Saturday, March 9, 2013

अंधियारे मानस मंदिर में प्रभु भक्ति का दीप जला देना


प्रभु भक्ति   





नरसिंहपुर की भोर: जहाँ रामधुन जगाती है सोए हुए मन

सुबह की पहली किरण अभी फूटी भी नहीं होती कि नरसिंहपुर के आँगन में एक अनोखी हलचल शुरू हो जाती है। श्वेत धोती-कुर्ता पहनकर, माथे पर चंदन सजाए और कानों में 'राधेश्याम-सीताराम' की मधुर धुन गुनगुनाते हुए लोग अपने-अपने घरों की देहरी लांघने लगते हैं। हाथों में मंजीरा, तुरही और पारंपरिक वाद्यों की थाप लिए जब ये कदम-कदम मिलाकर चलते हैं, तो देखते ही देखते आस्था की एक अनूठी टोली आकार ले लेती है। गंतव्य हैऐतिहासिक नरसिंह मंदिर।

प्रातःकाल का वह नीरव सन्नाटा, चारों तरफ लिपटी प्रकृति की मखमली हरियाली, पूरब के क्षيتिज पर तैरती सूर्योदय की सिंदूरी लालिमा, और प्रदूषण से अछूती वह शुद्ध, सुहावनी हवा... इस अलौकिक वातावरण में जब शंखध्वनि के साथ समवेत सुर गूँजता है:

"जय जय नरसिंह दया करके मेरी नाव को पार लगा देना, अंधियारे मानस मंदिर में प्रभु भक्ति का दीप जला देना..."

तो आस-पास के घरों की सोई हुई खिड़कियाँ और दरवाजे अपने आप खुलने लगते हैं। घरों की गृहिणियाँ और बुजुर्ग हाथों में सुलगती अगरबत्तियाँ और कपूर की थाली लिए नंगे पैर बाहर जाते हैं। सुर में सुर मिलते हैं, कदम से कदम जुड़ते हैं और यह प्रभातफेरी एक बहती हुई नदी की तरह आगे बढ़ जाती है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान नरसिंह को धूप-दीप और नैवेद्य समर्पित करने के बाद जब भक्तों में , दिव्य प्रसाद बँटना शुरू होता है, तो बच्चों की नींद पल भर में काफूर हो जाती है; आखिर सुबह का यह प्रसाद ही तो उनके कौतूहल और आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है!

घर-आँगन की आस्था और पापा का बैंकिंग अनुशासन

इस प्रभातफेरी की सुरीली गूँज जब हमारे घर के पास पहुँचती है, तो पूरा घर अध्यात्म के एक अनूठे रस में सराबोर हो जाता है। घर में सबसे पहले दादी  अम्माजी जागती , जिनकी झुकी हुई पीठ और कांपते हाथों में पूजा की थाली और अगरबत्ती देखकर ऐसा लगता है मानो साक्षात श्रद्धा ही आँगन में उतर आई हो। मम्मी भोर की पहली चाय की महक के साथ तुलसी के चौरे पर दीया जला देती हैं।

वहीं पापा, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के मध्य प्रदेश ज़ोन में वर्षों तक प्रतिष्ठित ब्रांच मैनेजर रहे हैं और जीवनभर बैंकिंग के सख्त अनुशासन, पंचुएलिटी (समयबद्धता) और टाइम-मैनेजमेंट के आदी रहे हैं, वे भी इस प्रभातफेरी की नियमितता के आगे नतमस्तक दिखते हैं। बैंक की शाखा को हमेशा नियत समय पर खोलने और सलीके से संचालित करने वाले पापा अब सुबह की इस 'आध्यात्मिक शाखा' के स्वागत में गंभीर मुद्रा में हाथ जोड़े आँगन में खड़े हो जाते हैं।

भाई भी इस दिव्य संगीत की थाप सुनकर अपनी नींद भूल जाता है और खिड़की से झांकते हुए टोली के बाल-गोपालों को प्रसाद लेते देखने के कौतूहल में जुट जाता है। पड़ोस के 'मिश्रा जी' और 'वर्मा चाची' भी अपनी-अपनी देहरी पर खड़े होकर इस बहती हुई गंगा में हाथ जोड़कर मानसिक डुबकी लगा लेते हैं; मानो पूरा मोहल्ला एक ही परिवार के धागे में बंध गया हो।

