मनचलों की कुदृष्टि उस पर होती है। ऐसी मुश्किल की  स्थिति में यदि  लड़की घर से बाहर निकलना छोड़ दे तो  उसकी तो पढाई -लिखाई  सब ख़तम हो जाएगी . बिना पढ़ी लिखी  लड़की की शादी  भी बहुत कठिन होती है । अतः  इस स्थिति से निपटने के लिए स्वयं लड़की को बहादुर होना पड़ता  है लड़कियों को पैर की जूती समझने   वालों  के  प्रति  जब तक वह विद्रोह नहीं करती  तब तक इस   समस्या का समाधान  भी प्राप्त नहीं कर सकती  ।   जब      वह अपनी जूती उतार कर ऐसे मनचलों के सर पर  मारती है  तब ही सड़क छाप मजनू  उसकी  गली का रास्ता छोड़ते हैं  । परन्तु कितनी ही लड़कियां इसी  boldness, के अभाव में (बिना काली  का रूप दिखाए ) डर के कारण अपनी पढाई छोड़ बैठती है या अपनी इज्जत   गँवा बैठती है और निर्दोष  होते हुए भी या तो अपनी  इहलीला समाप्त कर बैठती है या  और अपने हाथों अपनी जिंदगी ख़राब कर लेती हैं ।   इस प्रकार के   harassment . से मुक्ति दिलाने  के लिए    स्कूल ,कॉलेज  में  प्राध्यापक गणो  ने विशेष पहल की है , महिला सेल का निर्माण किया  है  और  विशेषज्ञों  के निर्देशन में  लड़कियों को पराक्रम, साहस, और निर्भयता  के शस्त्र उठाने हेतु  जोर शोर से अभिप्रेतित किया जा रहा है।  सुशिक्षा और जागरूकता के अभाव  में  नारी का कल्याण नहीं हो सकता । 

     सम्पूर्ण सृष्टि दो प्रकृति  के व्यक्तियों दुष्ट अर्थात  कुसंस्कृत  और सज्जन अर्थात सुसंस्कृत  से मिलकर बनी है।  दुर्भाग्यवश , कन्या का विवाह  यदि  दुर्जन से हो जाये तो उसकी  समस्त शिक्षा व्यर्थ जाती है। न तो वह अपना स्वभाव छोड़ सकती है और न ही पति की दुर्जनता वश दिखाई कुसंगति की राह ही अपना सकती है। वह   पति  द्वारा दिखाई  गयी कुसंगति  की राह पर चले  तो  उसका  जीवन   क्या जन्म ही नष्ट हो जाये ।  इस स्थिति में  विवाह  पर  असफल विवाह का कलंक  लग जाता है।

       विवाह नामकी  संस्था  परिवार, समाज और देश  के कल्याण  के  लिए   बीज के सामान होती  है जो  पुत्र पुत्रियों के जन्मानुसार वटवृक्ष में परिणित हो जाती है  

      जब तक  पति-पत्नी दोनों ही सज्जन प्रकृति के  नहीं होते तब तक  दोनों में  सामंजस्य   बैठाना    बहुत कठिन होता है . परन्तु यदि दोनों  यदि सज्जन हो तो  जीवन रुपी नैया  पार  बड़े ही आराम से  पार हो जाती है और इस नैया में सवार परिजन भी बिना कठिनाई के किनारे  पर  आ  जाते हैं   कभी कभी   दुर्जन, उनके स्वाभाव से विरुद्ध    कमाऊ लड़की को  विवाह हेतु   षड़यंत्र कर फंसा लेते हैं  और  लक्ष्मी पूजन यानि दीवाली    की   रात को ही (पत्नी) धनलक्ष्मी  के  जीवन को  अमावस की रात बना देते है।  फिर  बाहर लाख्नो  दीप जलाने  पर, या  फटाके फोड़ने पर  मन के भीतर  न ही कभी उजियारा होता है और न ही प्रेम और विश्वास का ही दीप जलाया जा सकता है।  पुरुष का अहंकार और सामाजिक प्रदर्शन  नारी की दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण है। 

