Monday, April 6, 2020

सूर्य साधना - मां

पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु प्रकृति पर निर्भर है और प्रकृति  सूरज पर निर्भर है। अगर सूरज की किरणें पृथ्वी पर न पहुँचे तो पृथ्वी का विनाश हो जाएगा,सभी ओर अंधकार छा जाता है  पृथ्वी के सागर महासागर वाष्प बनकर उड़ जाएं। पृथ्वी पर भयानक प्रलय छा जाए और पृथ्वी पर से जीवन का नामोनिशान ही मिट जाए।यह एक सर्वमान्य सत्य है कि हिन्दू धर्म में सूर्य को जीवंत देवता का दर्ज़ा दिया गया  है। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, हिंदू सूर्य को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं और सुबह जल  अर्पण करते है।

हिन्दू धर्म में छठ पर्व में सूर्य की पूजा षष्ठी को की जाती है। सूर्यषष्ठी व्रत में ब्रह्म और शक्ति प्रकृति और उनका अंश षष्ठी देवी, दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है, इसलिए व्रत करने वाले को दोनों की पूजा का फल मिलता है। इस पूजा की यही बात इसे खास बनाती है।श्वेताश्वतरोपनिषद् में बताया गया है कि परमात्मा ने सृष्टि रचने के लिए खुद को दो भागों में बांटा। दाहिने भाग से पुरुष और बाएं भाग से प्रकृति का रूप आया। 

ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है। पुराण के अनुसार यह देवी सभी बालकों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी आयु देती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में ऐसा जिक्र मिलता है-

''षष्‍ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्‍ठी प्रकीर्तिता,बालकाधिष्‍ठातृदेवी विष्‍णुमाया च बालदा।आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी,सततं शिशुपार्श्‍वस्‍था योगेन सिद्ध‍ियोगिनी''।

मेरा जन्म पश्चिम बंगाल में हमारे बड़े मामाजी के यहां हुआ वे पेशे से इंजीनियर थे।उनके कार्यकाल में रहने के दौरान कोल माइंस में कोई भी दुर्घटना नहीं घटी अतः 1986 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे जेनरल मैनेजर के पद पर पदस्थ थे।तब हमलोग शहडोल के पास कोतमा में रहते थे और  वे कोतमा के पास कोलमाइंस मनेंद्रगढ़ जिले के  झगराखंड  में।z

मामाजी के यहां छठ पूजन होता था।बिहार बंगाल में सूर्य को साक्षात देवता माना जाता है और सूर्य उपासना का बहुत ज्यादा महत्व है। सूर्योपासना त्वरित फलवती होती हैं। भगवान राम  सूर्यवंश के वंशज हैं।  भगवान श्रीराम के पूर्वजों को सूर्योपासना से ही दीर्घ आयु प्राप्त हुई थी। श्रीकृष्ण के पुत्र सांब की सूर्योपासना से ही कुष्ठ रोग से निवृत्ति हुई।

भगवान हनुमान सूर्य देवता को अपना गुरु मानते थे। सूर्य देव के पास 9 दिव्य विद्याएं थीं। इन सभी विद्याओं का ज्ञान बजरंग बली प्राप्त करना चाहते थे। सूर्य देव ने इन 9 में से 5 विद्याओं का ज्ञान तो हनुमानजी को दे दिया, लेकिन शेष 4 विद्याओं के लिए सूर्य के समक्ष एक संकट खड़ा हो गया। शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान सिर्फ उन्हीं शिष्यों को दिया जा सकता था जो विवाहित हों। हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे, इस कारण सूर्य देव उन्हें शेष चार विद्याओं का ज्ञान देने में असमर्थ हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए सूर्य देव ने हनुमानजी से विवाह करने की बात कही। पहले तो हनुमानजी विवाह के लिए राजी नहीं हुए, लेकिन उन्हें शेष 4 विद्याओं का ज्ञान पाना ही था। इस कारण हनुमानजी ने विवाह के लिए हां कर दी। 