गुरुदेव की शिक्षा: नाद-योग और आंतरिक ध्यान

यह प्रभातफेरी महज़ एक पारंपरिक कीर्तन नहीं, बल्कि पूजनीय गुरुदेव द्वारा बताए गए 'नाद-योग' और 'मंत्र-ध्यान' का जीवंत स्वरूप है। गुरुदेव हमेशा कहते हैं कि जब सुबह के शांत ब्रह्ममुहूर्त में चित्त एकाग्र होता है, तब सामूहिक रूप से किया गया ईश्वर का नाम-स्मरण मन के सारे विकारों को धो देता है और हमें सहज ध्यान की स्थिति में ले जाता है।

रामधुन का यह समवेत स्वर अंतर्मन की सोई हुई चेतना को जाग्रत करता है, जिससे हमारे भीतर के नकारात्मक विचार शांत होते हैं और चित्त अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ध्यान में लीन होने लगता है। यह ध्वनि तरंगें पूरे वातावरण को एक ऐसे सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) में बदल देती हैं, जहाँ ध्यान लगाने के लिए किसी एकांत कंदरा की नहीं, बल्कि इसी सात्विक वातावरण की आवश्यकता होती है।

टोली अब अपनी धुन बदलते हुए गा उठती है:

"सीताराम सीताराम सीताराम कहिए, जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..."

पूरी तन्मयता से प्रभु नाम का रस पीते हुए यह कारवाँ राधा वल्लभ मंदिर की चौखट पर दस्तक देता है। घंटे-घड़ियालों की गूँज और महाआरती के प्रकाश से सोए हुए शहर को जगाते हुए, ये भक्त बिना किसी लोक-लाज के, अलमस्त होकर झूमने और नाचने लगते हैं। मुरलीधर मंदिर से होते हुए यह सिलसिला आगे बढ़ता ही जाता है। पीढ़ियाँ बदल गईं, पर उत्साह का यह रंग आज भी उतना ही चटक है जितना उनके पूर्वजों के समय में हुआ करता था।

मंदिर के पीछे बहती नदी और प्रकृति का सुकूँ

प्रभातफेरी की यह टोली जब घूमते हुए मुख्य नरसिंह मंदिर के प्रांगण में पहुँचती है, तो वहाँ का दृश्य विहंगम हो जाता है। प्राचीन मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके ठीक पीछे से बहती नदी की लहरों की कल-कल ध्वनि सीधे अंतरात्मा को छूती है। पानी की सतह पर सूर्योदय की पहली सिंदूरी किरणें जब तैरती हैं, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं भगवान नरसिंह के चरणों को धोकर ध्यान में लीन हो गई हो। नदी के घाटों से आती सौंधी महक, शंख की गूँज और घंटियों की आवाज मिलकर एक ऐसा नाद पैदा करती हैं कि वहाँ पहुँचकर हर भक्त का मन स्वतः ही शांत हो जाता है।

शहर के एक कोने में खड़े शर्मा जी इस मनोरम और जादुई छटा को निहारते हुए विस्मृत थे। कभी महानगर की चकाचौंध में भागती जिंदगी जीने वाले शर्मा जी के लिए यह दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं था। जहाँ भारी बरसात हो या हाड़ कँपा देने वाली कड़ाके की ठंड, कम से कम पचास से सत्तर लोगों की यह जीवंत टोली हर सुबह ईश्वर के द्वार पर हाजिरी देने पहुँच ही जाती है।

शर्मा जी को याद आया कि हमारे मनीषियों ने इस स्वास्थ्यवर्धक दिनचर्या को कितनी चतुराई से धर्म और संस्कृति के साथ जोड़ दिया था, जिसे आज का आधुनिक समाज 'मॉर्निंग वॉक' के ठंडे और नीरस नाम से पुकारता है।