     पुरुष का अहंकार ही है जो कहता है "मै बड़ा हूँ"  "मेरी पूजा करो" "मुझे सम्मान दो" मुझसे महान कोई नहीं ।क्या  यह  अहम् नहीं  है? हिरन्यकश्यप, रावण, कंस इनमे  इश्वर तुल्य शक्तियां थी तथा . ये महान  ज्ञानी प्रकांड पंडित और  विद्वान थे परन्तु उनका विनाश सिर्फ  इसलिए हुआ क्योंकि उनमे अहंकार था ।हिरन्यकश्यप  का अहंकार तोड़ने  नरसिंह अवतार हुआ , रावण का  गर्व चूर-चूर करने राम का और  कंस का अहंकार मिटाने श्री कृष्ण ने जन्म लियासामान्यतः पुरुषों के ही दंभ को चूर करने  अवतारी पुरुष पृथ्वी पर जन्म लेते हैं . 


     मैंने ये कभी नहीं सुना की किसी स्त्री को मारने किसी अवतारी पुरुष का जन्म हुआ है।पुरुष अपने परिवार  अपनी पत्नी, बच्चों  से  भारी-भरकम अपेक्षाएं रखता है परन्तु उसकी उनसे  अपेक्षाए पूरी होने पर भी प्यार का इजहार करने में वो अपने को छोटा समझता है यह उसका   अहंकार नहीं तो और क्या  है?  पुरुष के इस अहंकार  भरी कुसंगति  का दुष्परिणाम स्त्री  को भोगना पड़ता है . यह एक ऐसा सत्य है जिसे झुटलाया नहीं जा सकता | परन्तु  फिर भी  स्त्री चाहे तो  क्या नहीं कर सकती। वह अपने पे आ जाये तो फिर भगवान् को भी नहीं छोडती फिर  मनुष्य तो मनुष्य ही है। ऐसी ही घटना साधू संतों के साथ उनके जीवन शैली से प्रभावित एक लड़की की  है. 

      एक धार्मिक परिवार  की बात है।लड़की वैष्णवों के घर की और शुद्ध आचरणों वाली थी,पर पति का खाना-पीना  खराब था।  यह सुनकर साधू शरणानन्दजी महाराज आश्चर्य में आ गये कि  इतनी अच्छी लड़की  के साथ ऐसा  कैसे हो गया? यह किस पाप की सजा मिली है उसे ? वह लड़की आज्ञा पालन करती,मांस -मदिरा  देती।खुद  भोजन करती तो स्नान करके दूसरे वस्त्र पहनती और अपनी रोटी अलग बनाकर खाया करती। ऐसा  करते उसे बहुत तकलीफ होती। ऐसा गन्दा काम  कर देना और अपनी पवित्रता भी पूरी रखना!      एक बार उसका पति बीमार हो गया । उसने (लड़की   ने )खूब तत्परता से रातों जगकर पति की सेवा की । पति ठीक हो गया तो उसने कहा कि तुम  कोई एक बात माँग लो । उसने कहा कि आप सिगरेट छोड़ दो ।    इतनी  सेवा और इतनी कम मांग .इस बात का पति पर इतना असर पड़ा कि उसने मांस-मदिरा सब छोड़ दिया  क्योंकि इतनी सेवा करके भी अन्त में उसने एक छोटी सी बात सिगरेट छोड़ने की माँगी। परन्तु  उस लड़की ने   सत्संग-भजन का त्याग नहीं किया ;क्योंकि वह जानती थी कि इस बात को मानने से उसको   नरक  होता। 

