Wednesday, May 16, 2018

जाऊं कहां तजि चरण तुम्हारे : जगदम्बा


Kundalini Yoga


मनुष्य के जीवन में माँ का विशेष महत्व होता है। माँ हमारी  प्रथम गुरु होती है। हरसच्चा व्यक्ति माता -पिता गुरुके प्रति आस्था, विश्वास और सम्मान रखता है और छोटे बड़े फैसले लेने से पूर्व अपने  माता -पिता गुरु की राय जानना चाहता है।

माँ हमें  बोलना, चलना, लिखना पढ़ना सिखाती है।  हिन्दू धर्म में माता -पिता गुरु का विशेष महत्व रहा है। हमें  जीवन पर्यन्त माँ का सम्मान करना चाहिए। माँ के आशीर्वाद के बैगर मनुष्य अधूरे है। माँ को प्रणाम किये बिना हम कोई शुभ कार्य शुरू नहीं करते है। उनके द्वारा दी गयी शिक्षा मनुष्य को जीवन भर काम आती है। उनके आशीर्वाद से कीमती चीज़, और कुछ हो ही नहीं सकती है। माँ के प्रति हमेशा  मन में श्रद्धा होनी चाहिए, तभी  अपने कार्य को भली भाँती कर  सकते है।

माँ  संतान के आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करती  है सद्बुद्धि सदचिंतन जैसे संस्कारों को परिवर्धित  करती है  अनुशासित करती है  अपने गुरुजनों के प्रति कितना आदर एवं सम्मान करना सिखाती है , प्रकृति जब भी जीवन का सृजन करती है तो साथ ही साथ संस्कारों का भी सृजन करती है और संस्कारों की सूची में आदर्श व्यक्तित्व  प्रथम स्थान पर आता  है.


उन्होंने हमेशा मुझे अपना आशीर्वाद दिया उनके अंतिम शब्द थे अब तुम खुश रहना ।  तुम्हारी पीएचडी हो गई ।मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। मैं  बहुत दुखी हो गई  , ...' ' मां तुम कहां जा रही हो  ऐसा मत कहो तुम हो तो मै खुश हूं।"


मां की सौम्यता और दयालुता के लिए आत्मीय स्वजन उनकी सदा सराहना करते आए हैं। मां जगदम्बा के अवतार के रूप में  घर परिवार को संवारती हैं। उनके  योगदान से ही घर एक मंदिर बन जाता है और लोगों द्वारा  ईश्वर की पूजा की जाती है। 

परिवार में होने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए धैर्य और क्षमता के लिए उन्हें गुरुदेव और अन्य पूज्य लोगों द्वारा सराहना मिली। उन्होंने पत्नि के रूप में अपने पति की  देवी सीता के समान सेवा की। 

मां के अस्तित्व का पहला प्रमाण उनकी संतान हैं उनकी बनायी हुई यह गृहस्थी संसार अर्थात् परिवार है। मै अपनी मां की परछाई मैं अपने में और भाईयों में देखती हूं। मां भले ही भौतिक स्वरूप में हमारे साथ न हों पर हर समय उनका आर्शीवाद हमारे साथ रहता ही है ।यह अनुभूति परक सत्य है।माता पिता  ही हमारे प्रथम गुरु हैं। 

मां के स्वभाव व आचार विचार में ध्यान से उत्पन्न प्रेम और शांति, गुरु  आशीष की अनुभूति होती।  उनका चेहरा हमेशा फूल के समान खिला रहता । पारिवारिक सदस्यों  में भी एक आध्यात्मिक आश्वस्ति की अनुभूति होती। हो भी क्यों नहीं, योग साधना ध्यान तपस्या का संगम जो था नरसिंहपुर स्थित निवास स्थल । ध्यान की शांति में ईश्वर  गुरुदेव की  उपस्थित आशीर्वाद का आभास होता।
जिस साधना को पाने के लिए योगी अपने जीवनके अमूल्य समय को नष्ट करते हैं, उसे सहज ही सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं होने देते गुरुदेव ने हमें वही  साधना प्रदान की। योगी या महात्मा  ईश्वर की शास्वत् सत्ता में निवास करता है।

यह वह स्थल है, जहां हमारे गुरुदेव ने हमारे साथ चातुर्मास किया। इसी घर में हमारे माता पिता की दीक्षा हुई आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु ध्यान करने साधक गण आए  ।   यह स्थान  दोनों जन्मभूमि व  कर्मभूमि भी बनी। गुरुदेव के दर्शन करने  दूर-दराज से उनके भक्त आते।  सभी भक्त अनुशासित और ध्यान में मग्न रहते।

 मां अहंकार, राग-द्वेष, स्वार्थपरता, मिथ्याभिमान, अहंभाव, काम, लोभ तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त रहीं। इसलिए कई साधक उन्हें परमहंस योगी तक की उपाधि देते।