हनुमान जी की रजामंदी मिलने के बाद सूर्य देव के तेज से एक कन्‍या का जन्‍म हुआ। इसका नाम सुर्वचला था। सूर्य देव ने हनुमान जी को सुवर्चला से शादी करने को कहा। सूर्य देव ने यह भी बताया कि सुवर्चला से विवाह के बाद भी तुम सदैव बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे, क्योंकि विवाह के बाद सुवर्चला पुन: तपस्या में लीन हो जाएगी। हिंदु मान्‍यताओं की मानें, तो सुवर्चला किसी गर्भ से नहीं जन्‍मी थी, ऐसे में उससे शादी करने के बाद भी हनुमान जी के ब्रह्मचर्य में कोई बाधा नहीं पड़ी। और बजरंग बली हमेशा ब्रह्मचारी ही कहलाए।

मध्यप्रदेश में छठ पूजा का ज्ञान बहुत ही कम लोगों को है। जबलपुर में भी हमारे एक और मामा जी रहते थे जिनके हाथ छठ उत्सव धूमधाम से मनाया जाता था।

मां कृत्रिम बनावटी जीवन जीने के बजाय,  दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करने के बजाय वास्तव में एकांत में आनंदित रहती थी। साधारण जीवन जीने की वजह से वे अपने संस्कारों के करीब थीं और इसलिए वे अपने परिवार के सदस्यों के करीब थीं और परिवार द्वारा दिए गए प्रेम से ही वे बहुत खुश और संतुष्ट रहतीं।मां कम से कम चीजों में ही संतुष्ट रहतीं और अपने साथ अधिक से अधिक समय बिताने की वजह से  वे अपने आपको पहचान चुकी थीं  कि वे वास्तव में कौन हैं।आनंद आंतरिक गुण है वह हर परिस्थिति में अपने कि आनंदित रखतीं बाह्य जगत से उनका रिश्ता मात्र भौतिक आवशयकताओं  दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति मात्र का था।  सादा जीवन जीने और बड़ी सोच रखने कि वजह से ही आंतरिक शांति और आनंद से परिपूर्ण रहतीं।

मां के जीवन की सबसे विशेष बात यह थी कि उन्हें सादगी सरलता निष्छलता ज़रूरतों और इच्छाओं को सीमित कर जीने की कला आती थी उनका कहना था  इच्छाओं का  कोई अंत नहीं है। उन्होंने कभी भी अपने पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों को प्रभावित करने के लिए कोई कार्य नहीं किया वे दूसरों की  आवश्यकता पड़ने पर मदद करने प्रयासरत थे। बहुत कम लोग सादा सरल जीवन जीते हैं, लोग अपनी बड़ी संपत्तियों से दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं अपनी भव्यता का रौब जमाना चाहते है।

हमारी दादी मां भी सूर्योदय से पहले ही उठ जाती । उनकी दिनचर्या में सूर्योदय से पहले उठना घर के कामकाज करना नित्य कर्म में शामिल था। लोग उनके बारे में कहते कि अम्माजी चिड़ियों के साथ सो जाती हैं और कौवों के साथ उठ जाती हैं । पुराने जमाने में घड़ी नहीं होती थी। समय देखने के लिए लोग सूर्य प्रकाश धूप का अनुभव कर लेते थे  कि अभी कितना बजा होगा अर्थात पुराने लोग सूर्य की लय के साथ समकालिक हो जाते थे । ब्रह्म मुहूर्त में उठना बल बुद्धि विद्या का द्योतक समझा जाता था ब्रह्म का समय या शुद्ध चेतना या शुभ और प्रातः काल के इस समय उठना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

दादी मां अपनी वृद्धावस्था में भी विशाल ऊर्जा से  भरी रहती थी उनके अंदर आशा, प्रेरणा और शांति हर समय प्रकट होती थी। 

अम्माजी सभी विद्यार्थियों को ब्रह्म मुहूर्त में उठा देती उनका मानना था कि ब्रह्म मुहूर्त में स्वाध्याय करनेे से विद्यार्थी अपनेेेे लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैैं । उनको सुबह का वातावरण शुद्ध, शांत और सुखदायक लगता था।

