शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

सूर्योपासना

सूर्योदय और विष्णु अवतार श्री नरसिंह मंदिर दर्शन हमारे घर के कॉरिडोर से 
जय गुरुदेव🙏🏻🙏🏻

प्राकृतिक सौंदर्य धार्मिक आध्यात्मिक संपदा से भरपूर नरसिंहपुर उत्तर में विन्ध्याचल और दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियों से घिरा हुआ है । इसके चारों तरफ पवित्र नर्मदा नदी जिले की खूबसूरती में वृद्धि करती है। महान वीरांगना रानी दुर्गावती के काल में यह स्‍थान काफी चर्चित रहा था। यहां अनेक ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल हैं। मृगन्नाथ धाम राजमार्ग ,नरसिंह मंदिर, ब्राह्मण घाट, झौतेश्वर आश्रम, श्रीनगर का जगन्नाथ मंदिर और डमरू घाटी यहां के लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है नर्मदा क्षेत्र में होने की वजह से पुण्य धरा नरसिंहपुर -बहुत सारे छुपे हुए और पहुंचे हुए संतो की तपोभूमि रही है। परमहंस स्वामी केशवानंद महाराज धूनीवाले दादा आजीवन नरसिंहपुर में ही साधना करते रहे। रजनीश आचार्य ओशो, महर्षि महेश योगी स्वामी स्वरूपानंद जी, हरिहर बाबा ,ब्रह्मचारी महाराज जैसे सिद्ध संत नरसिंहपुर रहे हैं। नरसिंह मंदिर परिसर में स्थित पीपल के बड़े पेड़ के नीचे एक चबूतरा बना हुआ था जो कि धूनी वाले दादा का साधना आसन था कहा जाता है कि सिद्ध महापुरुषों द्वारा की गई साधना की तरंगे दूर-दूर तक पहुंचती हैं और वही उनकी रक्षा कवच होती है जो उन्हें हिंसक जीव जंतुओं से प्रोटेक्ट सुरक्षित करती है अर्थात हिंसक जीव जंतु भी ऐसे महामानव के संपर्क में आकर हिंसा भूलकर प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं। धूनी वाले दादा -परमहंस केशवानंद मध्य प्रदेश के स्वामि रामकृष्ण परमहंस थे।इनका भव्य स्थान जीवित समाधि आज भी नरसिंहपुर में स्थित है।  


इसी स्थान पर दो और महान संतों की समाधि है कहते है जैसे भागीरथ ने स्वर्ग से गंगा धरती पर लाई थी वैसे ही यहां पर तपस्या करने वाले ब्रह्मचारी बाबा जी ने मां नर्मदा को अंतिम समय में बुलाया क्योंकि वह रोज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां नर्मदा के स्थान जो कि वहां से 12 किलोमीटर दूर था पैदल जाते थे परंतु शारीरिक रूप से अशक्त हो जाने की वजह से वे अपने अंतिम समय में मां नर्मदा जी के दर्शन को नहीं जा पा रहे थे और उन्होंने प्रार्थना की कि मां मैं कैसे आऊं दर्शन के लिए मां उनकी पुकार पर प्रकट हुई और  आज भी कुंड के रूप में उस स्थान पर मां नर्मदा जी का अस्तित्व है। और वे ब्रह्मचारी महाराज जी के स्थान पर प्रकट हुई इसीलिए इस स्थान को झिरना कहा जाता है । मां नर्मदा जल की एक झिर यहां सतत बनी हुई है। पितृपक्ष में लोग यहां अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने भी आते हैं। पास में ही आठ सौ  साल पुराना  बहुत ही सुंदर जगदीश मंदिर है।

जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद महाराज का  शांत सुंदर आश्रम भी नरसिंहपुर से तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।  स्वामी स्वरूपानंद जी हिन्दू आध्यात्मिक  गुरु और स्वतंत्रता  संग्राम  सेनानी हैं। 

