मंगलवार, 23 नवंबर 2021

 भारतवर्ष में योग की महिमा सदा से ही चली आती है हमारे पूर्वजों के ज्ञाता ऋषि मुनि योगियों ने इस विषय पर कई ग्रंथ लिखें है जो हम लोगों के व्यवहार में आते हैं दुख का विषय जटिल होने से भिन्न भिन्न आचार्यों द्वारा विभिन्न प्रकार से लिखा गया है इसलिए उन ग्रंथों से किसी अनुभवी योगी की सहायता के बिना योग को समझना सीखना और करना सर्वसाधारण के लिए सहज साध्य नहीं है तथापि योग के विषय में लोगों की महान उच्च धारणा है कि यूं ही सर्वोपरि विज्ञान और परम कल्याण का प्रशस्ति पत्र है वास्तविक ही योग का विज्ञान सर्वोपरि होने पर भी उसका यथा तथ्य निहित गूढ़ रहस्य लोग नहीं जान पाते की योग कैसे करना चाहिए योग का फल क्या है और कैसे मिलता है इस समस्या को सुलझाने के लिए महायोग के प्रवर्तक परम करुणामई पूज्यपाद श्रीमद् गुरुदेव श्री नारायण देव तीर्थ जी की इच्छा थी कि महायोग के वास्तविक विज्ञान को ग्रंथ रूप से प्रकाशित किया जाए ताकि योग के जिज्ञासु लोग समझ सके कि योग कैसा और क्या है?

अतः उनकी आज्ञा अनुसार ही कृपा से इस ग्रंथ की रचना हुई है इस महायोग के विज्ञान के विषय को लिखने के पूर्व इसके साधन करने वाले साधकों को इस विषय में जो आवश्यक उपदेश दिया जाता था साधकों के आग्रह से उसे अन्य साधकों के लाभार्थी प्रचलित प्रणाली के अनुसार ग्रंथ रूप में प्रकाशित करने का विचार हुआ परंतु इस महायोग के विज्ञान के समग्र विषय क्रमवार किसी एक ही ग्रंथ में ना होने के कारण यह कार्य सहज सहज साध्य नहीं था क्योंकि जितने भी आर्ष ग्रंथ हैं उन सभी में महायोग का nihit तत्व गुप्त विषय सांकेतिक रूप में मिलता है उसको साधारण लोग तो समझ ही नहीं सकते संस्कृत की अच्छी योग्यता वाला अनुभव रहित विद्वान पुरुषों के लिए भी समझना और समझाना सहज नहीं है तथापि गुरुदेव की आज्ञा और साधकों की इच्छा के वश में होकर यथामती योग के विषयों को वेद उपनिषद दर्शन तथा तंत्र पुराण आदि ग्रंथों से संग्रह कर इस ग्रंथ में क्रमबद्ध किया गया है ताकि हर एक जिज्ञासु महायोग के रहस्यमई विज्ञान को सरलता से समझ सकेl
 साधारणतया इस ग्रंथ में जितने भी प्रमाण दिए गए हैं रिशब वेद उपनिषद दर्शन तंत्र इतिहास पुराण आदि आर्ष ग्रंथों के ही हैं उनमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है परंतु पूर्वा पर की विषय संगति मिलाने के लिए लोगों को जो का त्यों कहीं कहीं आगे पीछे जोड़ दिया गया है सब लोग उपरोक्त शास्त्र ग्रंथों से वितरित किए गए हैं जिनका नाम सहित उल्लेख इस लोगों के प्रारंभ में ही कर दिया गया है इस ग्रंथ में श्लोकों के शब्दार्थ की अपेक्षा विशेष करके भावार्थ को ही ग्रहण करने की चेष्टा की है संभव है कि संस्कृत जाने वाले पाठक इसे पसंद ना करें तथा फीसद उद्देश्य से प्रेरित होकर वास्तविकता को समझने और समझाने का प्रयत्न किया गया है अतएव विज्ञ पाठक गण इससे थोड़ा बहुत लाभ उठा सकेंगे