गुरुदेव भी सूर्य को  सर्वशक्तिमान समझ सूर्योदय की प्रतीक्षा करते । उनके अनुसार  सृष्टि  सृष्टि का आधार  और ऊर्जा का श्रोत है।  इस समय ध्यान - भजन करने से मानसिक कृत्य में सुधार होता है। यह सत्वगुण बढ़ाने में सहायक है और रजोगुण और तमोगुण से मिलने वाली मानसिक चिडचिडाहट या अति सक्रियता और सुस्ती से निदान देता है। बिहार में छठ पूजा का विशेष  महत्व है।मां अपनी मां के घर छठ पूजा करती थी।   बिहार में लोग गंगा नदी में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है उनका मानना है कि ऐसा करने से  नेतृत्व क्षमता  बल, बुद्धि ,विद्या, तेज, पराक्रम, यश एवं उत्साह में वृद्धि होती है । छठ  को सूर्यषष्ठी व्रत कहा जाता है जो बहुत कठिन होता है।  

सूर्य की पूजा के साथ छठ मैया की भी पूजा होती है।  हमारे यहां छठ पूजा का रिवाज नहीं था  अतः हमारे मामा जी के निमंत्रण पर हम लोग छठ की पूजा में शामिल होने उनके घर  जाते थे। छठ पूजा चार दिनों तक चलती। कार्तिक माह में दिवाली के बाद छठे दिन  यानी छठमी को यह त्योहार मनाया जाता। छठ का व्रत हमारी मामी करतीं थीं। नदी में स्नान और उगते और ढलते सूर्य की पूजा करतीं और सूर्य भगवान  को अर्पित करने छठ प्रसाद में  स्वादिष्ट मिठाई जैसे कि ठेकुआ, खीर, चावल के लड्डू बनाती। ठेकुआ बिहार का  प्रसिद्ध व्यंजन है । 

यह मीठा खुरमा या मीठी सलोनी का बड़ा रूप है। इसे गेंहू के आटे, चीनी -गुड़, नारियल और सूखे मेवों से बनाया जाता है । छठ पूजा के दूसरे दिन सूर्य देव को अर्पित  किया जाता है। इसके साथ कद्दू की खट्टी मीठी नमकीन सब्जी बनातीं स्वादिष्ट सब्ज़ी को तली हुई गरी के साथ मिलाया जाता है और व्रत को तोड़ने के लिए एकदम सही पकवान माना जाता।  हरे चने और आलू की सब्जी को छोले की सब्जी की तरह बनाया जाता। हरे चने को रात भर पानी में भिगोया जाता और अगले दिन घी में जीरा और हरी मिर्च के साथ बनाया जाता। इसे पुरी, कद्दू की सब्जी और एक मिठाई के साथ परोसा जाता गुड की खीर भी बनाई जाती जिसमें चीनी के स्थान पर गुड मिलाया जाता । चावल, पानी और दूध के साथ  खीर बनाइ जाती. यह मिठाई छठ पूजा का भोजन पूरा करती और इसे सेवन करने से पहले सूर्य देवता को भोग लगाया जाता। 

भोजन के दौरान यदि कोई भी आवाज होती तो भोजन को वहीं अधूरा छोड़ दिया जाता। मुझे याद है मामा जी के यहां एक ब्रूजो नाम का कुत्ता पला  हुआ था। जैसे ही छठ की पूजा करके मामी भोजन करने बैठी वैसे ही कुत्ते ने भोंकना शुरू कर दिया तो उन्हें वहीं पर खाना खाना बंद करना पड़ा।

मां छठ के बारे में बहुत सारी बातें बतातीं थीं। षष्‍ठी देवी को छठ मैया कहते हैं।  षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं। आज भी देश के कई हिस्‍सों में बच्चों के जन्म के छठे दिन षष्ठी पूजा का चलन है। पुराणों में इन देवी के एक अन्‍य नाम कात्यायनी का भी जिक्र है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी को होती है। 