दैवीय कृपा फलीभूत होने पर  हमारा ट्रांसफर जबलपुर से नरसिंहपुर हुआ । हमारी दादी जिन्हें सभी 'अम्माजी' बोलते थे नरसिंहपुर  में रहती थीं । नरसिंहपुर में हमारा बहुत बड़ा पुश्तैनी मकान था जो आश्रम या देवालय जैसा लगता था। आस पड़ोस के लोग भी पारिवारिक सदस्य जैसे ही रहते थे। अम्माजी को बागवानी का बहुत शौक था । नरसिंहपुर मकान का बाड़ा बहुत बड़ा था,  बाड़े में अमरूद, अनार, सीताफल, नीम,  मुनगा, लाल कन्हेर, नीबू और रंगून से लाए गए  सुंदर क्रोटन  बड़े बड़े गमलों में लगे हुए थे। 

एक हरे रंग का तोता भी हमारे यहां पाला गया था जो वारांडा में पिंजरे में टंगा हुआ बोलता रहता था - मिट्ठू चित्रकोटी... दूध रोटी ....सीताराम,  जय राम जी की....। घर में एक गौशाला भी थी ।एक बड़ा कुआं जहां से आस पास के सभी लोग पानी भरते थे और एक चक्की थी जहां पूरे मोहल्ले की औरतें आटा पीसने आती। एक बार की बात है हमारे मोहल्ले में एक घर में आग लग गई जिसमें उनका बहुत नुकसान हुआ और उस समय हमारे घर में ही जल का स्रोत कुंआ था हमारे घर के सभी सदस्यों ने दादाजी और पापाजी ने कुएं में बाल्टी डालकर पानी खींचा और उनके घर में लगी हुई आग बुझाई। आज भी हमारे पड़ोस का यह परिवार इस पुण्य कार्य के लिए हमारे परिवार बहुत आभारी हैं और इस बात को बार-बार दोहरा कर हमारे ki का आभार व्यक्त करता है। पड़ोस के लोग कहते कि अम्मा जी और बाबू जी का परिवार तो देवताओं का परिवार है।
जरा सी आहट होती तो तोते अपने स्वर में बोलने लगते साथ साथ अन्य  पक्षियों की बोली भी वातावरण में सुनना बहुत अच्छा लगता । घर का कोई भी सदस्य दरवाजा खोलकर अंदर आता तो वह अपनी बोली में उसका स्वागत करता। अमरूद  के तीन पेड़ लगे थे सबसे बड़े वाले पेड़ पर हरे रंग के तोते का पिंजरा टंगा रहता  और उसी पिंजड़े में उसका एक कटोरी में दूध - भात और एक कटोरी में पानी रखा रहता।

बड़ी बुआ का परिवार नरसिंहपुर के घर में ही एक तरफ के पोरशन में किराए से रहता था क्योंकि फूफा जी इरीगेशन डिपार्टमेंट में काम करते थे। हमारी मां के भाई भी यानी हमारे मामा जी भी हमारे घर के पास ही रहते जो कि व्यवसाय से सब इंजीनियर थे।  गाडरवारा में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने हमारे माता-पिता का रिश्ता तय करवाया था और उसी दौरान  उन्होंने शक्कर नदी पर पुल भी बनवाया था जो आज भी कायम है और ट्रेन से या बस से जाते समय दिखाई देता है। कुछ समय तक हमारे पड़ोसी के रूप में रहने के बाद हमारी मां के भाई याने मामा जी गवर्नमेंट पीजी कॉलेज के सामने बने हुए बंगले में शिफ्ट हो गए आजकल यह बंगले न्यायाधीश और पीजी कॉलेज के प्राचार्य को एलॉटेड हैं।

हमारी बड़ी बुआ के पांच बच्चे और छोटी बुआ के तीन बच्चे हमारे  नरसिंहपुर के इसी घर में पैदा हुए ।  मकान के दो पोर्शन थे एक पोरशन में दो बहुत बड़े-बड़े हॉल दहलान और एक रसोईघर और एक भंडार गृह था। और दहलान के सामने बहुत बड़ा आंगन था। आंगन के पास कुआं था और कुएं के उस तरफ पक्का डबल स्टोरी मकान था। जिसका मुख्य दरवाजा बिल्कुल नरसिंह मंदिर के सामने मेन रोड पे खुलता । ऊपर के फ्लोर पर एक कमरा और दोनों तरफ खुला हुआ छत याने बालकनी थी। छत की ओर आने वाली सीढ़ियां अंदर और बाहर दोनों तरफ बनी हुई थी। बीच के हॉल से भी सीढ़ियां छत की ओर जाती थी और आंगन में बनी हुई सीढ़ियां भी खुले हुए छत तक जाती थी। हमारी दादी हमें हमेशा छत पर जाने से रोकती थी क्योंकि उसका कंस्ट्रक्शन पुराना था और उन्हें लगता था कि कहीं हम लोग पैराफिट वॉल पर झुक कर नीचे ना गिर जाए‌ ।  corridor से रेलवे ट्रैक भी दिखाई देता था ट्रेन की सीटी और छुक छुक की आवाज सुनकर हम बच्चे छत से ट्रेन का जाना आना देखते थे। और कई बार मालगाड़ी के डब्बे गिनते थे।

