रविवार, 28 अप्रैल 2013

एक अनजान अजनबी

राजू और मुंबई






अनाथ,शिक्षित, ईमानदार,भोला राजू मन में कुछ बनने के सपने संजोये हुए इलाहबाद से मुंबई  रवाना  होता है. मुंबई में उसके पास ना रहने के लिए छत है ना खाने के लिए रोटी है. ना ही  उसका कोई अपना है. अपने जापानी जूते, इंग्लिश पेंट, रूसी टोपी को पहिनकर वह रास्ते में पैदल ही चल देता है. है.वह रास्ते का लम्बा सफ़र तय करने के लिए सेठ सोनाचंद से लिफ्ट मांगता है परन्तु सोनाचंद उसे ४२० कहकर कार से उतार देते है.जो मुश्किलों से टकरा कर जीवन के सफ़र में आगे बढ़ता जाता है  ईश्वर भी उसकी मदद करता है. 


मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी गाता हुआ राजू आगे बढ़ता जाता है.उसे सफ़र में कुछ   हाथी सवार, ऊँट सवार मिलते हैं जो उसे लिफ्ट देते है जैसे-तैसे राजू  मुबई पहुँच जाता है. अनजाने अजनबी महानगर में राजू के लिए  रोटी कपडा और मकान की बहुत बड़ी समस्या है परन्तु वह तनिक भी चिन्त्तित नहीं है.घुमते घुमते राजू  गरीबों कि बस्ती में पहुँच जाता है.मुंबई आते ही राजू  फुटपाथ पर सबसे पहले  एक भिखारी से मिलता है जो उसे ईमानदारी और परिश्रम  छोड़ बेइमानी से  धन कमाने की राह पर चलने कि शिक्षा देता है और अपना ईमान बेचने को कहता है.  .

फिर वह गंगामाई नाम की  फल बेचने वाली महिला से मिलता है गंगामाई सहृदय महिला है.बस्ती में रहने  वाले गंगामाई को  माँ समान मानते  हैं  चूँकि राजू के पास पैसे नहीं थे और वह सीधा, सच्चा था इसीलिये गंगामाई  उसे मुफ्त में दो केले दे देती हैं राजू एक केला  भूखे लड़के को दे देता है और दूसरा खुद खा लेता है.गंगा माई की मदद से राजू  को मुंबई में फुटपाथ पर रहने की सुविधा मिल जाती है.बस्ती वालों कि गुजारिश पर राजू दिल का हाल सुने दिलवाला सीधी सी बात ना मिर्च मसाला गाना गाकर सबको अपना बना लेता है. राजू ईमानदारी  की रक्षा के लिए प्राप्त हुआ मेडल गिरवी रख ने जाता है.जहाँ राजू की  मुलाकात गरीब विद्या से होती है, विद्या अपने पिताजी   के साथ मुंबई की एक छोटी सी चाल  में रहती है.विद्या ईमानदार, स्वाभिमानी, परिश्रमी और सुसभ्य, सुंदर शिक्षिका है. एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थियों का ही नहीं वरन देश के  भविष्य का भी निर्माता होता है. विद्या पीपल के पेड़ की छाँव में नन्हे मुन्हे धर्मात्माओं का निर्माण करने का स्नेहमयी ममतामयी, प्रयत्न करती है.

यह बस्ती सेठ सोनाचंद की बड़ी हवेली की छाँव तले है. जैसे बड़े पेड़ के नीचे छोटे पौधे नहीं पनप सकते वैसे ही सेठ सोनाचंद गरीबों को और गरीब बनाने के प्रयास में लगे रहते.यद्यपि  उनके भाषण में देशप्रेमी नेता होने की गर्मी है. विद्या को प्रभावित करने के लिए राजू एक लांड्री में काम  करता है. इस लांड्री में अमीरों के कीमती  कपडे धुलने और स्त्री करने के लिए आते है. लांड्री में काम करते हुए राजू की मुलाकात माया से होती है जो राजू की ताश के खेल में हाथ की सफाई से बहुत प्रभावित होती है. और अपने अभिजात्य वर्ग में उसे ताश खेलने हेतु आमंत्रित करती है. माया  राजू का परिचय किसी रियासत के राजकुमार   के रूप में करवाती है। राजू माया के लिए खेलता है और हर बार अपने हाथ की सफाई से बहुत बड़ी धन राशी जीत जाता है. इस  कम्युनिटी   में सेठ सोनाचंद भी शामिल हैं जो की राजू को पहचान लेते है। राजू  अपनी बुद्धि और कार्य कौशल के बलबूते पर   पुनः सेठ सोनाचंद से टकराने की हिम्मत करता है और भीड़ के बहुत बड़े हिस्से को अपने पक्ष में कर लेता है.
  
राजू की प्रतिभा से प्रभावित  होकर  सेठ  सोनाचंद राजू को अपने खास  काम के लिए 'मुख्य' नियुक्त कर देता है. अपने षड़यंत्र में  गरीबों को फंसा कर सेठ सोनाचंद  बहुत ही मामूली कीमत में किश्तों में मकान बनवाने  की घोषणा करता है। वह राजू के माथे सारा दोष  मढ़ कर  खुद विदेश भाग जाना चाहता है  राजू को उसके इरादे की भनक हो जाती है । सेठ सोनाचंद  गरीबों का धन लेकर विदेश जाने के लिए  अपने साथियों से बात करता है और राजू को इस कार्य हेतु विघ्न बनता देख उस पर जान का हमला कर देता है. गंगामाई  राजू को बचाने में अपने प्राणों की आहूति दे देती है राजू  बच जाता है ।  पुलिस  मौके पर पहुँच कर बड़े चोरों  श्री ४२० सम्माननीय सेठ सोनाचंद और उसकी मंडली को गिरिफ़्तार कर लेती है.  राजू को सही राह पर आते देख विद्या राजू को माफ़ कर देती है  अंततः,राजू विद्या  के साथ घर बसाने में सफल हो जाता  है  और अपनी बस्ती के बेघरबार  भाई बहिनों का भी मकान  बनवा देता  हैं .

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्म श्रंखला में श्री- ४२० (1955) राज कपूर, नादिरा और नर्गिस  द्वारा अभिनीत  फिल्म अपना एक अलग ही विशिष्ट स्थान रखती है.  अपने सम कालीन अभिनेताओं में राज कपूर की फिल्मों का एक अलग ही स्थान रहा है. भारत ही नहीं रूस भी राज कपूर की फिल्मों का अप्रतिम  दीवाना रहा है.  इसका मुख्य कारण राजकपूर का भोलाभालापन ,चार्लीचेपलिन वाला रूप , मुख मुद्रा और सार्थक कथा और संगीत की उपस्थिति है.  "श्री ४२०"  फिल्मजगत में मील का पत्थर साबित हुई है. इसमें   पूर्व-पश्चिम अमीर-गरीब  शिक्षित-अशिक्षित    वर्गों   की वास्तविक वस्तुस्थिति  का  अभूतपूर्व वर्णन किया गया है.