Monday, October 8, 2018

नशा और व्यक्तित्व विनाश




    नशा  समाज पर एक कोढ़ है, नशा आदमी की सोच को विकृत कर देता है। उसका स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता और उसके गलत दिशा में बहकने की संभावना बढ़ जाती हैं। नशे के लिये समाज में शराब, गांजा, भांग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्बाकू और ध्रूमपान (बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम) सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थो का उपयोग किया जा रहा है । ये  जहरीले और नशीले पदार्थो व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि तो पहुंचते ही हैं साथ ही साथ इनके दुष्प्रभाव से  सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता है।बीड़ी, सिगरेट, गांजा, भांग, अफ़ीम या चरस पीने वालों को जब भरपूर नशा प्राप्त नहीं होता है, तब वे शराब और हेरोइन जैसे मादक पदार्थो की ओर अग्रसर होते हैं । नशा किसी प्रकार का भी हो व्यक्तित्व के विनाश, निर्धनता की वृद्धि और मृत्यु के द्धार खोलता है। इस के कारण परिवार तक टूट रहे हैं। आज का युवा शराब और हेरोइन जैसे मादक पदार्थों का नशा ही नहीं बल्कि कुछ दवाओं का भी इस्तेमाल नशे के रूप में कर रहा है। युवा पीढ़ी नशे का ज्यादा शिकार हो रही है। हमारे देश में नशा ऐसे बिक रहा है जैसे मंदिरों में प्रसाद। हर एक किलोमीटर में मंदिर मिले ना मिले पर शराब की दुकान जरुर मिल जाएगी और शाम को तो लोग शराब की दुकान की ऐसी परिक्रमा लगाते हैं की अगर वो ना मिली तो प्राण ही सूख जाएं।

 नशा एक  आसुरी प्रवृत्ति है। जिसको समाप्त करना परमावश्यक है।नशा करने के कारणों के बारे में चर्चा से पहले कुछ बातें स्पष्ट हो जाना बहुत ज़रूरी हैं. एक तो ये किसी समाज या पद या वर्ग विशेष के लोगों से यह अपराध या मनोवृत्ति नहीं जुड़ी है. अनपढ़ से लेकर विद्वान, गरीब से लेकर अमीर तक और किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के अंतर से कोई अंतर नहीं पड़ता, हर जगह यह अपराध देखा जाता है. 

अभी तक की बलात्कार की सारी रिपोर्ट देखी जाएं तो 85 प्रतिशत मामलों में नशा ही प्रमुख कारण रहा है। ऐसे में कोई भी स्त्री उसे मात्र शिकार ही नजर आती है. और इसी नशे की वजह से दामिनी और गुडिया शिकार हुई.

इसी नशे की वजह से गरीब भारतीय परिवार  हैं। उनकी मां बीमार हैं और उनके पिता शराबी हैं। दोनों बच्चे मिलकर खुद को गरीबी से बाहर निकालने का काम करते हैं।


 ऐसे बलात्कारी जिनका परिवार(पत्नी और बच्चे )होते हैं  उनकी पत्नियों के विषय में सोचें तो  उनके लिए  तो विवाह एक पवित्र सम्बन्ध कहा ही नहीं जा सकता . यह संसार का सबसे अपवित्र रिश्ता  बन जाता है. एक कोढ़ जो जीवन लेकर ही जाता है. ऐसे  बलात्कारियों की पत्नी अपने तन - मन पर शादी के रूप में बहुत बुरा बलात्कार झेलती है।उनकी पीड़ा को यदि  गहराई से  समझा जाये तो शरीर क्या रूह भी काँप जायेगा ।इन पीड़ित महिलाओं को इस आग को उन निर्दोष लड़कियों  को सौंप देना चाहिए  जो आज इस कम वासना का शिकार बन रही हैं।


मेरी माताओं और बहिनों से एक ही प्रार्थना है कि  वे  पुरुषों  को इतना ज्ञान दें  कि  वे नारी का सम्मान करना सीखे।     अगर कोई किसी की लड़की के साथ  गलत करता है तो उसकी माँ  ही ऐसे बेटे को गोली मार दे जैसे फिल्म "मदर इन्डिया" में बरसों पहले दिखाया गया था।