 मां की आवाज बहुत ही मधुर थी वे जब गाती ऐसा लगता है कि कोई सिद्ध गायिका गा रही हो। वे सभी रागों के गीत गा लेती थी और बहुत ही प्रवीणता के साथ। उनकी आवाज में चुंबकीय आकर्षण था। वे नृत्य कला मैं भी पारंगत थी। पारिवारिक सदस्य  बुआ जी पापा जी और दादी सब उन्हें लता मंगेशकर कीउपाधि देकर उनके गायन संगीत का सम्मान करते परंतु शास्त्रीय संगीत को उन्होंने अपना व्यवसाय या प्रोफेशन नहीं बनाया। रामचरितमानस जब भी गाती तब हम उन्हें बहुत ध्यान से सुनते और आनंद लेते।

मां पाक कला में भी प्रवीण थीं चूंकि वे जीव विज्ञान  संकाय की विद्यार्थी रही थी अतः  किस सब्जीमे कौन सा विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्स मिलते हैं यह उनको पता होता. जिन के लिए खाना बनाया जा रहा है उनको रोज कैसा खाना जरूरी है  डाइबिटीज थायरॉयड ब्लड प्रेशर वालों को कैसा  भोजन लेना चाहिए  ये सब भी उन्हें पता होता।  मां केवल  चुनिंदा  रोटी सब्जी दाल चावल अचार पापड़ सलाद को ही  रोज का भोजन न बना कर अलग अलग रेसिपीज को भी बनातीं कभी  कुछ अच्छा पत्रिकाओं में पढ कर कभी बाहर  खाकर उन सभी रैसिपीज को भी ट्राई करती। मां का प्यार मा  के हाथ का भोजन प्रशाद बहुत स्वादिष्ट प्रेम पूर्वक बनाई गई स्वास्थ्य वर्धक रसोई होती। कहते हैं ना जैसा खाए अन्न वैसा बने मन।

बचपन में हम तीनों  बच्चों के लिए हमेशा नई  नई अच्छी अच्छी चीजें बनाकर खिलातीं। अच्छा खाना पकाने की वजह से उनकी हर तरफ तारीफ होती । रिश्तेदार मां के हाथ का साधारण सा भोजन कर  के भी उनकी तारीफ करते और उनके खाना बनाने के हुनर की वजह से इज्जत भी करते। हम तीनों बच्चों को भी किचन में काम करना पसंद था कुकिंग में रुचि थी तो मां हमें इसके लिए प्रोत्साहित करतीं थीं  वे कहतीं  खाना बनाना एक ऐसा कौशल है जो जीवन में बहुत आवश्यक है। 

 घर की  व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भी वे  बहुत ही कुशलता के साथ निभातीं। यह बहुत ही आश्चर्य करने वाली बात है और सुखद भी  कि उनके सभी कपड़ेे आलमारी में बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से रखे रहते। किचन की अलमारी में कौन से खंड में किस नंबर पर धने का  हल्दी का स्टील का डिब्बा रखा है उन्हें आखिरी समय तक याद था। किचन के सभी डिब्बे साफ  करीने से रखना उनके व्यक्तित्व  का  एक और प्रमुख  गुण था ।

मां पढ़ी लिखी सुशिक्षित हाउस वाइफ थीं। उन्हें सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में टीचर शिप के लिए भी आमंत्रित किया गया था परंतु उनके लिए घर और परिवार ही सर्वोपरि था।  उनका पूरा ध्यान  उनके जीवन की धुरी सिर्फ उनका घर परिवार था।  जिससे वे समय पर आसानी से काम कर लेती थीं. वे अपने घर के कामों को बखूबी संभाले हुए थीं।. पिताजी को घर की शॉपिंग की लिस्ट बनाकर देना, खाना बनाना,  सभी बच्चों को पढ़ाना या घर की सफाई सभी चीज समय पर और परफेक्ट , तभी तो ससुराल में उन्हें कहते कि वे घर गृहस्थी चलाने में पीएचडी हैं।

 उन्होंने हमेशा बहुत ही समझदारी शांति और मौन- कम बोलना ज्यादा समझना से काम लिया हर   झगड़ालू इंसान से वाद-विवाद  कर अपना मूड ख़राब करने से हमें बचाती  और इससे बचने के  खुद भी हर संभव प्रयास करतीं क्योंकि किसी भी तरह का विवाद हमारे  लिए मददगार  सिद्ध नहीं होता।
वे कहतीं  जिस तरह  खाने को लज़ीज़ बनाने के लिए खट्टा मीठा, तीखा, कड़वा सभी स्वाद आवश्यक  है, उसी तरह जीवन में सभी रंग होते हैं थोड़ा-सा दुःख भी जीवन में ज़रूरी है और तभी सुख की असली क़ीमत पता लगती है. 