नरसिंह मंदिर परिसर में घर होने से  सुबह शाम जब भी शंख और घंटी बजती आरती होती तो हमारे पूरे घर में घंटी और शंख की आवाज गूंजती थी। अम्माजी पढ़ी लिखी थी। सन 1946 में अंग्रेजी में बात कर लेती थी। जब वे शुद्ध हिंदी मैं बात करती तो मोहल्ले की औरतें बोलती कि आप तो अंग्रेजी में बोलती हो। मोहल्ले की औरतों को खड़ी हिंदी भी समझ में नहीं आती थी तो अंग्रेजी की तो बात बहुत दूर है। अम्माजी मोहल्ले की सभी औरतों को वरांडा में बैठा कर रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाती और उनका अनुवाद करती।  रामायण सुनने के बाद सभी औरतें अम्मा जी के चरण स्पर्श कर कर उनका आशीर्वाद लेती थी।आस पड़ोस के लोग अम्माजी को रंगून वाली अम्माजी के नाम से सम्मान देते।  नरसिंह मंदिर प्रांगण में अम्माजी के उम्र बहुत से वयो वृद्ध जन एकत्रित होते और  जब वे उन्हें  नरसिंह मदिर प्रांगण में आमंत्रित करते  तब वे कहती कि वहां सब बैठकर अपनी अपनी बहुओं की बुराई करने पंचायत करते हैं इसलिए हम अपने घर से ही नरसिंह भगवान के दर्शन कर लेते हैं। 

दादी मां हमें रंगून विश्व युद्ध World War ll  की  कहानियां सुनाती। बाबूजी यानी दादाजी और छोटे बाबूजी याने हमारे छोटे दादाजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद  हिन्द फौज में सक्रिय ओजस्वी सदस्य थे।वे चौदह भाषाओं को जानते थे और आज़ाद हिंद फौज अखबार के चीफ एडिटर थे।उन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को मौत के  घाट उतार दिया । उन्हें 1945  में युद्ध के समय किसी जापानी ने पीछे से गोली मार दी ऐसे वीर क्रांतिकारी योद्धा को शत शत नमन । इनका नाम इतिहास में गुमनाम है और ना ही कोई उनकी याद मे प्रतिमा। क्युकि आजादी तो चरखे से आई है और महान तो अकबर है। आइए इन महान राष्ट्रभक्त के नाम पर  'जय हिन्द'  का नारा लगाएं।

सुुभाष चंंद्र बोस स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था । उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा" का नारा भी अत्यधिक प्रचलन में आया। भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध वर्ष 1939-45 के बीच होने वाला एक सशस्त्र विश्वव्यापी संघर्ष था। इस युद्ध में दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गुट धुरी शक्तियाँ  जर्मनी, इटली और जापान
 तथा मित्र राष्ट्र फ्राँस, ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और कुछ हद तक चीन शामिल थे।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए जापान से जा मिले जो उस युद्ध में अंग्रेजों का दुश्मन था. नेताजी ने जर्मनी जाकर हिटलर से हाथ मिलाया और उसके बाद सिंगापुर जाकर आजाद हिंद फौज की कमान संभाली. और जापानी सेना की मदद से पूर्व की ओर से भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया। 19 मार्च1944 को पुर्वोत्तर में आजाद हिंद फौज  ने भारत में प्रवेश किया और देश की आजाद जमीन पर अंग्रेजों से जमीन छीन कर पहली बार तिरंगा फहराया गया था।  इस बीच, सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में, जापान ने भारतीय युद्धबन्दियों की एक सेना स्थापित की, जिसे आजाद हिंद फौज का नाम दिया गया ।