 उसने अपने परिवार,  पति,माता-पिता आदि को पाप से बचाने के लिय सत्संग किया,   जिससे  जीवन शुद्ध,निर्मल और मर्यादित हो,और  किसी बात का कोई अनावश्यक  भय नहीं हो.  जब भी सत्संगति ,भजन ध्यान का अवसर मिला उसने व्यर्थ  नहीं गँवाया ।वस्तुतः  अध्यात्मिक शक्तियां नव  जीवनदायिनी ,सुखदायिनी और परम धाम की राह दिखने वाली होती हैं जो अपने सज्जन भक्तों की  रक्षा करने उन्हें  सुख देने लिए कई  नए रूप  रख कर  अपना  निश्छल प्यार उड़ेलती  रहती हैं. जिसके फलस्वरूप जीवन में चमत्कार के कई रूप देखने मिलते हैं। 

अपवाद स्वरुप कभी -कभी दुर्जन भी सज्जन प्रभाव से वशीभूत हो जाते हैं और अपना जीवन इश्वर तुल्य बना लेते हैं .  भगवान् वाल्मीकि इसका साक्षात्  उदाहरण  हैं।







सोमवार, 3 सितंबर 2012

परिवर्तन का मतलब

      

      
          अपने संस्कारों  वेद, पुरान आदि  धर्म  गर्न्थों के कारण  भारत  विश्व में " विश्वगुरु"  कहलाता है. हिन्दू धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है आज उसी हिन्दू धर्म   के मूल्य ,संस्कार को  पाश्चात्य सभ्यता के दानव ने अपने पाश में जकड लिया  है . इन मूल्यों ,संस्कारों को  पश्चिमीसभ्यता रुपी  राक्षस से मुक्त  कराने  के लिए क्या  परिवर्तन लाने होंगे, यह आज  की पीढ़ी को  बताना  अति आवश्यक है.
 परिवर्तन का मतलब सिर्फ नई चीजों का आना नहीं है  परिवर्तन का मतलब पुराने संस्कारों  का   पुनर्स्थापन  होना है.   भारतीय मूल्यों को पुराना समझ  छोड़ ने पर  बार-बार उन्ही मूल्यों  की  वजह से जीवन  में हार होती रहती है   परन्तु यह हार पाश्चात्य  जीवन शैली बिताने वालों को जीत प्रतीत होती है क्यूंकि उनके लिए  मांस, मदिरा, धन  और स्त्री गमन के अलावा जीवन की कोई परिभाषा ही नहीं होती है।  मेरा विषय
सामाजिक कुरीतियों और समस्याओं को प्रकाशित  कर उनको जड़ से हटाने की एक छोटी सी कोशिश मात्र है। वैसे ही जैसे  रविन्द्र नाथ टैगोर ने  डूबते हुए सूरज को देख कर कुछ बहुत सुंदर पंक्तिया लिखी थी। जो  यहाँ प्रस्तुत है-
" सांध्य रवि  ने कहा - मेरा काम  लेगा कौन? सुनकर सारा जगत रह   गया मौन , एक छोटे से माटी  के दीपक ने कहा- जितना हो सकेगा मै करूँगा नाथ।"  

  कुछ वर्ष पहलेकी बात है। एक सनातनधर्मी सदाचारी पुराने विचारोंके घरकी लड़कीका विवाह भाग्यवश एक कालेजसे निकले मनचले अविवेकी लड़केसे हो गया।लड़की सुन्दर थी, पढ़ी-लिखी भी थी,घरका सारा कामकाजमें निपुण थी।सास-जेठानी-सबकी आज्ञा मानती, घरमें सबके साथ आदरसम्मानका बर्ताव करतीतथा सबको प्रसन्न रखती थी। प्राणपणसे स्वामीके संकेतके अनुसार चलना चाहती और चलती भी थी।