सबसे खराब स्थिति उन बच्चों की होती है जो बालिग नहीं होते, मा-बाप की रोज के झंझट या वादविवाद का उनके अन्र्तमन में बुरा प्रभाव पड़ता है, ऐसे बच्चे मानसिक रूप से अन्य बच्चों की अपेक्षा पिछड़ जाते हैं । घर का अच्छा माहौल न मिलने से उनमें दब्बूपन आ जाता है और वे हमेशा डरे-डरे रहते हैं । अपने सहपाठियों से खुलकर बात नहीं कर पाते। शिक्षक के समक्ष अपराधबोध से ग्रसित वे सहमे-सहमे रहते हैं । एक अंजान डर के कारण पढ़ा लिखा कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता । हम, हमारा समाज व सरकारे क्या कभी ऐसे लोगो के दुःख दर्द व मानवाधिकार से सम्बन्धित विषयों पर गौर करता है ?बलात्कार Power Game शब्द का अर्थ ही 'बलपूर्वक किया जाने वाला काम' है. लेकिन, इसे समझना इतना आसान भी नहीं है. सामाजिक से लेकर मनोवैज्ञानिक कारणों (Psychology of Rape) की पड़ताल ज़रूरी है कि आखिर आदमी किसी औरत पर बलात्कार क्यों करते हैं.  फ्रायड (Sigmond Freud) ने कहा था कि 'शरीर का विज्ञान ही आपकी नियति/किस्मत है' (Anatomy is Destiny). सिर्फ शरीर के स्तर पर ही इस सवाल का जवाब नहींमिल सकता है मन और व्यवस्था में भी रेप के  सूत्र छुपे हैं.

 

Wednesday, May 16, 2018

जाऊं कहां तजि चरण तुम्हारे : जगदम्बा


Kundalini Yoga


मनुष्य के जीवन में माँ का विशेष महत्व होता है। माँ हमारी  प्रथम गुरु होती है। हरसच्चा व्यक्ति माता -पिता गुरुके प्रति आस्था, विश्वास और सम्मान रखता है और छोटे बड़े फैसले लेने से पूर्व अपने  माता -पिता गुरु की राय जानना चाहता है।

माँ हमें  बोलना, चलना, लिखना पढ़ना सिखाती है।  हिन्दू धर्म में माता -पिता गुरु का विशेष महत्व रहा है। हमें  जीवन पर्यन्त माँ का सम्मान करना चाहिए। माँ के आशीर्वाद के बैगर मनुष्य अधूरे है। माँ को प्रणाम किये बिना हम कोई शुभ कार्य शुरू नहीं करते है। उनके द्वारा दी गयी शिक्षा मनुष्य को जीवन भर काम आती है। उनके आशीर्वाद से कीमती चीज़, और कुछ हो ही नहीं सकती है। माँ के प्रति हमेशा  मन में श्रद्धा होनी चाहिए, तभी  अपने कार्य को भली भाँती कर  सकते है।

माँ  संतान के आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करती  है सद्बुद्धि सदचिंतन जैसे संस्कारों को परिवर्धित  करती है  अनुशासित करती है  अपने गुरुजनों के प्रति कितना आदर एवं सम्मान करना सिखाती है , प्रकृति जब भी जीवन का सृजन करती है तो साथ ही साथ संस्कारों का भी सृजन करती है और संस्कारों की सूची में आदर्श व्यक्तित्व  प्रथम स्थान पर आता  है.


उन्होंने हमेशा मुझे अपना आशीर्वाद दिया उनके अंतिम शब्द थे अब तुम खुश रहना ।  तुम्हारी पीएचडी हो गई ।मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। मैं  बहुत दुखी हो गई  , ...' ' मां तुम कहां जा रही हो  ऐसा मत कहो तुम हो तो मै खुश हूं।"


मां की सौम्यता और दयालुता के लिए आत्मीय स्वजन उनकी सदा सराहना करते आए हैं। मां जगदम्बा के अवतार के रूप में  घर परिवार को संवारती हैं। उनके  योगदान से ही घर एक मंदिर बन जाता है और लोगों द्वारा  ईश्वर की पूजा की जाती है। 

परिवार में होने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए धैर्य और क्षमता के लिए उन्हें गुरुदेव और अन्य पूज्य लोगों द्वारा सराहना मिली। उन्होंने पत्नि के रूप में अपने पति की  देवी सीता के समान सेवा की। 