 बाबूजी  ऊंचे कद के 6 फुट 3 इंच के महान व्यक्ति थे उनका व्यक्तित्व युग पुरुष जैसा रहा - न भूतो न भविष्यति।

अम्माजी ने कैसे ६ महीने की  हिन्द महासागर की जहाज यात्रा अपनी मांजी  यानी सास , बाबूजी यानी पति और बड़ी बुआ यानी उनकी बड़ी बेटी जो ढाई साल की थी  और  गर्भस्थ शिशु यानी मेरे पिताजी के साथ  की और कोलकाता के राजमहल पहुंची? हमें सुनाती रहतीं । वहां के  महाराजा ने उनका कैसे सहृदय स्वागत सत्कार किया। फिर वहां से  कैसे वे सभी लखनऊ पहुंचे   ये सब बातें हम बहुत उत्साह से सुनते। उनके साथ उनका वफादार नौकर टिड़ी  भी था। हिन्द महासागर पार करके अपने देश में जाने के लिए उनके पास दो ही उपाय थे  एक तो विमान से जाना और दूसरा पानी के जहाज द्वारा यात्रा पूरी करना। समुद्री यात्रा के संस्मरण पर  बहुत सारी किताबें  लिखी गई हैै और फिल्में बनाई गई हैं 

आज जब हम जहाज यात्राा की बात करते हैं तो  टाइटैनिक फिल्म का जहाज का चित्र आंखों के सामने आ जाता है Titanic दुनिया का सबसे बड़ा वाष्प आधारित यात्री जहाज था। वह साउथम्पटन इंग्लैंड से अपनी प्रथम यात्रा पर, 10 अप्रैल 1912 को रवाना हुआ। चार दिन की यात्रा के बाद, 14 अप्रैल 1912 को वह एक हिमशिला से टकरा कर डूब गया जिसमें 1,517 लोगों की मृत्यु हुई जो इतिहास की सबसे बड़ी शांतिकाल समुद्री आपदाओं में से एक है। 

समुद्री लुटेरे, सिंदबाद जहाजी और समुद्र के सम्राट नाम से कई किताबें लिखी गई हैं। समुद्र की दुनिया एक अलग ही दुनिया है जिसका धरती की दुनिया से कोई मेल नहीं। फिल्म लाइफ ऑफ पाई' में समुद्री जीवन का चित्रण  किया गया है ।

दादी मां बताती  विश्व युद्ध के समय हिरोशिमा पर बम पटके जाते थे जिसकी धमक रंगून तक आती थी। हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बमबारी 6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकाा वायु सेना हवाई जहाज द्वारा जापान के हिरोशिमा पर परमाणुु बम गिराया गया।  और उसके तीन बाद ही अमरीका ने  फिर से  नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराया।

रंगून से भारत आने के बाद बाबूजी ने जबलपुर में 
सूपाताल में हवेली खरीदी थी । चूंकि जबलपुर में आयुध निर्माण फैक्ट्री ,गन केरेज फैक्ट्री  वीकल फैक्ट्री और खमरिया फैक्ट्री है  और विश्व युद्ध का समय था अतः बाबूजी ने नरसिंहपुर में नरसिंह मंदिर परिसर में नवाब साहब की हवेली  1946 में ढाई हजार रूपए में खरीदी । दादी को आशीर्वाद था कि उनका निवास स्थान किसी देवालय के समीप हो होगा ।  नरसिंह मंदिर परिसर में  हवेली स्थित है। समय के ढाई हजार आज के ढाई करोड़ के बराबर होते थे। यह मकान राव साहब का था जिनका सुंदर महल आज भी हमारे घर के पास पूरी आन बान शान से खड़ा हुआ हैं। कहा जाता है इस महल की रानियां सुरंग से नरसिंह मंदिर हाथी पर बैठकर जाती थी। महल के सामने की ओर सिंगरी नदी का घाट बना हुआ है और महल के पश्चिमी तरफ नरसिंह मंदिर। धूनी वाले दादा ने नरसिंह मंदिर परिसर में पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बहुत समय तक बसेरा किया ।
 