 परंतु उसमें (पति के भावनानुसार) पाँच दोष थे- वह प्रतिदिन भगवान्‌ के चित्रकी पूजा करती, मांस-अण्डे नहीं खाती,पर पुरुषोंका स्पर्श नहीं करती,बुरी-गन्दी पुस्तकें नहीं पढ़ती और सिनेमा नहीं जाती। ये पाँचों बातें वह अपने नैहरसे सीखकर आयी थी और उसके स्वभावगत हो गयी थीं। पति भी उसको वैसा ही मानता, पर यही पाँच बातें ऐसी थीं जो पतिको बड़ी अप्रिय थीं वह बार-बार इनके लिए पत्नीको समझाता। वह पहले-पहल तो इन बातोंके दोष बतलाती, समझाना चाहती, पर इससे पतिदेवके क्रोधका पारा बहुत चढ़ जाता। वह समय-समय पर निर्दोष बालिकाको मार भी बैठता। गाली-गलौज बकना-उसके माँ-बापको बुरा-भला कहना, डाँडना-डपटना तो प्राय: रोज ही चलता था। इसलिये उसने समझाना तथा दोष बतलाना तो छोड़ दिया।

 वह जान गयी कि ये इन बातों को अभी नहीं माननेवाले हैं। अत: वह विरोध न करके बड़ी नम्रतासे इन्हें माननेमें अपने असमर्थता प्रकट करने लगी। बहुत कहा-सुनी होनेपर उसने पतिके साथ सिनेमा जाना तो स्वीकार कर लिया; परंतु शेष चार बातें नहीं मानीं। इसपर उसके पतिदेव बहुत ही नाराज हो गये; वह ऐसी पिछ्ड़ी हुई स्त्रीसे अपना विवाह होनेमें बड़ा अभाग्य मानने लगा तथा उसके साथ बड़ा र्व्यवहार करने लगा। कई वर्ष यों बीते। उसका द्वेश बढ़ता गया और उसमें घोर पापमूलक हिंसावृति पैदा हो गयी। 

एक दिन दोपहरको किसी ट्रेनसे कहीं जानेकी प्रोग्राम बना। पहले दर्जेकी दो टिकटें खरीदी गयीं। पत्नीको लेकर बाबूसाहब ट्रेनमें सवार हुए। उन दिनों भीड़ कम होती थी। पहले दर्जेके एक खाली डिब्बेमें पत्नीको लेकर वह बैठ गया। कुछ दूर जानेपर जब गाड़ी वेगसे जा रही थी-उसने डिब्बेका फाटक खोला और किनारेकी सीटपर बैठी हुए पत्नी को धक्का देकर बाहर गिरा दिया।

 बेचारी अकस्मात्‌ धक्का खाकर नीचे गीर पड़ी। भाग्यसे बगलके एक सज्जन बाहर की ओर सिर निकाले थे। उन्हेंने एक तरुणी स्त्री को गिरते देखकर जंजीर खिंची; जंजीर में कुछ जंग लगा था, इससे पूरा खींचनेमें कुछ देर लग गयी। इतनेमें गाड़ी दो-तीन मील आगे बढ़ गयी। गाड़ी रुकी। उस बाबूने सोचा था, मर गयी होगी। कह दिया जायगा-‘खिड़की अकस्मात्‌ खुल गयी, वह खिड़कीके सहारे किसी कामसे खड़ी थी,अचानक गिर पड़ी।’ पर गाड़ी रुकते ही अपने पापसे उसका हृदय काँप गया। आस-पासके लोग इकट्ठे हो गये। गार्ड आया। उसने रोनी सूरत बनाकर सोची हुई बात गार्डसे कह दी। गाड़ी उलटी चलायीगयी। वहाँ पहुँचनेपर देखा गया-वह मरी तो नहीं है, पर चॊट बहुत जोरसे लगी है।

     उसको जीती देखकर इसका बुरा हाल हो गया। सोचा, अब यह असली बात कह ही देगी और इससे लेनेके देने पड़ जायँगे। उसका पूरा शरीर काँपने लगा; आँखोंसे अश्रुओंकी धारा बह निकली। लोगोंने समझा, पत्नीके बुरी तरह घायल हो जानेके कारण यह रो रहा है। लोग उसे समझाने लगे। 