मां के अस्तित्व का पहला प्रमाण उनकी संतान हैं उनकी बनायी हुई यह गृहस्थी संसार अर्थात् परिवार है। मै अपनी मां की परछाई मैं अपने में और भाईयों में देखती हूं। मां भले ही भौतिक स्वरूप में हमारे साथ न हों पर हर समय उनका आर्शीवाद हमारे साथ रहता ही है ।यह अनुभूति परक सत्य है।माता पिता  ही हमारे प्रथम गुरु हैं। 

मां के स्वभाव व आचार विचार में ध्यान से उत्पन्न प्रेम और शांति, गुरु  आशीष की अनुभूति होती।  उनका चेहरा हमेशा फूल के समान खिला रहता । पारिवारिक सदस्यों  में भी एक आध्यात्मिक आश्वस्ति की अनुभूति होती। हो भी क्यों नहीं, योग साधना ध्यान तपस्या का संगम जो था नरसिंहपुर स्थित निवास स्थल । ध्यान की शांति में ईश्वर  गुरुदेव की  उपस्थित आशीर्वाद का आभास होता।
जिस साधना को पाने के लिए योगी अपने जीवनके अमूल्य समय को नष्ट करते हैं, उसे सहज ही सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं होने देते गुरुदेव ने हमें वही  साधना प्रदान की। योगी या महात्मा  ईश्वर की शास्वत् सत्ता में निवास करता है।

यह वह स्थल है, जहां हमारे गुरुदेव ने हमारे साथ चातुर्मास किया। इसी घर में हमारे माता पिता की दीक्षा हुई आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु ध्यान करने साधक गण आए  ।   यह स्थान  दोनों जन्मभूमि व  कर्मभूमि भी बनी। गुरुदेव के दर्शन करने  दूर-दराज से उनके भक्त आते।  सभी भक्त अनुशासित और ध्यान में मग्न रहते।

 मां अहंकार, राग-द्वेष, स्वार्थपरता, मिथ्याभिमान, अहंभाव, काम, लोभ तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त रहीं। इसलिए कई साधक उन्हें परमहंस योगी तक की उपाधि देते।

 मां की आवाज बहुत ही मधुर थी वे जब गाती ऐसा लगता है कि कोई सिद्ध गायिका गा रही हो। वे सभी रागों के गीत गा लेती थी और बहुत ही प्रवीणता के साथ। उनकी आवाज में चुंबकीय आकर्षण था। वे नृत्य कला मैं भी पारंगत थी। पारिवारिक सदस्य  बुआ जी पापा जी और दादी सब उन्हें लता मंगेशकर कीउपाधि देकर उनके गायन संगीत का सम्मान करते परंतु शास्त्रीय संगीत को उन्होंने अपना व्यवसाय या प्रोफेशन नहीं बनाया। रामचरितमानस जब भी गाती तब हम उन्हें बहुत ध्यान से सुनते और आनंद लेते।

मां पाक कला में भी प्रवीण थीं चूंकि वे जीव विज्ञान  संकाय की विद्यार्थी रही थी अतः  किस सब्जीमे कौन सा विटामिन, प्रोटीन, मिनरल्स मिलते हैं यह उनको पता होता. जिन के लिए खाना बनाया जा रहा है उनको रोज कैसा खाना जरूरी है  डाइबिटीज थायरॉयड ब्लड प्रेशर वालों को कैसा  भोजन लेना चाहिए  ये सब भी उन्हें पता होता।  मां केवल  चुनिंदा  रोटी सब्जी दाल चावल अचार पापड़ सलाद को ही  रोज का भोजन न बना कर अलग अलग रेसिपीज को भी बनातीं कभी  कुछ अच्छा पत्रिकाओं में पढ कर कभी बाहर  खाकर उन सभी रैसिपीज को भी ट्राई करती। मां का प्यार मा  के हाथ का भोजन प्रशाद बहुत स्वादिष्ट प्रेम पूर्वक बनाई गई स्वास्थ्य वर्धक रसोई होती। कहते हैं ना जैसा खाए अन्न वैसा बने मन।