जो शर्मा जी नौकरी के दिनों में सुबह नौ बजे से पहले कभी बिस्तर नहीं छोड़ पाते थे, आज सेवानिवृत्ति के बाद वे खुद सुबह पाँच बजे उठकर तैयार खड़े होते हैं। उनके जीवन का यह यू-टर्न उनकी पत्नी और परिवार के लिए एक सुखद आश्चर्य था। जब वे महानगर में थे, तब उनकी सुबह किसी अलार्म या चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि बच्चों के लाउड 'पॉप म्यूजिक' के कानफाड़ू शोर से होती थी। वह भी क्या जिंदगी थीकोट-टाई पहनो, कार की चाबी उठाओ, ट्रैफिक के समंदर में गोता लगाओ और रात को लाश की तरह थक-हारकर बिस्तर पर गिर जाओ! देर रात तक टीवी और मोबाइल स्क्रीन की सभ्यता में पले-बढ़े बच्चे तो जल्दी सोना जानते थे और जल्दी उठना।

साधु-संतों की थाती और स्वास्थ्य का वरदान

नरसिंहपुर को केवल एक शहर कहना इसकी गरिमा को कम करना होगा; समय-समय पर यहाँ आए महान साधु-संतों ने इसे एक जाग्रत तीर्थस्थल में बदल दिया है। उन्होंने जनमानस की मनोशुद्धि के लिए जो अद्वितीय बीज बोए थे, यह प्रभातफेरी उसी का एक अमर फल है। सुबह-सुबह रामधुन की यह अलख पूरे शहर की आबोहवा में सात्विक मिठास घोल देती है, जो लोगों के भटकते मन को भक्ति के शांत प्रवाह में मोड़ देती है। हर चौराहे पर मुस्कुराते मंदिर, भगवान नरसिंह की छत्रछाया, पीछे बहती नदी और कुछ ही दूरी पर पतितपावनी माँ नर्मदा का सान्निध्ययह त्रिवेणी इस शहर को एक दुर्लभ सौभाग्य की तरह मिली है।

आज इस प्रभातफेरी में केवल भक्त ही नहीं, बल्कि सुबह की ताजी हवा की चाह रखने वाले नए युवा और सैर करने वाले लोग भी जुड़ते जा रहे हैं। दशकों पुरानी यह अनवरत परंपरा आज पूरे देश को शांति, सद्भाव और आपसी भाईचारे का मौन संदेश दे रही है।

चिकित्सा विज्ञान भी कहता है कि सुबह की यह शुद्ध और प्रदूषण मुक्त हवा जब फेफड़ों में जाती है, तो रक्त को संजीवनी देती है। शरीर में बनने वाला ऑक्सीहीमोग्लोबिन हमारी हर कोशिका को नई ऊर्जा से भर देता है। प्रकृति ने हमें 'सुबह' के रूप में जो अनमोल उपहार दिया है, क्यों अपनी इस व्यस्त और मशीनी जिंदगी में से कुछ पल निकालकर उसका आनंद लिया जाए? मन में पवित्र और ऊँचे विचार तभी अंकुरित होते हैं, जब चारों तरफ का माहौल शुद्ध हो। आधुनिक शोध भी मानते हैं कि सुबह का यह संगीतमय भ्रमण मानसिक तनाव और अवसाद (डिप्रेशन) को जड़ से मिटाने की अचूक दवा है।

नरसिंहपुर की यह भोर महज़ एक शुरुआत नहीं, बल्कि जीवन को नए उत्साह और उमंग के साथ, धर्म और योग के मार्ग पर चलने का एक हरियाला आमंत्रण है!

 

2 comments:

  1. समय और आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोगो ने अपनी परम्पराओं से दिन
    प्रतिदिन दूर होते जा रहें ,वास्तव में प्रभातफेरी सिर्फ अध्यात्मिक शांति ही
    नहीं देती है बल्कि एक दुसरे से परिचय भी कराती ,आज के जीवन में जहाँ
    कही इन परम्पराओं का पालन नहीं किया जाता वह लोग अपने पड़ोसी को भी
    नहीं पहचान पाते ?पर जहाँ प्रभातफेरी होती है हर दोसरा व्यक्ति एक दुसरे
    भालीभाती जानता है और उसके सुख दुःख में शामिल रहते है .....
    वास्तव में बहुत खूबसूरत होगा आपका नरसिंह पुर गाँव !
    बधाई हो, भावना श्रीवास्तव जी .......

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