नरसिंह मंदिर  एक भव्य स्मारक है जो सात मंजिल की है यह मंदिर एक ही खंबे पर खड़ा हुआ है। नरसिंह मंदिर के पीछे तालाब और सुंदर घाट बना हुआ है। नरसिंह मंदिर बहुत से विदेशियों के लिए पुरातात्विक रिसर्च का प्रमुख आकर्षण केंद्र है। नरसिंह मंदिर परिसर में ही शिव जी और हनुमानजी के छोटे मंदिर स्थापित है। 

अम्माजी नरसिंहपुर से जबलपुर  यदा -कदा  हमारे पास आ जाती थीं।  अम्माजी कभी- कभी भोपाल  में बड़ी बुआजी के यहां भी रहतीं थी। उनकी उम्र  लगभग अस्सी वर्ष पार कर चुकी थी। ईश्वर की असीम अनुकंपा से वे ट्रेन यात्रा कर लेती थीं।अम्माजी एक बहुत ही शानदार व्यक्तित्व की स्वामी थी। उनकी आवाज सोहराब मोदी सी दबंग थी। आस पड़ोस के लोग उनकी आवाज के डर से यहां वहां छुप जाते थे। हम तीनो भाई बहन को उनकी आज्ञा के बिना कोई छू भी नहीं सकता था। हम सब उन्हीं की कस्टडी में रहते थे। मैं तीनो भाई बहनों में सबसे बड़ी हूं। मेरे से बड़ी एक और मेरी बहन थी जिन्हें लीवर प्रॉब्लम हुआ और वे सवा साल की उम्र में ही चल बसीं। उन्हें सब मोना मोनू के नाम से पुकारते थे। वह देखने में बहुत ही सुंदर समझदार और छोटी सी उम्र में ही बहुत ही ज्यादा ईश्वर परायण भक्त रही। हमारी दादी और परिवार के सभी जन मोनू दीदी से बहुत ज्यादा प्यार करते थे।उनकी मृत्यु के बाद हमारी दादी ने देवी मां से घर में पुनः मोनू के रूप में लक्ष्मी जी आए ऐसी प्रार्थना की और मेरा जन्म हुआ।

नरसिंह मंदिर के पास एक राजगिरा के लड्डू बेचने वाली बूढ़ी औरत दुकान लगा कर बैठती थी। नरसिंह मंदिर के पास ही सब्जियों की दुकान भी लगती थी। अम्मा जी रोज शाम को जब सब्जी लेने जाती तब हम तीनों बच्चों के लिए कुछ  चटपटा मीठा ले  आतीं-  जो हम बहुत ही चाव से खाते थे। सबसे छोटा भाई तो हमारी मां की गोद में पांच साल की उम्र तक रहा और पांच साल की उम्र के बाद ही उसने मां का दूध पीना छोड़ा।  हमारी मां कभी भी घर से बाहर नहीं जाती थीं। वे हमेशा अपने घर के काम काज में ही व्यस्त रहतीं थीं।  पड़ोस के  छोटे बच्चों को दुल्हन चाची का चेहरा देखने एक झलक पाने की बहुत उत्सुकता रहती। दुल्हन चाची से सभी बच्चे बहुत प्यार करते।  मां एक दिन में एक स्वेटर बुं लेती थीं। सिलाई कढ़ाई बुनाई और रसोई का विशेष ज्ञान था उन्हें । मां बहुत ही सज्जन और सेवाभाव प्रधान  थीं। हम तीनों बच्चे उनके बहुत लाडले थे। मै चूंकि लड़की थी और तीनों भाई बहिनों में सबसे बड़ी थी तो मुझे  सबका सबसे ज्यादा लाड प्यार मिला। मां ने मुझसे कभी कोई काम नहीं करवाया । हम तीनों। बच्चे देर तक सोते रहते थे और वे रसोई घर में खाना बनातीं रहतीं थीं। जब मैं ढाई तीन साल की थी तब मां मेरे लिए बहुत सुंदर फ्रॉक बनाई थी, एक गरम कपड़े की लाइट कलर फ्रॉक जिस पर उन्होंने रेड कलर से मुर्गा- मुर्गी और चूज़े बनाए थे । वह  सजीव सी कलाकारी देखते ही बनती थी। उन्होंने मेरे लिए  अपने हाथ से बहुत कपड़े सिले। आस - पड़ोस के लोग देखते तो बहुत प्रशंसा करते। कोलकाता की फेशन एंड डिजाइन कंपनी से उनके लिए जॉब  ऑफर भी आया परंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। मां बायोलॉजी स्टूडेंट थीं उनकी इच्छा भी चिकित्सक बनने की थी । उन्होंने रायपुर में गर्ल्स कॉलेज में बीएससी में एडमिशन लिया । अपने कॉलेज के दिनों में ही वे बहुत फैशनेबल सलवार कुर्ते पहिनतीं थीं और कार से कॉलेज जातीं थीं। 