बचपन में हम तीनों  बच्चों के लिए हमेशा नई  नई अच्छी अच्छी चीजें बनाकर खिलातीं। अच्छा खाना पकाने की वजह से उनकी हर तरफ तारीफ होती । रिश्तेदार मां के हाथ का साधारण सा भोजन कर  के भी उनकी तारीफ करते और उनके खाना बनाने के हुनर की वजह से इज्जत भी करते। हम तीनों बच्चों को भी किचन में काम करना पसंद था कुकिंग में रुचि थी तो मां हमें इसके लिए प्रोत्साहित करतीं थीं  वे कहतीं  खाना बनाना एक ऐसा कौशल है जो जीवन में बहुत आवश्यक है। 

 घर की  व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भी वे  बहुत ही कुशलता के साथ निभातीं। यह बहुत ही आश्चर्य करने वाली बात है और सुखद भी  कि उनके सभी कपड़ेे आलमारी में बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से रखे रहते। किचन की अलमारी में कौन से खंड में किस नंबर पर धने का  हल्दी का स्टील का डिब्बा रखा है उन्हें आखिरी समय तक याद था। किचन के सभी डिब्बे साफ  करीने से रखना उनके व्यक्तित्व  का  एक और प्रमुख  गुण था ।

मां पढ़ी लिखी सुशिक्षित हाउस वाइफ थीं। उन्हें सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल में टीचर शिप के लिए भी आमंत्रित किया गया था परंतु उनके लिए घर और परिवार ही सर्वोपरि था।  उनका पूरा ध्यान  उनके जीवन की धुरी सिर्फ उनका घर परिवार था।  जिससे वे समय पर आसानी से काम कर लेती थीं. वे अपने घर के कामों को बखूबी संभाले हुए थीं।. पिताजी को घर की शॉपिंग की लिस्ट बनाकर देना, खाना बनाना,  सभी बच्चों को पढ़ाना या घर की सफाई सभी चीज समय पर और परफेक्ट , तभी तो ससुराल में उन्हें कहते कि वे घर गृहस्थी चलाने में पीएचडी हैं।

 उन्होंने हमेशा बहुत ही समझदारी शांति और मौन- कम बोलना ज्यादा समझना से काम लिया हर   झगड़ालू इंसान से वाद-विवाद  कर अपना मूड ख़राब करने से हमें बचाती  और इससे बचने के  खुद भी हर संभव प्रयास करतीं क्योंकि किसी भी तरह का विवाद हमारे  लिए मददगार  सिद्ध नहीं होता।
वे कहतीं  जिस तरह  खाने को लज़ीज़ बनाने के लिए खट्टा मीठा, तीखा, कड़वा सभी स्वाद आवश्यक  है, उसी तरह जीवन में सभी रंग होते हैं थोड़ा-सा दुःख भी जीवन में ज़रूरी है और तभी सुख की असली क़ीमत पता लगती है. 

कभी कभी जब हम ग़ैर-यथार्थवादी बातें करते  और अपने जीवन को अपने ही हाथों गलत दिशा में ले जाते हैं मां हमेशा हमें सही राह पे ले जाने की कोशिश करतीं‌ परंतु शायद मां हमारे प्रारब्ध से संघर्ष नहीं कर पातीं।  जरा सा भी दुख बच्चों को ना हो मां हमेशा ईश्वर से यही दुआ करतीं। जब हमारे दोस्तों से हमारा झगड़ा होता यह झगड़ा कई बार  मूड ख़राब कर देता और हम अपना आपा खो देते  इससे और आग  भड़कती तब  मां कहती अगर तुम सहयोग नहीं करोगे , तो कोई तुमसे नहीं झगड़ सकता है. वे प्रेमी स्वभाव की बहुत ही सौम्य और कोमल ह्रदय के व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। उनका कहना था सबसे अच्छा रिश्ता बनाए रखने की कोशिश करो  प्रेम से बात करो। 