      लड़कीको मरणासन्न देखकर मैजिसट्रेटको उसके आखिरी बयानके लिये बुला लिया। उसका पति तो अपने भविष्यकी दुर्दशाको सोचता हुआ अलग बैठा रो रहा था; समीप आनेकी भी उसकी हिम्मत नहीं थी। मैजिस्ट्रेट्ने आकर लड़कीका बयान लिया।उसने कहा-‘ साहेब! मुझे मिर्गीका पुराना रोग था, मैं लघुशंकाको गयी थी। लौटकर कुल्ला करने जा रही थी, इतनेमें मिर्गीका दौरा आ गया। फाटक खुला था, मैं बेहोशीमें नीचे गिर पड़ी और मुझे चोट लग गयी।’ 

मैजिस्ट्रेटने घुमा-फिराकर पूछा-‘तुम्हारे पतिने तो धक्का नहीं दिया न?’ वह रोते-रोते बोली-‘राम-राम! वे बेचारे धक्का क्यों देते, वे तो इस समय बहुत दु:खी होंगे। उन्हें बुलाइये मैं उनके आखिरी दर्शन करके चरणोंमें प्रणाम कर लूँ।’

इस बीच वह समीप आ गया था। वह यह सब सुनकर दंग रह गया और उसके हृदयमें एक महान्‌ वेदना पैदा हो गयी। डरके बदले पश्चातापकी आग जल उठी।‘हाय! कहाँ मैं घोर नीच, कहाँ यह परम साध्वी, जो इस मरणासन्न अवस्थामें भी सावधानीके साथ मुझ नीचको बचा रही है।’ वह चीख उठा। लोगोंने खींचकर समीप कर दिया। लड़कीने उसको देखा, चरण छुए और वह सदाके लिए चल बसी ! उस युवकके जीवनमें महान्‌ परिवर्तन हो गया। वह इन सारे दुर्गुणोंको छोड़कर साधुस्वभाव हो गया। उसने इस पापका प्रायश्चित करनेके लिए पुन: विवाह न करके ब्रह्मचारी-जीवन बितानेका निश्चय किया। उसीने यह सब बातें लोगोंको बतायीं। छ: महीने बाद ही वह लापता हो गया।शायद इसीलिए बेटी के जन्म के समय से ही  विवाह के लिए बेटी के माता पिता उसके जीवन और भविष्य को लेकर परेशान एवं चिंताग्रस्त रहते हैं. उनकी  चिंता  बेटी के दुसरे घर जाकर रहने से सम्बंधित होती है .


 हर बेटी  को अपने जन्म-दाता माता-पिता को छोड़ कर अपने पति के माता -पिता के पास रहना होता है. इसलिए भारतीय मूल्यों में पली-पोसी  बेटी के माता-पिता को चिंता रहती है कि यदि उनकी लाडली को  अनुकूल  सास ,अनुकूल पति और  ससुराल नहीं मिला तो उनकी लड़की प्रतिकूल पाश्चात्य जीवन में कैसे अपने मूल्यों की रक्षा कर सकेगी?  जब माता-पिता को  यह पता चलता है कि   बेटी  के  ससुराल वालों ने  छल -कपट और  झूठ के बल पर  सामाजिक प्रदर्शन हेतु  विवाह  किया है तो  वो खुद भी  अपनी बेटी से ज्यादा सदमा ग्रस्त हो जाते हैं . कुछ मामलों में  लड़की के माता पिता  पाश्चात्य जीवन शैली के अनुयायियों के विरुद्ध जेहाद छेड़  बेटी के ससुराल वालों की  ईंट  से ईंट बजा देते हैं और कुछ  मामलों में  लड़की से हाथ  धो बैठते हैं. 

हमारे आस-पास  ऐसी  अनगिनत घटनाएँ अभी भी जारी  हैं जिसमे पति को ये लगता है कि उसने   पत्नी को पराजित  कर दिया?  परन्तु अपने पति को सही मार्ग  पर चलाना  सिखाने के लिए  भारतीय पत्नी मूल्यों की  पुनर्स्थापना   के  लिए पत्नियाँ  हारती है या जीतती है यह इस कथा से स्पष्ट है।  

यह  कहानी  "कल्याण" के अंक से ली हुई सच्ची घटना  पर आधारित है.