कभी कभी जब हम ग़ैर-यथार्थवादी बातें करते  और अपने जीवन को अपने ही हाथों गलत दिशा में ले जाते हैं मां हमेशा हमें सही राह पे ले जाने की कोशिश करतीं‌ परंतु शायद मां हमारे प्रारब्ध से संघर्ष नहीं कर पातीं।  जरा सा भी दुख बच्चों को ना हो मां हमेशा ईश्वर से यही दुआ करतीं। जब हमारे दोस्तों से हमारा झगड़ा होता यह झगड़ा कई बार  मूड ख़राब कर देता और हम अपना आपा खो देते  इससे और आग  भड़कती तब  मां कहती अगर तुम सहयोग नहीं करोगे , तो कोई तुमसे नहीं झगड़ सकता है. वे प्रेमी स्वभाव की बहुत ही सौम्य और कोमल ह्रदय के व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। उनका कहना था सबसे अच्छा रिश्ता बनाए रखने की कोशिश करो  प्रेम से बात करो। 

कभी कभी ग़लतफ़हमी के चलते हमारे और हमारे प्रिय जनों के बीच थोड़ी दरार पड़ जाए तो भी वे कहती कि लड़ाई झगड़े के बावजूद भी अपने व्यवहार में  संजीदगी बनाए रखना चाहिए . यदि कोई समस्या है तो उसे  तुरंत खत्म कर देना चाहिए  समस्या को हल्के में नहीं लेना चाहिए। अपने आपको हर परिस्थिति में ढालने की कोशिश करते  रहना चाहिए । वे कहतीं किसी समस्या को टालना नहीं, बल्कि जल्दी-से-जल्दी उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करना चाहिए. दूसरों को यह बताने के लिए ज़्यादा उतावले नहीं होना चाहिए कि आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं. यदि  जीवनसाथी की वजह से  दिल दुखता है तो अपना मन कुछ अच्छा पढ़ने में लगाओ या घर के काम में अपना दिमाग डाईवर्ट करो , किसी बगीचे में घूम आओ या  अपने  किसी  पालतू पशु के साथ समय बिताकर  अपना मूड  फ्रेश करने  की  कोशिश करो।

मां घर परिवार में सुखद वातावरण के साथ-साथ डेली रूटीन के काम कर अनुशासन  भी बनाए रखतीं। भाषा की मर्यादा बनाए रखना हमने उनसे ही सीखा। मां ने  कभी भी किसी से  ऊंची आवाज में बात नहीं की ना ही उत्तेजित होकर किसी को डांटा । वे सदैव ही हंसती मुस्कुराती रहतीं। हर आने वाले व्यक्ति का दिल से स्वागत करतीं और  भोजन करवातीं।  हमें तो हमारी मां मां जगदंबा का अवतार सी लगतीं  -जय जय जय जग जननी माता द्वार तिहाारे जो भी आता बिन मांगे सब कुछ पा जाता।
हमारी मां  संपन्न घराने से थीं हर चीज से संतुष्ट  उनके घर में किसी भी बात की कमी नहीं थीं । हर काम के लिए उनके मां - पापा  के यहां नौकर लगे हुए थे परन्तु ससुराल में उन्होंने किसी भी काम से परहेज़ नहीं किया । उनके हर काम  में पूर्णता थी ।उनके कपड़े बिल्कुल साफ स्वच्छ धुले हुए रहते वे कपड़े इस्त्री करके पहिनती थीं। आज भी अलमारी में हर कपड़ा बहुत ही सलीके से संभाल के प्रेस करके रखा मिलेगा

इतनी पढ़ी लिखी अच्छे घर से होने के बावजूद भी गेहूं साफ करके पिसवाना हल्दी धना पिसवाना, सभी प्रकार के अचार बनाना यह सब उनका सदाबहार काम रहता था। चावल के  पापड़ , उरद मूंग के पापड़ , बिजौरा आंवले का मुरब्बा , नींबू का अचार, आंवले का अचार उनके हाथ का बनाया हुआ आज भी हम खा रहे हैं।
 
हम पैसे तो बना सकते हैं परन्तु मां का जीवन हमारे  हाथों से फिसल गया। न ही चिकित्सक, न संपर्क और न ही दोस्त मददगार  सिद्ध हुए .  उनके साथ बिताया हुआ समय बहुत ही आनन्ददायी और  शांतिपूर्ण रहा। हर संपर्क में आने वाला व्यक्ति रिश्तेदार मा से प्रभावित रहता हमारी बड़ी बुआजी और दादी हमारी मां की बहुत प्रशंसा करतीं उनके लिए  हमारी मां घर गृहस्थी में पीएचडी थीं। यह बहुत बड़ी उपाधि है मां के लिए।

मां ने हर परिस्थिति में  ससुराल का अपने परिवार का साथ दिया  छोटी बुआ की शादी के लिए उन्होंने अपने सारे सोने के जेवर गहने बुआ को दे दिए। बड़ी बुआ हमेशा नरसिंहपुर आती रहती उनके बच्चों को भी मां पढ़ाती और अपने बच्चों का प्यार दुलार उन पर लुटातीं रहतीं। दोनों बुआ के बच्चों ने हमारे माता-पिता के सहयोग से ही अपनी पढ़ाई पूरी की। मां का कहना था अगर आप किसी परिस्थिति से घबराकर भागेंगे- तो वह आपका पीछा हर निकृष्ट तरीक़े से करेगी. किसी के साथ तनावपूर्ण संबंध को जहां तक सम्भव हो बात को बढ़ने न दें.। ऐसी निश्छल निर्मल निष्काम मां की महिमा को कोटि-कोटि प्रणाम🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