दादी मां की कद काठी  अत्यंत आकर्षक- लंबी दुबली -सुंदर नयन नक्श वाली मिल्की व्हाइट- गौर वर्ण  की सशक्त कुशल ग्रहणी और सम्मानित महिला थीं। 

जबलपुर में भी हमने बहुत सारे फूल और सुंदर आकर्षक पेड़ पौधे लगाए हुए थे। जानकीनगर उद्यान के सामने हमारा सुंदर बंगला था जिसका किराया स्टेट बैंक देती थी। जानकीनगर का सुंदर पार्क बहुत सुंदर फूलों से भरा हुआ एक ऐसा स्थान जहां लोग फोटो खिंचवाने आते, यह बच्चों का प्रिय मनोरंजन स्थल, झूला, पीपल के नीचे चबूतरा एक लाइन से लगे हुए सुंदर सूरजमुखी होलीहॉकस हिबिस्कस के फूल के बीच रास्ते में से जब कोई नवविवाहित कपल घूमता हुआ दिखाई देता तो  सिलसिला फिल्म का  गाना - देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए याद आ जाता। वसंत ऋतुु में पार्क किसी फिल्म की शूटिंग जैसे स्थान से कम नहीं लगता ।
 यह पार्क हमेशा फूलों से खिला रहता और सुगंध और जीवन से भरपूर रहता । कई विदेशी नस्ल के फूलों जैसे- डेल्फीनियम, फॉक्सग्लो, और हॉलीहाक्स के विविध रंगों से सजा, हंसमुख डेज़ी  से सूसज्जित हिस्सा यह पार्क  कॉलोनी का मुख्य आकर्षण केंद्र और एक शानदार स्थान था।  बेला, जुही, रातरानी , चंपा, चमेली गुलाब के फूलों से युक्त सुगंधित हवा बहती तब यह  रोमांटिक स्थान ,फूलों के शहर में हो घर अपना जैसा लगता था। बच्चेेे झूला झूलते, खेलते ।

हमने जानकीनगर जबलपुर में गेट के पास एक सुंदर फूलों का पौधा लगाया था उसकी बेल गेट पर चढ़ती है और गेट बहुत ही सुंदर आकर्षक बन जाता है। हम उस फूल को बोगनविलिया कहते थे।हमारी दादी ने बताया कि यह पेड़ उन्होंने अपने घर रंगून में भी लगाया था और बाबूजी यानी दादा जी इसे बेगम बेलिया कहते थे अर्थात इस पेड़ में बिना गम के फूल आते है  यह पेड़ इतना फूलता है जैसे कि इसे कोई गम ही नहीं है।

मैं बायोलॉजी स्टूडेंट थी। 1990- 1993 में मैं प्री- मेडिकल टेस्ट की तैयारी कर रही थी सुबह पांच बजे स्कूटी से उप्पल क्लासेस कोचिंग पढ़ने जाती थी। उस समय स्कूटी से स्कूल या कोचिंग जाना बहुत बड़ी बात थी।  सुबह  पांच - पौने छह बजे तक उप्पल कोचिंग  क्लासेस का बड़ा हॉल इतना ज्यादा भर जाता था कि दरवाजे के पास खड़े होने तक की जगह नहीं होती थी। हमें सुबह जल्दी उठना पड़ता था। मेरा बेड  और टेबल अम्माजी के ही कमरे में लगा हुआ था। स्कूल की छुट्टियां ज्यादा रहती थीं। आरक्षण आत्मदाह , राम जन्मभूमि- बावरी मस्जिद दंगा फसाद अपनी ऊंचाई पर था।कई बार तो स्कूल से वापस आना ही बहुत मुश्किल हो जाता। चारों तरफ से रास्ते बंद रहते। स्कूल बस का घंटों इंतजार करते  परंतु बस भी समय पर नहीं पहुंचती। फिर हम एक ही कॉलोनी में रहने वाले दोस्त अपने पैरेंट्स को बुलाते और कार से घर पहुंचते वो भी दूर दूर के रास्तों से । एक बार तो मदन महल कि पहाड़ियों के पास से घूमकर हम रानीताल पहुंचे । कहने का अर्थ स्कूल बंद थे। घर में ही जितनी पढ़ाई हो सके हो जाती। मै अम्माजी से बोलती-  अम्मा जी आप मुझे  सुबह जल्दी उठा देना  पढ़ना है तो वह 4:30 बजे की जगह 2:00 बजे ही उठा देती थी।  मुझे हंसी आती और खुशी भी होती कि कम से कम उन्होंने मुझे उठाया तो ।