कभी कभी ग़लतफ़हमी के चलते हमारे और हमारे प्रिय जनों के बीच थोड़ी दरार पड़ जाए तो भी वे कहती कि लड़ाई झगड़े के बावजूद भी अपने व्यवहार में  संजीदगी बनाए रखना चाहिए . यदि कोई समस्या है तो उसे  तुरंत खत्म कर देना चाहिए  समस्या को हल्के में नहीं लेना चाहिए। अपने आपको हर परिस्थिति में ढालने की कोशिश करते  रहना चाहिए । वे कहतीं किसी समस्या को टालना नहीं, बल्कि जल्दी-से-जल्दी उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करना चाहिए. दूसरों को यह बताने के लिए ज़्यादा उतावले नहीं होना चाहिए कि आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं. यदि  जीवनसाथी की वजह से  दिल दुखता है तो अपना मन कुछ अच्छा पढ़ने में लगाओ या घर के काम में अपना दिमाग डाईवर्ट करो , किसी बगीचे में घूम आओ या  अपने  किसी  पालतू पशु के साथ समय बिताकर  अपना मूड  फ्रेश करने  की  कोशिश करो।

मां घर परिवार में सुखद वातावरण के साथ-साथ डेली रूटीन के काम कर अनुशासन  भी बनाए रखतीं। भाषा की मर्यादा बनाए रखना हमने उनसे ही सीखा। मां ने  कभी भी किसी से  ऊंची आवाज में बात नहीं की ना ही उत्तेजित होकर किसी को डांटा । वे सदैव ही हंसती मुस्कुराती रहतीं। हर आने वाले व्यक्ति का दिल से स्वागत करतीं और  भोजन करवातीं।  हमें तो हमारी मां मां जगदंबा का अवतार सी लगतीं  -जय जय जय जग जननी माता द्वार तिहाारे जो भी आता बिन मांगे सब कुछ पा जाता।
हमारी मां  संपन्न घराने से थीं हर चीज से संतुष्ट  उनके घर में किसी भी बात की कमी नहीं थीं । हर काम के लिए उनके मां - पापा  के यहां नौकर लगे हुए थे परन्तु ससुराल में उन्होंने किसी भी काम से परहेज़ नहीं किया । उनके हर काम  में पूर्णता थी ।उनके कपड़े बिल्कुल साफ स्वच्छ धुले हुए रहते वे कपड़े इस्त्री करके पहिनती थीं। आज भी अलमारी में हर कपड़ा बहुत ही सलीके से संभाल के प्रेस करके रखा मिलेगा

इतनी पढ़ी लिखी अच्छे घर से होने के बावजूद भी गेहूं साफ करके पिसवाना हल्दी धना पिसवाना, सभी प्रकार के अचार बनाना यह सब उनका सदाबहार काम रहता था। चावल के  पापड़ , उरद मूंग के पापड़ , बिजौरा आंवले का मुरब्बा , नींबू का अचार, आंवले का अचार उनके हाथ का बनाया हुआ आज भी हम खा रहे हैं।
 
हम पैसे तो बना सकते हैं परन्तु मां का जीवन हमारे  हाथों से फिसल गया। न ही चिकित्सक, न संपर्क और न ही दोस्त मददगार  सिद्ध हुए .  उनके साथ बिताया हुआ समय बहुत ही आनन्ददायी और  शांतिपूर्ण रहा। हर संपर्क में आने वाला व्यक्ति रिश्तेदार मा से प्रभावित रहता हमारी बड़ी बुआजी और दादी हमारी मां की बहुत प्रशंसा करतीं उनके लिए  हमारी मां घर गृहस्थी में पीएचडी थीं। यह बहुत बड़ी उपाधि है मां के लिए।

मां ने हर परिस्थिति में  ससुराल का अपने परिवार का साथ दिया  छोटी बुआ की शादी के लिए उन्होंने अपने सारे सोने के जेवर गहने बुआ को दे दिए। बड़ी बुआ हमेशा नरसिंहपुर आती रहती उनके बच्चों को भी मां पढ़ाती और अपने बच्चों का प्यार दुलार उन पर लुटातीं रहतीं। दोनों बुआ के बच्चों ने हमारे माता-पिता के सहयोग से ही अपनी पढ़ाई पूरी की। मां का कहना था अगर आप किसी परिस्थिति से घबराकर भागेंगे- तो वह आपका पीछा हर निकृष्ट तरीक़े से करेगी. किसी के साथ तनावपूर्ण संबंध को जहां तक सम्भव हो बात को बढ़ने न दें.। ऐसी निश्छल निर्मल निष्काम मां की महिमा को कोटि-कोटि प्रणाम🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