कई बार कर्फ्यू के दौरान  कोचिंग बाजार सभी बंद रहते थे और जबलपुर का वातावरण कुछ नकारात्मक सा रहता , मुझे लगता है कि यदि मेरा प्री मेडिकल टेस्ट में सिलेक्शन नहीं हुआ और मैं मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं ले पाई तो यह जीवन व्यर्थ है। जबलपुर के शिक्षण संस्थान चाहे दीपिका क्लासेज हो या शासकीय स्कूल  सभी फर्जीवाड़ा केंद्र स्थल,  सिर्फ फ्री की सैलरी पाने का माध्यम।  प्रोफेशनल दृष्टिकोण के टीचर्स थे जो पैसे तो रखवा लेते थे परंतु पढ़ाते कुछ नहीं थे। यही हाल सरकारी स्कूलो का भी था नाम बड़े और दर्शन छोटे। कभी टीचर आते तो कभी स्टूडेंट नहीं आते कभी स्टूडेंट्स आते तो टीचर्स नहीं आते तो मुझे लगता अब मैं क्या करूं ऐसे मौके पर जब कुछ समझ नहीं आता  क्या करें और क्या न करें  इस भटकाव से उबरने के लिए अम्मा जी हमेशा प्रोत्साहित करती। अम्माजी से मुझे जीवन संग्राम लड़ने की शक्ति मिली। दो बार के प्रयासों के बाद में प्री मेडिकल टेस्ट मैं पास हो गई। परंतु दुर्भाग्यवश मैं मेडिकल कॉलेज में नही पढ़ पाई।

उस समय जबलपुर में हमारे घर में टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज़ पेपर आता था। हम तो कई कई दिन तक न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ पाते थे और अम्माजी रोज न्यूज़पेपर बहुत ही इंटरेस्ट से पढ़ती थी। दादा जी के साथ रंगून में रहने की वजह से उनकी  अंग्रेजी परिष्कृत हो चुकी थी। जानकीनगर के आस पड़ोस के लोग भी अम्मााजी से
बात करने घर आते।   

जानकीनगर के बड़े हॉल में पूजा स्थान बना था कभी कभी पूजा के समय मेरे  भाई मुझे डिस्टर्ब  करते थे  जैसे टीवी का साउंड लाउड कर देना या जोर जोर से बात करना ।जिससे पूजा पाठ में डिस्टर्ब होता  ध्यान विचलित हो जाता ये सब अम्माजी देखती सुनती रहतीं फिर प्रेम से कहती बेटा तुम सूर्य भगवान के सामने जाकर  माला कर लो।

1985-86- 1994 तक दादी मां  ट्रेन यात्रा करतीं रहीं। 1995 में उनका पार्थिव शरीर नहीं रहा। हमलोग जबलपुर जानकी नगर में रहते थे और वहीं पर मकान खरीद कर रहने वाले थे कि 1997 में ऐसा भूकंप आया कि जानकीनगर के कुछ मकान और विजय नगर के बहुत सारे नव निर्मित मकान ध्वस्त हो गए। 

नरसिंहपुर में हमारे पूज्य गुरुदेव महाराज हमारे पिताजी के गुरु भाई पूज्य ललित बिहारी श्रीवास्तव जी के पास चातुर्मास करने आते रहते थे । हमारे माता पिता कुंडलनी शक्ति साधक , अतः हमने निर्णय किया कि नरसिंहपुर में ही मकान बनाया जाए। पुराना मकान महल नुमा बना हुआ था । बहुत मोटी मोटी दीवारें थी इतनी मोटी कि  एक ट्रैक्टर चला जाए। हमें मकान बनवाने में दो  साल लग गए क्योंकि हमने मकान तुड़वा कर बनवाया था। मकान की प्रथम नींव गुरुदेव महाराज के शुभ हाथों से ही स्थापित हुई। मकान बहुत बड़ा बना था। हालाकि छोटा ही बनवाना चाहते थे । परंतु हरि इच्छा बलवान।

पिताजी को अपने गुरु के साथ रहने की उत्कट लालसा थी। हमारी माताजी और पिताजी दोनों के ही  माता - पिता नहीं थे। पिताजी के बाबूजी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के बाद देश स्वतंत्र होने के बाद ही नहीं रहे अतः हमारी दादी ने ही पिताजी की बहुत अच्छी परवरिश की और उनके आशीष से  पिताजी बैंक में उच्च  अधिकारी के पद पर पदस्थ हुए । दादी मां का ना रहना हम सभी के लिए बहुत दुखद था।

अब माता - पिता दोनों ही  गुरुदेव के प्रेम में विभोर। गुरुदेव ही उनके सब कुछ।
त्वमेव माता  पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव ।त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥

मकान  बन कर तैयार हो गया था ।यह 1999 -2000 की  एक छोटी सी घटना  है।तब स्वामी जी महाराज हमारे साथ नरसिंहपुर  में रहते थे। गुरुदेव का कमरा अलग  ध्यान भजन हेतु मंदिर सा पवित्र सेपरेट  था ।
परम पूजनीय स्वामी जी गुरुदेव महाराज जी को सूर्यनारायण के दर्शन करना बहुत सुन्दर लगता था | 

उगते हुए सूर्य को देखकर और छत से ही नरसिंह भगवान के दर्शन करके वे  बहुत ही आनंदित होते थे।हमें भी सूर्योदय दर्शन बहुत अच्छा लगता है क्योंकि सूर्योदय होते ही सभी पक्षी चहचहाते है। सूर्योदय  एक नई आशा और उत्साह लेकर आता हैं | सूर्योदय सौंदर्यपान करने योगी जन सूर्योदय से पहले उठते है उस समय सारा आकाश सिन्दूरी रंग से भरा हुआ होता है और  सूरज शीतल किरणें  पेड़ पौधों, पक्षियों और जन जन में प्राण का संचार कर देती हैं।

गुरुदेव महाराज सूर्योदय का सुबह बहुत उत्सुकता से इंतजार करते थे | उनको लगता था कि सूर्य नारायण के दर्शन कब होंगे सुबह 3:00 से 4:30 -5:00 बजे तक ध्यान करते थे और उसके बाद फिर सुबह की सैर करने निकलते थे। तत्पश्चात वे सूर्य नारायण के दर्शन करने के लिए लालायित रहते थे।

पहले तो यह बात नहीं मालूम थी कि गुरुदेव महाराज इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा क्यों करते हैं  सूर्य उदय की और इतना आनंदित क्यों होते हैं सूर्य उदय होने पर? परंतु जब महायोग विज्ञान पढ़ी तब समझ में आया कि  महायोगियों को सूर्यदेव में साक्षात चतुर्भुज विष्णु रूप के दर्शन होते हैं।ऐसे सदगुरुदेव भगवान को कोटि-कोटि प्रणाम है।


12 टिप्‍पणियां:

  1. सूर्य ऊर्जा का केन्द्र है एवं समस्त सृष्टि की दूरी है। इसलिए प्रथम पूजनीय एवं उपासनीय है। प्राचीन काल में निर्मित की मंदिर इजिप्ट से लेकर एशिया महाद्वीप में प्राप्त होते हैं।

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  2. अपनें अतीत को सहेजना और उससे प्रेरणा लेना यही हमें सिखलाया गया था आज इसकी बहुत आवश्यकता है मानव अपनें स्वार्थवश इन मान्यताओं से दूर भाग रहा है और अपनें जीवन से हताश हो रहा है।
    सुव्यवस्थित व्याख्या में लिए बधाई।

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  3. बहुत ही सुंदर चित्रण
    अम्मा बाबूजी की फोटो, रंगून युद्ध कि फोटो या ऐसी दुर्लभतम फोटोज को भी यदि सम्भव हो तो जरूर शेयर कीजियेगा।

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